नई दिल्ली: देश में बढ़ते पर्यावरण संकट के बीच एक नई राह दिखाते हुए चेतना मुखर्जी के स्टार्टअप ‘Klean Green’ ने सफलता की अनूठी मिसाल कायम की है। कोविड महामारी के दौरान अपने घर के कूड़ेदान में प्लास्टिक की थैली न इस्तेमाल करने का एक छोटा सा व्यक्तिगत फैसला आज ‘क्लीन ग्रीन’ नाम के एक असरदार और बड़े ब्रांड के रूप में बदल चुका है। प्लास्टिक कचरे के अंबार से जूझते देश में ‘क्लीन ग्रीन’ केवल एक व्यावसायिक कंपनी बनकर नहीं उभरा है, बल्कि यह सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से निपटने का एक बेहद सीधा और व्यावहारिक समाधान बन गया है। चेतना की इस दूरदर्शी पहल ने न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया है, बल्कि सैकड़ों आदिवासी और वंचित वर्ग की महिलाओं को सम्मानित रोजगार देकर उनकी रोजी-रोटी का मजबूत जरिया भी बनाया है। एक इंसान की छोटी सी सजगता किस तरह व्यापक सामाजिक बदलाव की चिंगारी बन सकती है।
आज जब पूरा देश प्लास्टिक कचरे के अंबार तले दबा जा रहा है, ऐसे में क्लीन ग्रीन जैसे उद्यम केवल कंपनियां भर नहीं रह जातीं—ये एक सबक बन जाती हैं, नीति बनाने वालों के लिए भी और आम उपभोक्ता के लिए भी। यह साबित करती हैं कि सततता कोई फैशनेबल शब्द या नारा भर नहीं है, बल्कि सही सोच, थोड़े धैर्य और लोगों के साथ की भागीदारी से यह एक ठोस, चलने वाला कारोबार भी बन सकती है।
सुविधा की कीमत क्या है
भारत में हर साल जितना प्लास्टिक कचरा निकलता है, उसका बड़ा हिस्सा थैलियों, रैपरों और पैकेजिंग जैसी सिंगल-यूज चीजों से आता है। यह कचरा सिर्फ नदी-नालों और समंदर को गंदा नहीं करता—यह मिट्टी के भीतर पनपने वाले उन सूक्ष्म जीवों को भी मार डालता है, जिन पर जमीन की उर्वरता टिकी होती है। सरकार ने प्लास्टिक बैन को लेकर कई बार कोशिशें कीं, मगर जमीन पर बात आज भी अधूरी है—क्योंकि प्लास्टिक की जगह लेने वाली चीजें अक्सर महंगी पड़ती हैं या इतनी मात्रा में मिलती ही नहीं।
चेतना का अनुभव इसी सच्चाई को उजागर करता है। जब उन्होंने पहली बार पत्तों से कूड़ेदान की थैलियां बनाईं, तो एक थैले की कीमत करीब 10 रुपये बैठी—जबकि प्लास्टिक की थैली इससे कहीं सस्ती मिलती है। नतीजा यह हुआ कि बाजार ने इन थैलियों को सिरे से नकार दिया। यहीं से एक जरूरी सबक मिलता है—सिर्फ पर्यावरण के लिए अच्छा होना काफी नहीं, दाम भी जेब के अनुसार होने चाहिए, और आदत भी। भारतीय ग्राहक, खासकर मध्यम वर्ग, दाम को लेकर बेहद सजग रहता है। जब तक टिकाऊ चीजें उसकी जेब पर भारी पड़ती रहेंगी, बदलाव की रफ्तार धीमी ही रहेगी।
हार से सीखी हिम्मत
क्लीन ग्रीन की कहानी में सबसे दिलचस्प बात यही है कि जब पहला विचार फ्लॉप हुआ, तो टीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने गौर किया कि भारतीय घरों में प्लास्टिक की पैकेजिंग को अक्सर दोबारा कूड़ेदान की थैली बनाकर इस्तेमाल कर लिया जाता है—यानी लोगों की आदत में चीजों को दोबारा इस्तेमाल करने की समझ पहले से ही मौजूद थी, बस माध्यम प्लास्टिक था। इसी छोटी सी बात ने टीम को दिशा दी, और वे पैकेजिंग की तरफ मुड़ गए—जहां मांग भी थी, और चीजें बदलने की गुंजाइश भी।
यह प्रसंग हर उस उद्यमी के लिए सीख है, जो कुछ अच्छा और टिकाऊ बनाना चाहता है। शुरुआती कोशिश अक्सर काम नहीं करती। असली हुनर यही है कि बाजार की बात ध्यान से सुनी जाए, अपने मकसद से समझौता किए बिना रास्ता बदला जाए। लक्ष्य वही रहे—पर्यावरण की रक्षा—मगर वहां तक पहुंचने का रास्ता लचीला होना चाहिए।
पुरानी परंपरा, नया इस्तेमाल
क्लीन ग्रीन की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें कोई नई-नवेली तकनीक नहीं है—बल्कि सदियों पुरानी एक भारतीय परंपरा को नए ढंग से इस्तेमाल किया गया है। बौहिनिया वली, जिसे सियाली या मालू भी कहा जाता है, बरसों से गांवों और आदिवासी इलाकों में खाना परोसने के काम आती रही है। यह कोई अनोखी खोज नहीं, बल्कि हमारी अपनी पुरानी सूझबूझ है, जिसे बस डिजाइन और कारोबार की भाषा में दोबारा गढ़ा गया।
इस मॉडल की खासियत यह भी है कि इसमें एक भी पेड़ नहीं काटा जाता। पत्तियां बेल से तोड़ी जाती हैं, साल में करीब दस महीने, और बाकी दो महीने बेल को दोबारा उगने का मौका दिया जाता है—यानी प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर काम करने का एक बढ़िया उदाहरण। भारत जैसे देश में, जहां जंगल की दौलत बहुत है, अगर ऐसी सैकड़ों छोटी-छोटी पहलें व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ें, तो यह सिर्फ पर्यावरण नहीं बचाएगा—जंगलों के आसपास रहने वाले लाखों परिवारों की जिंदगी भी संवार सकता है।
