NTI (Mohan Bhulani): उत्तराखंड का किसान आज दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। एक ओर जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र लगातार असंतुलित हो रहा है, तो दूसरी ओर खेती की लागत बढ़ने और लाभ घटने से कृषि का आकर्षण कम होता जा रहा है। कभी समय से पहले बारिश, कभी लंबे सूखे का दौर, कभी ओलावृष्टि तो कभी बादल फटने जैसी घटनाएं अब अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं। इसका सबसे अधिक असर पर्वतीय क्षेत्रों के उन किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे समय में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या उत्तराखंड की कृषि केवल पारंपरिक फसलों के भरोसे भविष्य की चुनौतियों का सामना कर पाएगी?
इस प्रश्न का उत्तर नई सोच और नई कृषि पद्धतियों में छिपा है। ऐसी फसलों को अपनाना समय की आवश्यकता है, जो कम पानी में बेहतर उत्पादन दें, पोषण से भरपूर हों और किसानों को बाजार में उचित मूल्य भी दिला सकें। किनोवा (Quinoa) इन्हीं गुणों के कारण दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए यह एक संभावनाशील विकल्प बनकर उभर रहा है।
दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतीय क्षेत्र से दुनिया तक पहुंचा किनोवा आज “सुपर फूड” के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम तथा सभी आवश्यक अमीनो अम्ल पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। भारत में भी महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने वालों के बीच किनोवा तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह बढ़ती मांग किसानों के लिए नए बाजार और बेहतर आय के अवसर लेकर आई है।
उत्तराखंड के संदर्भ में इसकी उपयोगिता और भी अधिक है। राज्य के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि भूमि छोटी-छोटी जोतों में बंटी हुई है। सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं और अधिकांश खेती वर्षा पर आधारित है। ऐसे में अधिक पानी और अधिक निवेश वाली फसलें किसानों के लिए जोखिम बढ़ाती हैं। इसके विपरीत किनोवा अपेक्षाकृत कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम है तथा कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यही विशेषता इसे जलवायु परिवर्तन के दौर में एक टिकाऊ विकल्प बनाती है।
उत्तराखंड में सरकारी स्तर पर किनोवा की खेती का यह पहला प्रयास है। विभाग ने राज्य में इस सुपरफूड की संभावनाओं को देखते हुए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्णय लिया है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में यह पहाड़ी किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक नया और भरोसेमंद माध्यम बनेगा। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकेगा, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। प्रोजेक्ट की सफलता के आधार पर भविष्य में इसे अन्य जिलों में भी विस्तार दिए जाने की योजना है।
धीराज गर्ब्याल, सचिव, ग्राम्य विकास विभाग
उत्तराखंड लंबे समय से जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयासरत है। राज्य के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग पहले से ही सीमित है। ऐसे में किनोवा जैसी उच्च मूल्य वाली फसल को जैविक स्वरूप में विकसित कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जाए, तो यह राज्य के किसानों के लिए आय का नया स्रोत बन सकती है। “उत्तराखंड ऑर्गेनिक” ब्रांड के तहत किनोवा की पहचान स्थापित करने से राज्य की कृषि को नई दिशा मिल सकती है।
हालांकि केवल नई फसल का प्रचार पर्याप्त नहीं होगा। किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, प्रसंस्करण सुविधाएं और बाजार तक सीधी पहुंच उपलब्ध करानी होगी। यदि किसान उत्पादन तो कर ले, लेकिन उसे उचित मूल्य न मिले, तो नई पहल भी असफल हो सकती है। इसलिए कृषि विभाग, उद्यान विभाग, कृषि विश्वविद्यालयों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी समितियों और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना, मूल्य संवर्धन और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जुड़ाव किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किनोवा को पारंपरिक मोटे अनाजों—जैसे मंडुवा (रागी), झंगोरा, चौलाई और ओगल—का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक फसल के रूप में देखा जाए। उत्तराखंड की पारंपरिक फसलें राज्य की सांस्कृतिक विरासत, पोषण और जैव विविधता की पहचान हैं। किनोवा को इनके साथ फसल विविधीकरण के माध्यम से अपनाया जाना चाहिए, ताकि किसान जोखिम कम कर सकें और आय के नए स्रोत विकसित कर सकें। विविध फसलों पर आधारित कृषि प्रणाली ही भविष्य की सबसे मजबूत और टिकाऊ व्यवस्था साबित होगी।
आज जब केंद्र और राज्य सरकारें श्रीअन्न (मिलेट्स) तथा जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रही हैं, तब उत्तराखंड के लिए यह अवसर है कि वह किनोवा जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को भी अपनी कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए। कृषि अनुसंधान संस्थानों को स्थानीय जलवायु के अनुरूप उन्नत किस्मों के विकास पर ध्यान देना होगा, जबकि सरकार को बीज, प्रशिक्षण, बीमा और विपणन संबंधी योजनाओं के माध्यम से किसानों का विश्वास मजबूत करना होगा।
उत्तराखंड के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि खेती को लाभकारी और युवाओं के लिए आकर्षक बनाने की है। यदि खेती सम्मानजनक आय का माध्यम बनेगी, तभी गांवों से पलायन रुकेगा और पहाड़ की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। किनोवा इस दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है, बशर्ते इसे दूरदर्शी नीति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मजबूत बाजार व्यवस्था का समर्थन मिले।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में कृषि को परंपरा और नवाचार के संतुलन के साथ आगे बढ़ाना ही बुद्धिमानी होगी। उत्तराखंड की धरती ने सदियों से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन को संजोकर रखा है। अब समय है कि यही धरती जलवायु-अनुकूल, पोषणयुक्त और उच्च मूल्य वाली खेती का नया मॉडल प्रस्तुत करे। किनोवा केवल एक नई फसल नहीं, बल्कि भविष्य की उस कृषि का प्रतीक है, जो पर्यावरण की रक्षा, किसानों की समृद्धि और समाज के बेहतर पोषण—तीनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा करने की क्षमता रखती है।

