Sunday, February 8, 2026
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हरिद्वार नगर निगम जमीन खरीद घोटाले में बड़े अधिकारियों पर कब होगी कारवाही

हरिद्वार नगर निगम में 35 बीघा जमीन की खरीद में कथित 58 करोड़ रुपये के घोटाले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस मामले में चार वरिष्ठ अधिकारियों—सहायक नगर आयुक्त रविंद्र कुमार दयाल, अधिशासी अभियंता आनंद सिंह मिश्रवाण, कर एवं राजस्व अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट और जेई दिनेश चंद्र कांडपाल—को निलंबित कर दिया गया है। ये चारों जमीन खरीद के लिए गठित समिति के सदस्य थे और इस सौदे को अंजाम देने की जिम्मेदारी इन्हीं पर थी।

अनियमितताओं का पिटारा
नवंबर 2024 में नगर निगम ने सराय कूड़ा निस्तारण केंद्र के निकट 35 बीघा जमीन 54 करोड़ रुपये में खरीदी थी, जिसमें 6 करोड़ रुपये स्टांप ड्यूटी के रूप में सरकारी खजाने में जमा हुए। हालांकि, इस सौदे में कई अनियमितताएं सामने आई हैं:

1. जमीन का सर्किल रेट 58 करोड़ रुपये दर्शाया गया, जबकि इसका वास्तविक बाजार मूल्य 10 करोड़ रुपये से भी कम बताया जा रहा है। भूमि का मूल उपयोग कृषि था, जिसका सर्किल रेट लगभग 6,000 रुपये प्रति बीघा था। यदि इसे कृषि भूमि के रूप में खरीदा जाता, तो इसकी कीमत लगभग 15 करोड़ रुपये होती। लेकिन, लैंड यूज को बदलकर कीमत को 54 करोड़ रुपये तक बढ़ा दिया गया।

2. जमीन खरीद के लिए कोई पारदर्शी बोली प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, जो सरकारी खरीद नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। साथ ही, नगर निगम ने इस खरीद के लिए शासन से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली।

3.जमीन को गोदाम बनाने के लिए धारा 143 के तहत सशर्त अनुमति दी गई थी, जिसमें शर्त थी कि यदि भूमि का उपयोग निर्धारित प्रयोजन से अलग किया गया, तो अनुमति स्वतः निरस्त हो जाएगी। आरोप है कि इस जमीन का उपयोग कूड़ा डंपिंग के लिए किया गया, जो अनुमति का उल्लंघन हो सकता है।

मामले के तूल पकड़ने के बाद मेयर किरण जैसल ने इस सौदे पर सवाल उठाए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की जांच वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रणवीर सिंह को सौंपी। जांच के बाद चार अधिकारियों को निलंबित किया गया, और जमीन बेचने वाले किसान के खातों को फ्रीज करने के आदेश दिए गए।

घोटाले में पूर्व नगर प्रशासक (एमएनए) वरुण चौधरी पर सर्किल रेट का दुरुपयोग कर सौदा करने का आरोप है। इसके अलावा, एक आईएएस अधिकारी की पत्नी द्वारा संचालित एनजीओ की संलिप्तता भी जांच के दायरे में है। जिलाधिकारी कर्मेन्द्र सिंह और नगर निगम आयुक्त भी जांच के घेरे में हैं, जिससे इस घोटाले में उच्चस्तरीय संलिप्तता की आशंका बढ़ गई है।

इस तरह के बड़े सौदों में तहसील और नगर निगम की संयुक्त जांच अनिवार्य होती है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यह प्रशासनिक लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण है। साथ ही, सर्किल रेट और लैंड यूज में बदलाव की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव रहा।

यह घोटाला न केवल वित्तीय अनियमितताओं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को उजागर करता है। इस मामले की गहन जांच से न केवल दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, बल्कि भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए कड़े नियम और पारदर्शी प्रक्रियाएं भी लागू की जानी चाहिए।

हरिद्वार जैसे पवित्र शहर में इस तरह का घोटाला न केवल प्रशासनिक विश्वास को ठेस पहुंचाता है, बल्कि जनता के बीच भी आक्रोश पैदा करता है। अब यह देखना बाकी है कि जांच का नतीजा क्या निकलता है और क्या इस मामले में पूर्ण न्याय हो पाता है।

यह मामला केवल एक घोटाला नहीं, बल्कि सिस्टम की उन खामियों का प्रतीक है, जो बार-बार सामने आती हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न केवल दोषियों को दंडित करे, बल्कि प्रक्रियाओं को और सुदृढ़ करे ताकि भविष्य में ऐसी गलतियां न दोहराई जाएं।

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