(NTI): जापानी निवेशक सॉफ्टबैंक ग्रुप ओपनएआई में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए $40 बिलियन (लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये) तक का ब्रिज लोन लेने की तैयारी कर रहा है। यह डॉलर में सॉफ्टबैंक का अब तक का सबसे बड़ा उधार होगा। वहीं, पिछले तीन वर्षों में सॉफ्टबैंक ने भारत में कोई नया निवेश नहीं किया है। उल्टा, वह अपने पोर्टफोलियो से तेजी से निकल रहा है। हाल के छह महीनों में उसने ओला इलेक्ट्रिक, लेंसकार्ट, इनमोबी, पॉलिसीबाजार और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों से एग्जिट किया है। कुल मिलाकर भारत में $14 बिलियन निवेश करने के बाद अब तक केवल $7.4 बिलियन ही रिकवर हो पाए हैं। यह कंट्रास्ट भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए कई सवाल खड़े करता है।
सॉफ्टबैंक के संस्थापक मसयोशी सोन एआई को भविष्य की सबसे बड़ी तकनीक मानते हैं। ओपनएआई उनके लिए सिर्फ एक स्टार्टअप नहीं, बल्कि एआई युग का बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर है – बिजली ग्रिड या क्लाउड कंप्यूटिंग जितना महत्वपूर्ण। सॉफ्टबैंक पहले ही ओपनएआई में अरबों डॉलर लगा चुका है। अब $40 बिलियन का अतिरिक्त निवेश करने के लिए जेपी मॉर्गन समेत चार बैंक से लोन की बात चल रही है। यह लोन 12 महीने का ब्रिज लोन होगा। अगर ओपनएआई का आईपीओ सफल रहा और उसकी वैल्यूएशन $1 ट्रिलियन तक पहुंची तो सॉफ्टबैंक को भारी रिटर्न मिल सकता है।
इसके ठीक उलट भारतीय बाजार में सॉफ्टबैंक की स्थिति अलग है। 2023 से 2026 तक तीन वर्षों में सॉफ्टबैंक ने भारत में कोई बड़ा नया निवेश नहीं किया। वह मौजूदा कंपनियों में भी अतिरिक्त फंड नहीं डाल रहा। बल्कि बिक्री का सिलसिला तेज है। हाल के महीनों में उसने ओला इलेक्ट्रिक में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 13.5 प्रतिशत कर दी है। लेंसकार्ट, इनमोबी और अन्य कंपनियों से भी आंशिक या पूर्ण एग्जिट किया है। फ्लिपकार्ट, पेटीएम, जोमैटो और पॉलिसीबाजार से पहले ही पूर्ण निकासी हो चुकी है।
सॉफ्टबैंक के भारत में कुल निवेश लगभग $14 बिलियन रहे हैं। इनमें से अब तक $7.4 बिलियन रियलाइज हो चुके हैं। दिसंबर 2025 तक भारत में उसके पोर्टफोलियो की वैल्यू $13.7 बिलियन बताई जा रही है। इसमें स्विगी, मीशो, लेंसकार्ट जैसी कंपनियों के आईपीओ से कुछ फायदा हुआ है, लेकिन कुल मिलाकर रिटर्न निराशाजनक रहे हैं।
सॉफ्टबैंक की निवेश शैली पारंपरिक वेंचर कैपिटल फंड्स से अलग है। वह 10-20 प्रतिशत ग्रोथ नहीं, बल्कि बाजार पर 100 प्रतिशत कब्जा चाहता है। चीन में 2000 में अलिबाबा को $20 मिलियन दिए थे, जो 2014 में $60 बिलियन बन गए। अमेरिका में वीवर्क को $14 बिलियन दिए। भारत में भी 2014-15 के आसपास इसी रणनीति से निवेश शुरू किया। उस समय स्टार्टअप इंडिया कार्यक्रम शुरू हुआ था और कई रिपोर्ट्स भारत को अगला बड़ा बाजार बता रही थीं।
सॉफ्टबैंक ने ई-कॉमर्स में स्नैपडील, हॉस्पिटैलिटी में ओयो, फिनटेक में पेटीएम और राइड-हेलिंग में ओला को बड़े चेक दिए। इन कंपनियों में इतना पैसा डाला कि दूसरे निवेशक मुकाबला नहीं कर सके। मसयोशी सोन ने कहा था कि भारत चीन से भी बड़ा ग्रोथ स्टोरी बनेगा और यहां आंख बंद करके निवेश किया जा सकता है।
लेकिन दस वर्ष बाद ज्यादातर दांव असफल रहे। स्नैपडील अमेजन और फ्लिपकार्ट से हार गया क्योंकि भारत में लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन चीन जितनी मजबूत नहीं थी। मार्केटप्लेस मॉडल यहां काम नहीं किया। ओला कैब्स उबर और रैपिडो से पीछे रह गया। ओला इलेक्ट्रिक में भी स्टॉक गिरावट के कारण भारी नुकसान हुआ। ओयो की वैल्यूएशन $10 बिलियन से घटकर $2.4-7 बिलियन के आसपास रह गई। पेटीएम में रेगुलेटरी और गवर्नेंस मुद्दों से $500 मिलियन से ज्यादा का नुकसान हुआ।
विशेषज्ञों के अनुसार तीन मुख्य कारण हैं। पहला, भारतीय बाजार की गहराई उतनी नहीं जितनी सॉफ्टबैंक ने सोची थी। यहां कोई स्टार्टअप अभी $100 बिलियन वैल्यूएशन तक नहीं पहुंचा। फ्लिपकार्ट भी $40 बिलियन के आसपास है। दूसरा, कई स्टार्टअप्स में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की समस्या रही। फाउंडर्स ने फंड को एटीएम की तरह इस्तेमाल किया, राजस्व फर्जी दिखाया या पैसे साइफन किए। इससे विश्वसनीयता पर सवाल उठे। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, भारत अभी ग्लोबल एआई मार्केट में कोर फाउंडेशनल मॉडल्स बनाने वाली कंपनियों से दूर है। सॉफ्टबैंक गहरी टेक और ग्लोबल स्केल वाली कंपनियां चाहता है, जो भारत में अभी सीमित हैं।
हालांकि, कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। भारतीय आईपीओ मार्केट ने लेंसकार्ट, मीशो और स्विगी जैसी कंपनियों से सॉफ्टबैंक को कुछ रिटर्न दिए। 2026 से सॉफ्टबैंक एआई फोकस के साथ भारत में नए निवेश की संभावना जता रहा है, लेकिन फोकस एंटरप्राइज टेक और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा।
सॉफ्टबैंक का ओपनएआई में $40 बिलियन का आक्रामक दांव और भारत से तेज एग्जिट एक साथ भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए सबक है। बड़े निवेशकों को आकर्षित करने के लिए गवर्नेंस मजबूत करना, फ्रॉड रोकना, कानूनों को पारदर्शी बनाना और ग्लोबल डीप टेक समस्याओं पर फोकस जरूरी है। सिर्फ भारतीय वर्जन बनाने से नहीं चलेगा। अगर भारत एआई और डीप टेक में मजबूत हुआ तो सॉफ्टबैंक जैसे फंड फिर लौट सकते हैं। फिलहाल यह कंट्रास्ट चेतावनी देता है कि भारतीय अवसर अभी उतना आकर्षक नहीं जितना 2015 में लग रहा था।

