Sunday, February 8, 2026
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उत्तराखंड में वन क्षेत्रों का डिजिटल सीमांकन

उत्तराखंड में वन क्षेत्रों की सीमाओं को लेकर लंबे समय से चली आ रही असमंजस और विवाद की स्थिति को खत्म करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया जा रहा है। पहली बार प्रदेश के वन क्षेत्रों का डिजिटल सीमांकन किया जाएगा, जिससे सीमाओं की सटीकता सुनिश्चित होगी और विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे। इस दिशा में उत्तराखंड शासन ने 22 सितंबर 2025 को डिजिटल सीमांकन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है, जिसके आधार पर पूरे राज्य में यह कार्य किया जाएगा।

वन क्षेत्र का विवरण

उत्तराखंड में कुल 38 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र है, जिसमें:

  • 26.5 लाख हेक्टेयर आरक्षित वन

  • 9.88 लाख हेक्टेयर संरक्षित वन

  • 1.57 लाख हेक्टेयर अवर्गीकृत वन शामिल हैं।

यह क्षेत्र 34 डिवीजन और सात वाइल्डलाइफ डिवीजन के तहत प्रबंधित किया जाता है। लंबे समय से इस विशाल वन क्षेत्र के डिजिटल सीमांकन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने 6 जुलाई 2011 को वन क्षेत्रों के लिए आधारित डेटाबेस तैयार करने के निर्देश दिए थे, जिसके बाद केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 2019 में एक समिति का गठन किया था।

ओडिशा मॉडल से प्रेरणा

उल्लेखनीय है कि ओडिशा में वन क्षेत्रों के डिजिटल सीमांकन का कार्य पहले ही किया जा चुका है। केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने ओडिशा की जियो-रेफरेंसिंग आधारित एसओपी को एक मॉडल के रूप में मान्यता दी है। उत्तराखंड ने भी अब इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए अपनी एसओपी जारी की है। इस एसओपी में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा तैयार दिशा-निर्देशों को शामिल किया गया है, जिसमें डिजिटल सीमांकन के दौरान ध्यान रखने योग्य सभी पहलुओं को स्पष्ट किया गया है।

कार्यान्वयन की प्रक्रिया

  • कोई नया पद नहीं: इस कार्य के लिए कोई अतिरिक्त पद सृजित नहीं किया जाएगा। समय-सीमा निर्धारित की जाएगी और कैंपा (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) फंड का उपयोग भी इस प्रक्रिया में किया जाएगा।

  • सेवानिवृत्त कर्मचारियों की भागीदारी: सेवानिवृत्त अधिकारियों और कर्मचारियों को भी इस कार्य में शामिल करने का प्रावधान है।

  • विभागीय समन्वय: आईटी विभाग, राजस्व विभाग, आपदा प्रबंधन विभाग और अन्य संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित किया जाएगा। सैटेलाइट इमेजरी और सर्वे ऑफ इंडिया की तकनीकी सहायता ली जाएगी।

  • सत्यापन और पारदर्शिता: जियो-रेफरेंसिंग और डीजीपीएस सर्वेक्षण की सटीकता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए तीसरे पक्ष से सत्यापन अनिवार्य होगा। प्रशिक्षित कर्मचारी और अधिकारी इस तकनीकी कार्य को अंजाम देंगे, और कर्मचारियों को इसके लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

सीमा सत्यापन और समितियों का गठन

वन और राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा सीमा स्तंभों का संयुक्त सत्यापन किया जाएगा। यदि कोई विवाद या प्रकरण सामने आता है, तो उसके निपटारे के लिए निम्नलिखित समितियां गठित की जाएंगी:

  • तहसील स्तर: एसडीएम की अध्यक्षता में।

  • जिला स्तर: जिलाधिकारी की अध्यक्षता में।

  • राज्य स्तर: मुख्य सचिव की अध्यक्षता में।

डेटा प्रबंधन और निगरानी

  • जीआईएस आधारित सिस्टम: प्रदेश में वन विभाग के लिए जीआईएस आधारित वन एलआईएस-डीएसएस (Land Information System-Decision Support System) का संचालन होगा।

  • राज्य वन डाटा प्रबंधन केंद्र: प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) के कार्यालय में स्थापित किया जाएगा।

  • राज्य स्तरीय निगरानी समिति: मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित यह समिति कार्य की प्रगति की समीक्षा करेगी और विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित करेगी।

प्रमुख वन संरक्षक का बयान

प्रमुख वन संरक्षक समीर सिन्हा ने कहा,

“डिजिटल सीमांकन वन क्षेत्रों के लिए एक क्रांतिकारी कदम है। इसके पूरा होने के बाद वन सीमाओं से संबंधित किसी भी तरह की गड़बड़ी की संभावना समाप्त हो जाएगी। यह कार्य न केवल पारदर्शिता लाएगा, बल्कि वन प्रबंधन को और सुदृढ़ करेगा।”

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