Thursday, July 9, 2026
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आख़िर CRED के कुणाल शाह ही क्यों बने Whatsapp के नए ग्लोबल CEO

आखिर मेटा को कुणाल शाह की ही जरूरत क्यों पड़ी। इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि व्हाट्सएप किस समस्या से जूझ रहा है। व्हाट्सएप के दुनियाभर में करीब 3 अरब उपयोगकर्ता हैं, लेकिन इसके बावजूद यह मेटा के कुल राजस्व में मुश्किल से 1 प्रतिशत का योगदान देता है। यह आंकड़ा हैरान करने वाला है, क्योंकि मेटा ने 2014 में 19 अरब डॉलर चुकाकर व्हाट्सएप का अधिग्रहण किया था,

नई दिल्ली/बेंगलुरु (Mohan Bhulanie) :  भारतीय स्टार्टअप जगत में सबसे बड़ी खबर फिनटेक कंपनी क्रेड (CRED) से जुड़ी रही। दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शुमार मेटा ने क्रेड में 900 मिलियन डॉलर यानी करीब 7,500 करोड़ रुपये का निवेश किया है। लेकिन इस पूरे सौदे में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि क्रेड के संस्थापक कुणाल शाह अपनी ही कंपनी को छोड़कर मेटा के स्वामित्व वाले मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप के वैश्विक सीईओ का पद संभालने जा रहे हैं। इस डील की एक और अनोखी परत यह है कि मेटा इसमें केवल एक अल्पांश (माइनॉरिटी) निवेशक के रूप में शामिल हो रहा है, और उसे क्रेड के उपयोगकर्ताओं के किसी भी वित्तीय डेटा तक पहुंच नहीं मिलेगी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर मेटा इतनी बड़ी रकम किस चीज़ के लिए चुका रहा है।

CRED की उतार-चढ़ाव भरी यात्रा

इस सौदे को समझने से पहले क्रेड की हाल के वर्षों की कहानी जानना जरूरी है। क्रेड को 2022 में उसके शिखर पर 6.4 अरब डॉलर का मूल्यांकन मिला था। इसके बाद स्टार्टअप जगत में आई फंडिंग की सुस्ती के दौर में कंपनी अगले तीन वर्षों तक एक भी डॉलर जुटाने में नाकाम रही। आखिरकार कंपनी ने 72 मिलियन डॉलर का एक अपेक्षाकृत छोटा दौर जुटाया, लेकिन इसके लिए उसे अपना मूल्यांकन घटाकर 3.5 अरब डॉलर करना पड़ा, जो 2022 के शिखर मूल्यांकन से लगभग आधा था।

हालांकि, इन तमाम चुनौतियों के बावजूद क्रेड कभी भी एक असफल कंपनी नहीं रही। कंपनी के मौजूदा समय में करीब 1.7 करोड़ मासिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं और यह भारत के कुल क्रेडिट कार्ड बिल भुगतान का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्रोसेस करती है। हाल ही में कंपनी पहली बार मुनाफे में भी आई है। यह भी उल्लेखनीय है कि कुणाल शाह ने ही भारत में समय पर बिल चुकाने पर लोगों को पुरस्कृत करने की यह पूरी श्रेणी खड़ी की थी, और यही श्रेणी-निर्माण की सोच मेटा को आकर्षित कर रही थी, जिसके चलते व्हाट्सएप के अगले सीईओ की तलाश के दौरान कंपनी ने कुणाल से संपर्क किया।

लेकिन जाहिर है, कुणाल शाह इतनी आसानी से अपनी बनाई कंपनी को छोड़ने वाले नहीं थे। उन्होंने इस कंपनी को शून्य से खड़ा किया है और खासतौर पर उस समय जब कंपनी सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की तैयारी कर रही है, कंपनी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इसी वजह से मेटा ने कुणाल के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसे ठुकराना मुश्किल था। सबसे पहले मेटा ने क्रेड में उसके पिछले दौर से बेहतर मूल्यांकन पर 900 मिलियन डॉलर का निवेश किया, जो कंपनी को आईपीओ तक ले जाने के लिए पर्याप्त रकम मानी जा रही है। इस तरह जब क्रेड का भविष्य सुरक्षित हो गया, तब कुणाल आसानी से व्हाट्सएप की ओर रुख कर सके।

