देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने राज्य की एक बड़ी समस्या को अवसर में बदलने का ठोस कदम उठाया है। वनाग्नि का प्रमुख कारण माने जाने वाले पिरूल (चीड़ की सूखी पत्तियां) को अब ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आजीविका का मजबूत आधार बनाने की तैयारी की जा रही है।
सचिव ग्रामीण विकास, धीराज सिंह गर्ब्याल ने सभी मुख्य विकास अधिकारियों (CDOs) को महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और क्लस्टर लेवल फेडरेशन्स (CLFs) को पिरूल संग्रहण तथा उसके वैल्यू एडिशन से जोड़ने के लिए विस्तृत कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए हैं। यह पहल न केवल जंगलों को आग से बचाएगी, बल्कि पहाड़ की महिलाओं को स्थायी आय का स्रोत भी प्रदान करेगी।
सचिव धीराज सिंह गर्ज्याल ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पिरूल संग्रहण और निस्तारण से संबंधित सुविचारित प्रस्ताव 15 दिनों के अंदर आयुक्त, ग्राम्य विकास के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए।उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ के वृक्षों की भरमार है। राज्य के कुल वन क्षेत्र का लगभग 16.36 प्रतिशत हिस्सा (करीब 3,99,329 हेक्टेयर) चीड़ के वनों से आच्छादित है। हर साल सर्दियों के बाद इन पेड़ों से बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां (पिरूल) गिरती हैं। ये पत्तियां गर्मियों में अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं और छोटी सी चिंगारी से पूरे जंगल को भस्म कर सकती हैं। पिछले कई वर्षों में वनाग्नि की घटनाओं ने न केवल जैव विविधता को नुकसान पहुंचाया, बल्कि वन्य जीवों और स्थानीय लोगों की जान-माल को भी खतरे में डाला।
सचिव ग्रामीण विकास, धीराज सिंह गर्ब्याल ने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि इस पहल से राज्य की हजारों महिलाओं को रोजगार और अतिरिक्त आय मिले साथ ही पर्यावरण संरक्षण भी मजबूत हो। यह योजना पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण दोनों को एक साथ मजबूती देने वाली साबित हो सकती है.अब सरकार इस बेकार पिरूल को उपयोगी बनाने जा रही है। ग्राम्य विकास विभाग के तहत कार्यरत महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधे इस कार्य से जोड़ा जाएगा।
महिलाएं जंगलों से पिरूल एकत्र करेंगी, जिसके बदले उन्हें तुरंत भुगतान मिलेगा। वर्तमान में वन विभाग ₹10 प्रति किलो की दर से पिरूल खरीद रहा है, जो पहले ₹2-3 प्रति किलो तक सीमित था। यह दर बढ़ने से महिलाओं को प्रोत्साहन मिलेगा।आधुनिक संग्रहण केंद्र और प्लांट की स्थापनायोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है प्रत्येक विकास खंड (ब्लॉक) में पिरूल संग्रहण केंद्र की स्थापना।
इन केंद्रों को आधुनिक मशीनरी से लैस किया जाएगा, जिसमें शामिल हैं:
- शेडर (छाया में सुखाने की व्यवस्था)
- ड्रायर (त्वरित सुखाने वाली मशीन)
- पैलेटाइजर (पैलेट बनाने की मशीन)
- बेलर मशीन (गट्ठर बांधने वाली मशीन)
- ट्रैक्टर और अन्य परिवहन साधन
इन केंद्रों पर एकत्रित पिरूल को संसाधित कर फायर पैलेट्स (Fire Pellets) या ब्रिकेट्स बनाए जाएंगे। ये पैलेट्स ईंधन के रूप में इस्तेमाल हो सकते हैं – घरेलू चूल्हों, उद्योगों या यहां तक कि बायोमास आधारित बिजली उत्पादन में। पैलेट्स की बिक्री से SHGs को अतिरिक्त आय होगी, जिससे दोहरा आर्थिक लाभ सुनिश्चित होगा।
महिलाओं की आय में वृद्धि और सशक्तिकरण
ग्रामीण महिलाओं के लिए यह योजना गेम चेंजर साबित होने वाली है। उत्तराखंड में हजारों स्वयं सहायता समूह पहले से सक्रिय हैं। अब उन्हें पिरूल संग्रहण, सुखाने, पैकिंग और वैल्यू एडिशन के कार्य से जोड़ा जाएगा। उदाहरण के लिए, कुछ क्षेत्रों में पहले से शुरू की गई छोटी पहलों में महिलाएं पिरूल से हस्तशिल्प वस्तुएं (जैसे राखियां, बास्केट, दीवार की सजावट) बना रही हैं और मासिक ₹7,000 तक की कमाई कर रही हैं। सरकारी योजना को बड़े स्तर पर लागू करने से यह आय और बढ़ेगी। महिलाएं सुबह घर का काम निपटाकर जंगल से पिरूल इकट्ठा कर सकती हैं। एक महिला एक दिन में 20-30 किलो पिरूल आसानी से एकत्र कर सकती है, जिससे रोजाना ₹200-300 की अतिरिक्त कमाई संभव है।
मौसम के अनुसार साल में कई महीनों तक यह कार्य चल सकता है। क्लस्टर लेवल फेडरेशन्स (CLFs) इन समूहों को संगठित करेंगे, प्रशिक्षण देंगे और बाजार से जोड़ेंगे। इससे महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण होगा, परिवार की आय बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।पर्यावरण संरक्षण का बड़ा योगदानपिरूल संग्रहण से वनाग्नि की घटनाओं में काफी कमी आने की उम्मीद है। व्यवस्थित संग्रहण से जंगलों में सूखी पत्तियों का ढेर नहीं बनेगा, जिससे आग लगने का खतरा घटेगा।
उत्तराखंड में हर साल गर्मियों में सैकड़ों हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आते हैं। इससे न केवल पेड़-पौधे नष्ट होते हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। पिरूल के सदुपयोग से जैव विविधता की रक्षा होगी, वन्य जीवों का स्थान सुरक्षित रहेगा और हवा की गुणवत्ता में सुधार होगा। यह पहल हरित अर्थव्यवस्था और सर्कुलर इकोनॉमी का बेहतरीन उदाहरण है – जहां कचरा (पिरूल) को संसाधित कर उपयोगी उत्पाद बनाया जा रहा है।
प्रस्ताव में शामिल होंगे:
- लक्षित ब्लॉकों की सूची
- मशीनरी की खरीद और स्थापना का समयबद्ध प्लान
- महिलाओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम
- पैलेट्स के बाजार लिंकेज
- निगरानी और मूल्यांकन तंत्र
वन विभाग, ग्राम्य विकास विभाग और महिला सशक्तिकरण विभाग के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया है। यदि यह योजना सफल रही तो उत्तराखंड में पिरूल आधारित उद्योगों का विस्तार हो सकता है। पैलेट्स के अलावा पिरूल से पेपर, कंपोस्ट, इंसुलेशन मटेरियल और अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा, बल्कि राज्य की हरित ऊर्जा पहलों को भी बल मिलेगा।
सरकार का मानना है कि पिरूल संग्रहण से न केवल वनाग्नि का खतरा कम होगा, बल्कि यह महिलाओं के लिए स्थायी स्वरोजगार का एक नया अध्याय लिखेगा। यह पहल उत्तराखंड को आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल राज्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अगर समय पर लागू की गई तो हजारों महिलाओं की जिंदगी बदलेगी और जंगलों की रक्षा होगी।


