बड़कोट: विद्युत वितरण खंड बड़कोट में तैनात अधिशासी अभियंता पर सरकारी योजना का दुरुपयोग कर अपनी पत्नी के नाम सोलर प्लांट स्वीकृत कराने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले ने पूरे जनपद में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है और बेरोजगार युवाओं के बीच आक्रोश व्याप्त है।
आरोप है कि अधिशासी अभियंता धर्मवीर सिंह ने अपने पद और प्रभाव का लाभ उठाते हुए मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत मोरी क्षेत्र में अपनी पत्नी श्रद्धा सिंह के नाम पर सोलर प्लांट स्वीकृत करवाया और विभागीय अनुबंध भी कर लिया। योजना का मुख्य उद्देश्य बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है, लेकिन अधिकारी द्वारा स्वयं इसका लाभ लेने का मामला सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा शुरू की गई मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत सोलर प्लांट लगाने पर सरकार लाखों रुपये की सब्सिडी प्रदान करती है। इस योजना का लाभ मुख्य रूप से बेरोजगार युवाओं, महिलाओं और जरूरतमंद व्यक्तियों को दिया जाना है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब आम बेरोजगार युवा स्वरोजगार योजनाओं का इंतजार कर रहे हैं, तब एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी द्वारा अपनी पत्नी के नाम पर योजना का लाभ लेना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि वास्तविक लाभार्थियों के साथ अन्याय भी है।
बड़कोट जय हो ग्रुप ने इस मामले पर कड़ी नाराजगी जताई है। ग्रुप के सदस्यों ने कहा कि एक अग्रणी अधिकारी द्वारा अपनी पत्नी को बेरोजगार दिखाकर योजना का लाभ लेना सरकार की मंशा और छवि दोनों को ठेस पहुंचाता है। ग्रुप ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और ऊर्जा सचिव को ज्ञापन भेजकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। ज्ञापन देने वालों में मोहित, मदन, सोबन सिंह, प्रदीप, अजय रावत, सुनील थपलियाल, रविन्द्र, महिताब, मनमोहन सिंह, संजय सिंह, जय सिंह सहित कई स्थानीय युवा शामिल हैं।
आरोपों पर अधिशासी अभियंता धर्मवीर सिंह ने कहा, “मुझसे कोई जानकारी चाहिए तो आप मेरे कार्यालय में आ सकते हैं। मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना की नोडल एजेंसी उरेडा (UREDA) है। कौन प्लांट लगा सकता है या नहीं, इसकी जानकारी उरेडा से ली जा सकती है।”
वहीं अधीक्षण अभियंता युद्धवीर तोमर ने मामले की गंभीरता स्वीकार करते हुए कहा, “यदि पत्नी के नाम योजना का लाभ लिया गया है तो पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।”
स्थानीय बेरोजगार युवाओं में रोष है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाएं आम जनता के लिए होती हैं, न कि अधिकारियों के परिवार के लिए। यदि अधिकारी खुद ही योजनाओं का फायदा उठाने लगेंगे तो वास्तविक जरूरतमंदों का हक मार लिया जाएगा।
इस मामले ने उत्तराखंड में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और पारदर्शिता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में जहां बेरोजगारी दर पहले से ही अधिक है, वहां ऐसी घटनाएं युवाओं के आक्रोश को और बढ़ा सकती हैं।
मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के अंतर्गत 1 से 5 किलोवाट तक के सोलर प्लांट लगाने पर 30% से 50% तक सब्सिडी दी जाती है। योजना का लक्ष्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देते हुए युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना है। योजना के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि लाभार्थी बेरोजगार होना चाहिए और एक परिवार से केवल एक ही व्यक्ति को लाभ मिलना चाहिए।
यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह न केवल विभागीय अनुशासन का उल्लंघन होगा, बल्कि भ्रष्टाचार की श्रेणी में भी आ सकता है। सरकार की योजनाओं का दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त निगरानी व्यवस्था बनाने की भी आवश्यकता जताई जा रही है, ताकि वास्तविक बेरोजगार युवाओं तक योजनाओं का लाभ पहुंच सके।