एक चुपचाप चलती क्रांति
इस पूरी कहानी में सबसे छू लेने वाली बात है इसका सामाजिक असर। यह उद्यम दो तरह से महिलाओं को मजबूत बना रहा है—एक तरफ जंगल से पत्तियां बीनने वाली आदिवासी महिलाएं, दूसरी तरफ बेंगलुरु की यूनिट में काम करने वाली महिलाएं, जिनमें से कई का जीवन आसान नहीं रहा। सुनीता की मिसाल लीजिए—7,000 रुपये महीने से शुरुआत करके आज वे 15,000 रुपये कमा रही हैं। यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है—यह आत्मविश्वास की कहानी है। “यह सिर्फ कमाई की बात नहीं, मुझे कुछ सार्थक बनाने में खुशी मिलती है”—उनकी यह बात बहुत कुछ कह जाती है। काम सिर्फ पैसा नहीं देता, वह इज्जत और मकसद भी देता है।
देश में महिलाओं की कामकाजी भागीदारी को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है, खासकर गांवों और असंगठित क्षेत्र में। क्लीन ग्रीन जैसे उद्यम दिखाते हैं कि अगर सही प्रशिक्षण मिले, काम में लचीलापन हो और मेहनताना ठीक-ठाक हो, तो महिलाएं—चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से हों—अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे सकती हैं।
सरकार की मदद, मगर आगे लंबा रास्ता
क्लीन ग्रीन को स्टार्टअप कर्नाटक और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं से मदद मिली है, जो यह दिखाता है कि सरकारी सहयोग ऐसे उद्यमों को सहारा दे सकता है। लेकिन सच यह भी है कि ज्यादातर छोटे, सामाजिक सोच वाले उद्यमों को बड़ा बनने के लिए पैसा, तकनीकी मदद और बाजार तक पहुंच—तीनों की भारी कमी झेलनी पड़ती है। तीन लाख के निवेश से पंद्रह लाख के सालाना कारोबार तक पहुंचने का सफर प्रेरणादायक जरूर है, लेकिन यह भी बताता है कि टिकाऊ उत्पादों का बाजार अभी छोटा और धीमी रफ्तार वाला ही है।
यहीं सरकार, बैंकों और बड़ी कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है—सिर्फ तारीफ और प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। सरकारी खरीद में पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग को तरजीह देना, कंपनियों के सीएसआर फंड का इस्तेमाल ऐसे उद्यमों को बढ़ाने में करना, कम ब्याज पर कर्ज देना—ये कदम असल फर्क ला सकते हैं। और हां, हम ग्राहकों को भी यह समझना होगा कि टिकाऊ चीजों की थोड़ी ज्यादा कीमत असल में एक निवेश है, फिजूलखर्ची नहीं।
विदेश तक पहुंचती खुशबू
यह खुशी की बात है कि क्लीन ग्रीन को अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया से भी मांग मिल रही है। दुनिया भर में लोग अब पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और नैतिक ढंग से बनी चीजों को तरजीह देने लगे हैं, और भारत के पास इसके लिए जंगल की दौलत भी है और हाथ का हुनर भी। बस, निर्यात की राह में गुणवत्ता के मानक, प्रमाणन और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं, जिनके लिए तैयारी और साथ चाहिए।
छोटी शुरुआत, बड़ा असर
चेतना मुखर्जी और उनकी बहन पूजा अरोड़ा की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि बड़े बदलाव अक्सर बहुत छोटी, निजी जगहों से शुरू होते हैं। घर के कूड़ेदान में प्लास्टिक न डालने के एक फैसले ने आज सैकड़ों महिलाओं को रोजगार दिया है, एक पुरानी परंपरा को नई जिंदगी दी है, और प्लास्टिक-मुक्त भविष्य की तरफ एक ठोस कदम बढ़ाया है। यह सिर्फ एक स्टार्टअप की कामयाबी नहीं—यह इस बात का सबूत है कि जब पर्यावरण की समझ, डिजाइन का हुनर, पुरानी परंपरा और लोगों के लिए संवेदनशीलता—ये सब एक साथ मिलें, तो एक ऐसा कारोबार खड़ा हो सकता है, जो मुनाफा भी कमाए और मकसद भी न भूले।
आज जब देश जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक कचरे और गांवों में बेरोजगारी जैसी कई मुश्किलों से जूझ रहा है, क्लीन ग्रीन जैसी कहानियां उम्मीद की किरण की तरह हैं। जरूरत बस इतनी है कि ऐसे मॉडलों को पहचाना जाए, हौसला दिया जाए, और सही नीतियों के जरिए इन्हें बड़े पैमाने पर दोहराया जाए। तभी हरित उद्यमिता कुछ चंद प्रेरक कहानियों तक सिमटी नहीं रहेगी—यह एक बड़ा आंदोलन बन सकेगी, जिसकी आज भारत को सबसे ज्यादा दरकार है।