Meta की पुरानी रणनीति की झलक

गौर करने वाली बात यह है कि मेटा ने ठीक ऐसा ही कुछ 2025 में भी किया था। पिछले साल मेटा ने स्केल एआई (Scale AI) में 14.5 अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश किया था, वह भी एक गैर-मतदान अधिकार (नॉन-वोटिंग) वाले हिस्से के लिए। इस सौदे के तहत मेटा ने स्केल एआई के सीईओ अलेक्जेंडर वांग को अपनी नई सुपर इंटेलिजेंस लैब्स यूनिट का नेतृत्व करने के लिए हासिल कर लिया था। यानी क्रेड-व्हाट्सएप सौदा भी उसी रणनीति की एक कड़ी माना जा रहा है, जिसमें मेटा बड़ी रकम निवेश कर किसी सफल संस्थापक की प्रतिभा को अपनी टीम में शामिल करता है।

Whatsapp कमाई की चुनौती

अब सवाल यह उठता है कि आखिर मेटा को कुणाल शाह की ही जरूरत क्यों पड़ी। इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि व्हाट्सएप किस समस्या से जूझ रहा है। व्हाट्सएप के दुनियाभर में करीब 3 अरब उपयोगकर्ता हैं, लेकिन इसके बावजूद यह मेटा के कुल राजस्व में मुश्किल से 1 प्रतिशत का योगदान देता है। यह आंकड़ा हैरान करने वाला है, क्योंकि मेटा ने 2014 में 19 अरब डॉलर चुकाकर व्हाट्सएप का अधिग्रहण किया था, और एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह ऐप कंपनी के राजस्व में नगण्य योगदान ही दे पा रहा है।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि व्हाट्सएप के सबसे बड़े बाजार भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया हैं, जो मिलकर इसके कुल उपयोगकर्ता आधार का आधे से अधिक हिस्सा बनाते हैं। ये सभी विकासशील बाजार हैं, जिन्हें मुद्रीकरण यानी कमाई के लिहाज से सबसे कठिन माना जाता है, खासकर भारत। ऐसा नहीं है कि व्हाट्सएप ने कोशिश नहीं की। कंपनी ने 2018 में व्हाट्सएप बिजनेस ऐप लॉन्च किया था, जिसके तहत व्यवसायों को सत्यापित प्रोफाइल बनाने, ग्राहकों से बातचीत करने, स्वचालित संदेश भेजने और अपने ऑर्डर प्रबंधित करने की सुविधा दी गई—यह सब व्हाट्सएप के भीतर ही। इसके बदले व्यवसाय हर भेजे गए संदेश के लिए भुगतान करते हैं, और यही अब तक व्हाट्सएप की कमाई का प्रमुख जरिया रहा है।

लेकिन मेटा की महत्वाकांक्षा इससे कहीं आगे है। कंपनी चाहती है कि व्हाट्सएप “कन्वर्सेशनल कॉमर्स” यानी बातचीत-आधारित वाणिज्य के लिए एक संपूर्ण मंच बने, जहां उपयोगकर्ता खरीदारी करें, भुगतान करें, कर्ज लें और बीमा खरीदें—यह सब कुछ व्हाट्सएप के भीतर ही हो जाए। मार्क जुकरबर्ग सार्वजनिक रूप से बिजनेस मैसेजिंग को मेटा के कारोबार का अगला बड़ा स्तंभ बता चुके हैं। कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार अकेले यह बिजनेस मैसेजिंग खंड कई अरब डॉलर का है, और विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि मेटा ने इसे सही तरीके से क्रियान्वित किया, तो यह 2027 तक 10 से 15 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

इसके अलावा उपभोक्ता भुगतान का खंड भी है। मेटा ने 2018 में भारत में व्हाट्सएप पे लॉन्च किया था, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी भारत के यूपीआई लेनदेन बाजार में व्हाट्सएप पे की हिस्सेदारी महज 0.65 प्रतिशत है। इस पर एक सलाहकार का कहना है कि भारत में व्हाट्सएप के इतने ज्यादा उपयोगकर्ता होने की वजह सिर्फ यह है कि यह सेवा मुफ्त है, जबकि भारतीय उपयोगकर्ताओं को अपने पैसे खर्च करने के लिए राजी करना बेहद मुश्किल काम माना जाता है। यही व्हाट्सएप की मूल समस्या है—इसके सबसे बड़े बाजार भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया के उपयोगकर्ता अमेरिका या यूरोप में फेसबुक के उपयोगकर्ताओं जैसे नहीं हैं। ये अत्यधिक मूल्य-संवेदनशील उपयोगकर्ता हैं, और इनका भरोसा जीतकर इनसे पैसा खर्च करवाना एक बड़ी चुनौती है।

