नई दिल्ली: भारत में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप ने जून 2026 में एक नया रिकॉर्ड बना दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और अंतरराष्ट्रीय जलवायु पैनल (आईपीसीसी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, लगातार बढ़ती हीटवेव के कारण न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त है, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, चरम तापमान के कारण भारत को सालाना अपनी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 1.5 प्रतिशत नुकसान हो रहा है। यह संकट कृषि, श्रमिक उत्पादकता और स्वास्थ्य सेवाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है।
जून में उत्तर भारत के राज्यों जैसे राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के पार दर्ज किया गया। दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में हीटवेव की अवधि पिछले दशक के औसत से दोगुनी हो गई है। इस चरम गर्मी से बिजली की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिससे पावर ग्रिड पर भारी दबाव पड़ा है। वहीं, कृषि क्षेत्र में फसलों पर बुरा असर पड़ा है, जिससे खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
इस संकट के तथ्य और आँकड़े अत्यंत चिंताजनक हैं। प्रमुख आंकड़ों पर नजर डालें तो, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, 2026 में हीटवेव के दिनों की संख्या में पिछले पांच वर्षों की तुलना में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दूसरा, विश्व बैंक की ‘क्लाइमेट डेवलपमेंट रिपोर्ट’ के अनुसार, यदि तापमान में यह वृद्धि इसी दर से जारी रही, तो 2030 तक भारत की कृषि उत्पादकता में 18 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। तीसरा, प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका ‘द लैंसेट’ के एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण हर साल 10,000 से अधिक लोगों की मौत हीट स्ट्रोक से हो रही है, जिनमें 60 प्रतिशत से अधिक बाहरी क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर शामिल हैं।
इस गंभीर स्थिति पर प्रकाश डालते हुए, जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हिंद महासागर में बढ़ते तापमान के कारण मानसून के पैटर्न में अनियमितता आ रही है। आईपीसीसी की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (AR6) भी इस बात की पुष्टि करती है कि दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है, और यहाँ ‘वेट-बल्ब’ तापमान मानव सहनशीलता की सीमा को पार करने के करीब पहुंच रहा है।
इस जलवायवीय बदलाव का सबसे गहरा प्रभाव भारत के असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ रहा है। निर्माण, कृषि और परिवहन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों लोग दिन के समय काम करने में असमर्थ हैं, जिससे उनकी दैनिक आय में भारी कमी आई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार चरम तापमान श्वसन, हृदय रोग और गुर्दे की बीमारियों को बढ़ावा दे रहा है। शहरी क्षेत्रों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव के कारण रात के तापमान में भी राहत नहीं मिल रही है, जिससे लोगों की सामान्य जीवन चर्याता बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
भविष्य की संभावनाओं पर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हरित गृह गैस उत्सर्जन को तत्काल नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। हालांकि, भारत सरकार ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। सोलर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और सतत कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देकर इस संकट से कुछ हद तक निपटा जा सकता है। शोधकर्ता हीट-रेसिस्टेंट फसलों की खेती और शहरी नियोजन में ‘ग्रीन कोरिडोर’ को शामिल करने पर जोर दे रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन अब केवल एक पर्यावरणीय चिंता का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। समय रहते यदि केंद्र और राज्य सरकारें, वैज्ञानिक समुदाय और आम नागरिक मिलकर ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाते हैं, तो यह बढ़ता तापमान देश के विकास की गति को हमेशा के लिए धीमा कर सकता है। जलवायु अनुकूलन और शमन की नीतियों को प्राथमिकता देना ही अब एकमात्र विकल्प बचा है।

