पहाड़ की छानियाँ और खरक बनेगे पर्यटकों का नया ठौर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की दूरदर्शी सोच के तहत ग्रामीण युवाओं को स्व‑रोजगार की मुहिम में शामिल करते हुए उत्तराखंड पर्यटन विभाग अब वन विभाग के सहयोग से जल्द ही पौड़ी गढ़वाल के सीमांत क्षेत्र दूधातोली‑बिनसर तथा देहरादून जनपद के जौनसार क्षेत्र के नागथात स्थित झुलका डांडा ट्रैक पर स्थानीय पारंपरिक छानियों (खरक) को इको‑हट्स के रूप में विकसित करने की तैयारी में जुट गया है। सफल संचालन के पश्चात् राज्य के अन्य सभी ट्रैकों के आसपास स्थित सभी छानियों को भी इसी मॉडल के तहत इको हट्स के रूप में विकसित किया जाएगा। ईको‑टूरिज्म नीति के तहत यह महत्वाकांक्षी परियोजना न केवल पर्यटकों को हिमालयी प्रकृति के निकट लाएगी, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओ को आत्मनिर्भर बनाने में मील का पत्थर साबित होगी। परम्परागत ट्रैकों पर स्थित छानियों को वन विभाग के सहयोग से इको हट्स में बदलकर ट्रैकिंग प्रेमियों, ट्रेकर्स और नेचर लवर्स के लिए आदर्श ठहरने की व्यवस्था की जा रही है।
पर्यटन सचिव धीराज गर्ब्याल ने बताया कि पारंपरिक छानियों को सुरक्षित, आधुनिक और पर्यावरण‑अनुकूल इको हट्स में बदलने का यह प्रयोग उत्तराखंड की ईको‑टूरिज्म नीति की महत्वपूर्ण कड़ी है। इन इको हट्स में बायो‑टॉयलेट, जल उपचार और कचरा प्रबंधन जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, ताकि पहाड़ और जंगलों की स्वच्छता बनी रहे।
इन इको हट्स का संचालन युवाओ का समूह बनाकर ,उनको ट्रेनिंग प्रदान कर ,युवाओ का समूह ही संचालित करेगा ताकि युवाओं को अपने गाँवों में ही रोजगार मिले और पलायन रुके। जिससे राजस्व का सबसे ज़्यादा हिस्सा स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही रहेगा। इन हट्स का निर्माण, आवश्यक सामग्री और युवाओ को इको हट्स व्यवस्थापन, स्वच्छता एवं सुरक्षा प्रबंधन जैसा प्रशिक्षण ट्रैकिंग ट्रैक्शन सेंटर होमस्टे अनुदान योजना के तहत उत्तराखंड पर्यटन विभाग द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा। पर्यटकों से ठहरने की मापदंडित उच्च दर ली जाएगी, ताकि सुविधा और सुरक्षा के साथ‑साथ पर्यावरण संरक्षण एवं टिकाऊ पर्यटन की बुनियाद भी बनी रहे।
उत्तराखंड के बुग्यालों (Alpine Meadows) में उच्च न्यायालय के आदेश के तहत रात्रि विश्राम और कैंपिंग पर पूर्ण प्रतिबंध है, ताकि इन संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों पर लोगों के दबाव से राहत मिल सके। इसी कड़ी में जंगलों में बनी पारंपरिक छानियों को इको हट्स मॉडल के तहत ट्रैकिंग प्रेमियों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाया जा रहा है। इस नए रूप में छानियों में रात्रि विश्राम का मॉडल न केवल पर्यावरण के अनुकूल रहेगा, बल्कि जंगलों और पहाड़ों के बीच रात बिताने के शौकीन लोगों को रोमांचक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध अनुभव भी मिलेगा।
पर्यटन विभाग का मानना है कि यह मॉडल अत्यधिक ट्रैफिक वाले शहरों और पर्यटन स्थलों से दूर जाकर प्रकृति के निकट रहने की इच्छा रखने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू पर्यटकों के लिए बेहद आकर्षक होगा। इसके माध्यम से ट्रैकिंग रूट पर रात्रि विश्राम की सुविधा नियमित और नियंत्रित तरीके से उपलब्ध होगी, जबकि बुग्यालों पर शारीरिक दबाव भी कम होगा।
छानियाँ या खरक‑ हिमालयी संस्कृति का जीवंत प्रतीक
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में छानियों या खरक की जीवनशैली हिमालयी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। ग्रामीण परिवार साल के लगभग छह महीने (अप्रैल से अक्टूबर तक) इन अस्थायी आवासों में पशुओं के साथ व्यतीत करते हैं, जो जंगलों और बुग्यालों में बसे होते हैं। यह प्रथा न केवल जीविका का आधार है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। छानियाँ आमतौर पर पत्थर, लकड़ी और घास से बने साधारण झोपड़े होते हैं, जो चरागाहों के बीच स्थापित किए जाते हैं।
गर्मियों में गाय, भैंस, भेड़‑बकरी आदि पशुओं सहित परिवार ऊंचे चरागाहों में चले जाते हैं, क्योंकि निचले गांवों में चारे की कमी और उमस वाली गर्मी से बचाव के लिए यह प्रवास आवश्यक होता है। ऊंचाई पर पौष्टिक घास जैसे ब्राह्मी, ज्वाराणा आदि मिलती है, जो पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है। इन छानियों में रहकर ग्रामीण दूध, घी, खोया और अन्य दुग्ध उत्पाद बनाते हैं, जो निचले कस्बों और बाजारों में बिकते हैं और उनकी प्रमुख आय का स्रोत हैं। परिवार के पुरुष पशुओं की देखभाल करते हैं, जबकि महिलाएं दूध संसाधन और दुग्ध उत्पाद बनाने का काम करती हैं, जिससे सामुदायिक सहयोग और आत्मनिर्भरता दोनों को बढ़ावा मिलता है।
पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा
छानियों की यह प्रथा पर्यावरण के लिए भी सकारात्मक है। जंगलों में घास की अतिवृद्धि को रोकने में यह सहायक होती है, क्योंकि चराई से वनस्पति नियंत्रित रहती है। पशुओं का गोबर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, जो बुग्यालों के लिए आवश्यक है, और इस प्रकार यह प्रथा जैव विविधता को भी संरक्षित रखती है। आधुनिकता और शहरी जीवनशैली के बढ़ते प्रभाव के कारण यह परंपरागत छानियों की जीवनशैली धीरे‑धीरे लुप्त हो रही है, जिसके कारण चरागाहों में झाड़ियां और अनियंत्रित वनस्पति का प्रसार बढ़ रहा है।
इस तरह के इको हट्स और छानियों‑आधारित स्वरोजगार मॉडल से युवाओं को रोजगार के स्थायी अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि सरकार हर एक युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। उत्तराखंड की ईको‑टूरिज्म और होमस्टे नीतियों के तहत पहले से ही “स्वरोजगार योजनाएं” चल रही हैं, जो ग्रामीण युवाओं को टूरिज्म‑आधारित उद्यम शुरू करने के लिए ऋण और अनुदान देती हैं। जब छानियों को इको हट्स और होमस्टे‑शैली के स्टे में बदला जाएगा, तो यहाँ रहने‑खाने, स्थानीय पर्यटन गतिविधियाँ, गाइड सेवाएँ, ढाई‑तीन दिन के ट्रैकिंग पैकेज और स्थानीय उत्पादों की बिक्री जैसे छोटे‑छोटे व्यवसाय खुल सकते हैं, जिन्हें युवा स्वयं संचालित कर सकेंगे।