कुणाल शाह ही क्यों चुने गए

यहीं पर कुणाल शाह की भूमिका सामने आती है। कुणाल भारत में एक नहीं बल्कि दो फिनटेक कंपनियां खड़ी कर चुके हैं। 2010 में उन्होंने एक ऐसा मंच बनाया था जो लोगों को अपने प्रीपेड मोबाइल फोन का ऑनलाइन रिचार्ज करने और उस लेनदेन पर कैशबैक पाने की सुविधा देता था। आज यह बात मामूली लग सकती है क्योंकि अब हर कोई ऐसा कर रहा है, लेकिन 2010 में भारतीय उपयोगकर्ताओं को डिजिटल वॉलेट में पैसे डालने के लिए राजी करना लगभग असंभव काम था। उस समय न तो पेटीएम मौजूद था, न यूपीआई और न ही किसी तरह का डिजिटल भुगतान ढांचा। इसके बावजूद कुणाल ने इसे बेहद सफलतापूर्वक अंजाम दिया, एक नई आदत विकसित की और शून्य से एक बिल्कुल नई श्रेणी तैयार की, जिससे लाखों लोगों ने डिजिटल वॉलेट पर भरोसा करना शुरू किया। इसके बाद 2015 में उन्होंने इस कंपनी को 400 मिलियन डॉलर में स्नैपडील को बेच दिया।

फिर 2018 में उन्होंने क्रेड की शुरुआत की, और इसके साथ उन्होंने इससे भी कठिन काम किया। उन्होंने समय पर क्रेडिट कार्ड बिल चुकाने जैसे बेहद उबाऊ उपभोक्ता व्यवहार को एक स्टेटस सिंबल में बदल दिया। उन्होंने ऐसा एक्सक्लूसिव मंच बनाया, जिसमें शामिल होने के लिए उपयोगकर्ता का क्रेडिट स्कोर 750 से ऊपर होना जरूरी था। यानी उन्होंने एक साधारण वित्तीय उत्पाद को उपयोगिता की बजाय एक विशेषाधिकार जैसा एहसास दिलाया। आज क्रेड पर 1.7 करोड़ उपयोगकर्ता अपने क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान करते हैं।

कुल मिलाकर, कुणाल शाह दो चीजें बेहद बखूबी करते हैं—पहला, वे श्रेणी-निर्माण यानी बिल्कुल नई श्रेणी खड़ी करने की कला समझते हैं, और दूसरा, वे भारत जैसे विकासशील बाजारों में लोगों से पैसा खर्च करवाने का तरीका जानते हैं। और यही ठीक वह क्षमता है जिसकी मेटा को जरूरत है। यदि कोई एक व्यक्ति व्हाट्सएप से अधिकतम मूल्य निकालने और व्यवसायों को अपने लेनदेन के लिए व्हाट्सएप पर भरोसा करने के लिए राजी कर सकता है, तो वह कुणाल शाह ही हैं—कम से कम मेटा की यही सोच है, और इसी वजह से कंपनी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 900 मिलियन डॉलर खर्च कर रही है।

अमेरिकी टेक कंपनियों में निवेश की बढ़ती संभावनाएं

विश्लेषकों का कहना है कि मेटा का यह 900 मिलियन डॉलर का कदम असल में भविष्य पर लगाया गया एक दांव है। मौजूदा दौर में दुनिया का सबसे समझदार पैसा एआई क्रांति के चलते अमेरिकी टेक कंपनियों की ओर रुख कर रहा है। गूगल, एनवीडिया और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के शेयरों में पिछले एक साल में जबरदस्त उछाल देखा गया है। यदि कुणाल शाह अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करते हैं, तो यह सौदा मेटा के राजस्व के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

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