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उत्तराखंड की भाजपा सरकार में शह -मात का खेल शुरू !

अगर मुख्यमंत्री से बड़ा राजनीतिक कद उनके सहयोगी मंत्रियों का हो तो न चाहते हुए भी एक असहज स्थिति उत्पन्न हो जाती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में कम से कम आधा दर्जन ऐसे मंत्री हैं जिनका राजनीतिक कद मुख्यमंत्री से थोड़ा बड़ा है। इस वजह से मुख्यमंत्री का दबाव में आना स्वाभाविक है। इसकी परिणति मंत्रियों की कार्य योजनाओं के ठंडे बस्ते में पड़ने के रूप में सामने आ रही है। अंततः मुख्यमंत्री-मंत्रियों के कोल्ड वार में जनता का नुकसान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तुलना होने पर त्रिवेंद्र सिंह में भी बेचैनी होने लगी। इसीलिए अपनी इमेज बनाने के लिए उन्होंने दर्जन भर से ज्यादा सलाहकारों, मीडिया प्रबंधन और ओएसडी की फौज खड़ी की। इसे मुख्यमंत्री के ईमेज मेंकिंग प्रोग्राम के तौर पर ही देखा जाने लगा। यह टीम मुख्यमंत्री के लिए बड़ी लकीर खींचने के बजाए, फर्जी खबर प्लांट करने लगी। पुरोला की एक महिला के बीमार बच्चे को आधी रात को इलाज की सुविधा मुहैया कराने की खबर सोशल मीडिया में फैलाने की पोल अगले ही दिन खुल गई। कई लोगों का भी मानना है कि मुख्यमंत्री को अपने कामों से बड़ी लकीर खींचनी चाहिए न कि मंत्रियों के कामों को रोक कर।

उत्तराखण्ड सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मंत्रियों की आपसी लड़ाई बंद कमरे से निकलकर सड़क पर आ रही है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने मंत्रियों के जनहित कामों में कोई खास दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। नतीजतन मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बीच दूरियां बढ़ने लगी हैं। इस कारण कई विकास योजनाएं जमीन पर उतरने के बजाए फाइलों में धूल फांकने लगी हैं। इस सबके कारण सत्ताधारी पार्टी को 2019 की तैयारी में काफी दिक्कतें आ रही हैं।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का अधिकतर समय मंत्रियों की आपसी लड़ाई को सुलझाने में ही खत्म हो रहा है। भाजपा आलाकमान ने आम चुनाव 2019 की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने राज्यों की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। मगर उत्तराखण्ड में भाजपा अभी अपनी ही लड़ाइयों में उलझी हुई है। यहां स्वयं सरकार ही विपक्ष का काम कर रही है। त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में सब कुछ ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री बड़ी लकीर खींचने के बजाए मंत्रियों की लकीरों को मिटाकर छोटा करने में लगे दिखाई पड़ते हैं। यह मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के हालिया कई फैसलों से समझ आता है। मुख्यमंत्री के उन फैसलों से पहले उनके कारणों को समझना जरूरी है।

दरअसल, त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में करीब आधे चेहरे ऐसे हैं जिनका राजनीतिक कद उनसे बड़ा है। चाहे पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज हों चाहे वन मंत्री हरक सिंह रावत या फिर समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य इन सबका राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव मुख्यमंत्री से ज्यादा है। सतपाल महाराज 1996-98 में ही केंद्र में राज्य मंत्री रह चुके हैं। गढ़वाल जैसे बड़े लोकसभा क्षेत्र का दो बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। हरक सिंह रावत उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार 1991 के समय मंत्री रहे हैं। उत्तराखण्ड में वह प्रतिपक्ष नेता और कई अहम विभागों के मंत्री रह चुके हैं। वह अभी तक एक भी चुनाव नहीं हारे हैं। यशपाल आर्य स्पीकर से लेकर कांग्रेस के अध्यक्ष तक रहे हैं।

इनके अलावा शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक का राजनीतिक कद भी मुख्यमंत्री से बीस ही है। मुख्यमंत्री डोईवाला से लगातार दो चुनाव हार चुके हैं, जबकि कौशिक ने हरिद्वार में अपना जनाधार इतना मजबूत कर लिया है कि कांग्रेस लाख कोशिश के बाद भी उन्हें यहां से चुनाव में पछाड़ नहीं पाई है। वित्त मंत्री प्रकाश पंत तो प्रदेश की अंतरिम सरकार में स्पीकर रह चुके हैं। इस बार वे मुख्यमंत्री के दावेदार थे पर अंतिम समय में त्रिवेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने। बड़े राजनीतिक कद वाले नेताओं के मंत्रिमंडल में होने के कारण मंत्री स्वतंत्र होकर काम करना चाहते हैं। सरकार के शुरूआती कार्यकाल में ही प्रदेशवासी मानने लगे थे कि कई मंत्री मुख्यमंत्री से बेहतर काम कर रहे हैं। कुछ मंत्रियों ने अपने कामों से मीडिया में सुर्खियां भी बटोरी। ऐसे में मुख्यमंत्री को भी अपने कामों में तेजी लानी चाहिए थी। पर वे अपने मंत्रियों के कामों और फैसलों को पलट दे रहे हैं। जिस कारण सरकार के कामों पर ही प्रतिकूल असर पड़ने लगा है।

