देश के रणनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बदलाव तब दर्ज हुआ, जब 2 अक्टूबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड के चमोली जिले में बसे माणा गांव का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने माणा को ‘भारत का अंतिम गांव’ के बजाय ‘भारत का प्रथम गांव’ घोषित कर दिया। यह महज एक नाम का परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि अब देश की सीमाएं विकास की शुरुआत का प्रतीक बनेंगी, न कि अंत का। इस घोषणा ने सीमावर्ती क्षेत्रों के प्रति केंद्र सरकार की नई सोच और प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाया। इसी क्रम में शुरू हुआ वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम (Vibrant Villages Programme – VVP), जो सीमावर्ती गांवों को आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक रूप से मजबूत बनाने की एक महत्वाकांक्षी योजना है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में पलायन की समस्या कई दशकों से गंभीर चुनौती बनी हुई है। खासकर चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों में युवाओं का पलायन इतना तेज हुआ है कि कई गांव लगभग सुनसान हो चुके हैं। ऐसे में वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम इन गांवों के लिए वरदान साबित हो रहा है। इस योजना के तहत उत्तराखंड में कुल 91 गांवों को शामिल किया गया है। इनमें से 51 गांव चीन सीमा से लगते हैं, जबकि 40 गांव नेपाल सीमा से सटे हुए हैं।
चीन सीमा से जुड़े 51 गांवों (जो पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जिलों में फैले हुए हैं) के विकास के लिए पहले चरण में ही केंद्र सरकार ने विशेष ध्यान दिया। इन गांवों में लगभग 345 किलोमीटर लंबी सीमा चीन से मिलती है, इसलिए इनका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है। पहले चरण में इन गांवों के लिए 212 करोड़ रुपये की 179 योजनाएं स्वीकृत की गईं और वर्तमान में ये कार्य जोर-शोर से चल रहे हैं। कुल मिलाकर वाइब्रेंट विलेज और कन्वर्जेंस योजनाओं के माध्यम से 523 परियोजनाएं मंजूर हुई हैं, जिनकी अनुमानित लागत 520.13 करोड़ रुपये है। इसमें 161 परियोजनाएं सीधे वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के अंतर्गत हैं, जबकि 362 परियोजनाएं विभिन्न विभागों के कन्वर्जेंस से जुड़ी हुई हैं।
इस कार्यक्रम की खासियत यह है कि विकास के कार्य 10 प्रमुख थीम्स पर आधारित हैं। इनमें शामिल हैं—आजीविका सृजन, बुनियादी ढांचे का विकास, स्वच्छ जल आपूर्ति, विद्युतीकरण, सड़क संपर्क, दूरसंचार, पर्यटन प्रोत्साहन, होमस्टे व्यवसाय, कृषि और उद्यान विकास। इन सभी पहलुओं को एक साथ आगे बढ़ाकर गांवों को आत्मनिर्भर और आकर्षक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, पिथौरागढ़ जिले के कई वाइब्रेंट विलेजों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत पांच नई सड़कों को मंजूरी मिल चुकी है, जिससे इन दूरस्थ इलाकों तक पहुंच आसान हो रही है।
वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम 2.0 के तहत अब नेपाल सीमा से सटे चंपावत, पिथौरागढ़ और ऊधम सिंह नगर जिलों के 40 गांवों को भी शामिल किया गया है। इन गांवों का विस्तृत सर्वेक्षण कार्य प्रगति पर है। सर्वेक्षण के आधार पर यहां के लिए अलग से कार्ययोजना तैयार की जा रही है, जिसे शीघ्र ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। इन गांवों में भी प्रथम चरण की तर्ज पर ही विकास कार्य होंगे। साथ ही इन क्षेत्रों में ऑल-वेदर सड़कें, 4जी मोबाइल संचार, टेलीविजन कनेक्टिविटी और ग्रिड से निरंतर बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की योजना है।
उत्तराखंड के संदर्भ में देखें तो सीमावर्ती गांवों का खाली होना केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। सीमा पर रहने वाले स्थानीय निवासी ही सबसे पहले किसी भी असामान्य गतिविधि की सूचना सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाते हैं। वे अनजाने में देश के प्रथम सुरक्षा प्रहरी का काम करते हैं। इसलिए इन गांवों को खाली होने से रोकना अत्यंत आवश्यक है। वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम इसी उद्देश्य से बनाया गया है कि लोग गांवों में रहें, बसे रहें और वहां जीवन की सभी सुविधाएं उपलब्ध हों।
आजीविका के क्षेत्र में विशेष जोर दिया जा रहा है। होमस्टे, पर्यटन, स्थानीय हस्तशिल्प, जैविक खेती, औषधीय पौधों की खेती और पर्यटन से जुड़े व्यवसायों को बढ़ावा देकर युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। इन गांवों को ‘मॉडल टूरिज्म विलेज’ के रूप में विकसित करने की योजना है, ताकि देश-विदेश से पर्यटक यहां पहुंचें और गांव में साल भर चहल-पहल बनी रहे। इससे न केवल आर्थिक उन्नति होगी, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी सुरक्षित रहेगी।
केंद्र सरकार के इस प्रयास को राज्य सरकार की ‘मुख्यमंत्री सीमांत क्षेत्र विकास योजना’ से भी मजबूती मिल रही है। दोनों योजनाएं मिलकर सीमावर्ती गांवों को नया जीवन दे रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कार्यक्रम सफल रहा, तो यह पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है।
वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम केवल इमारतें और सड़कें बनाने का नाम नहीं है। यह एक नई सोच है, जो सीमा को विकास की शुरुआत बनाती है। यह उन लाखों लोगों के जीवन को संवारने का प्रयास है, जो पहाड़ों की गोद में रहकर देश की रक्षा करते हैं। जब ये गांव जीवंत होंगे, चमकेंगे और फलेंगे-फूलेंगे, तो निश्चित रूप से देश की सुरक्षा भी मजबूत होगी और सीमावर्ती क्षेत्र विकास का नया अध्याय लिखेंगे।