विद्यालयी शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डे जल्द ही राज्य के सबसे बेहतरीन और तेजी से काम करने वाले मंत्री के तौर पर अपनी पहचान बनाने लगे थे। उन्होंने कई कड़े और अहम फैसले लिये। जिससे लोगों में विद्याालयी शिक्षा का स्तर सुधरने की आस जगने लगी। पर सरकार के कुल पांच महीनों के कार्यकाल में पाण्डे विभाग में अपने निर्णयों को लागू करवाने में नाकाम रहे हैं। उन्होंने निजी स्कूलों में फीस की लूट को बंद करवाने, स्थानांतरण एवं अटैचमेंट को खत्म करने और शिक्षकों को ड्रेस कोड लागू करवाने के अलावा शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा किया था। पर मंत्री दावे को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। सूत्रों की मानें तो इसके पीछे मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का हाथ बताया जा रहा है क्योंकि स्वयं मुख्यमंत्री ने शिक्षकों के उन मामलों में सीधा हस्तक्षेप किया है जिन पर अरविंद पाण्डे ने कठोर कार्यवाही की बात कही थी। स्थानांतरण और ड्रेसकोड को लेकर मंत्री एवं शिक्षकों में हुए टकराव पर मुख्यमंत्री ने सीधा हस्तक्षेप किया।

सूत्रों की मानें तो शिक्षक भी मंत्री अरविंद पाण्डे को बाईपास करने लगे हैं। हाल में ही शिक्षकों के एक शिष्टमंडल ने मुख्यमंत्री से बैठक की जिसमें मुख्यमंत्री की पत्नी भी शामिल थीं । उस बैठक में ड्रेस कोड सहित शिक्षकों की अन्य मांगों को मान लिया गया। हैरानी इस बात की है कि इस महत्वपूर्ण बैठक में शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डे को शामिल तक नहीं किया गया।

प्राथमिक शिक्षकों की सेवानिवृति का एक भव्य समारोह किया गया। जिसमें कई शिक्षकों को सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री इसके मुख्य अतिथि थे। देहरादून में संपन्न इस कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री को आमंत्रित तक नहीं किया गया और न ही उनका नाम निमंत्रण पत्र में लिखा गया। इससे साफ है कि मुख्यमंत्री ने शिक्षा विभाग की अपने ही मंत्री को बाईपास करने की नीति का मौन समर्थन किया है। शिक्षकों के अचैटमेंट के मामले में कड़ा रुख अख्तियार करते हुए पाण्डे ने भाजपा के बड़े नेताओं की पत्नियों तक को नहीं बख्शा था। खबर है कि सीएम के एक करीबी रिश्तेदार भी पांडे की नो अचैटमेंट नीति से प्रभावित हो गए थे। बाद में भारी बदलाव के चलते उनका ट्रांसफर रद्द किया गया।

वित्त मंत्री प्रकाश पंत के साथ सबसे बड़ा मामला नई आबकारी नीति को लेकर है। उच्चतम न्यायालय एवं नैनीताल उच्च न्यायलय के आदेश के बाद प्रदेश की जनता खुश थी। मगर त्रिवेंद्र सरकार ने शराब की दुकान बंद न करने के लिए कई तरीके अपनाए। जिससे पूरे प्रदेश में जनता भड़क उठी। प्रकाश पंत के पास आबकारी विभाग होने के कारण इसका सारा ठीकरा प्रकाश पंत पर ही फूटा। उस समय मुख्यमंत्री ने एक बार भी मीडिया के सामने आकर अपनी बात नहीं रखी। जबकि बताया जाता है कि मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देश पर ही सरकार सुप्रीम कोर्ट में नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ गई। सूत्रों की मानें तो पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत सरकार के समय डेनिस नाम की शराब ब्रांड को फिर से राज्य में लाने के लिए गोपनीय बैठक हो चुकी है। जल्द ही डेनिस पूर्व की भांति राज्य में शराब के कारोबार में नामी ब्रांड बनने वाली है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति और मजबूत लोकायुक्त न दे पाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार अब भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थाई जांच आयोग के गठन की बात करके मामले को ओैर भी पेचीदा बना रही है। इसी तरह एनएच 74 की सीबीआई जांच का सहमति पत्र अभी तक राज्य के गृह विभाग को नहीं मिल पाया है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो सरकार गठन के बाद जिस तेजी से सरकार के कई मंत्रियों ने अपने कामकाज को लेकर एक अलग पहचान बनाई उससे सरकार के भीतर ही बेचैनी बढ़ने लगी।

 

मंत्रियों की आपसी लड़ाई को सुलझाने में भी मुख्यमंत्री ने कोई दिचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि उनका स्वयं का संबंध मंत्रियों से अच्छा नहीं है।

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