नई दिल्ली: भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों द्वारा पेटेंट फाइलिंग को बढ़ावा देने के नाम पर एक बड़ा ‘खेल’ चल रहा है। सरकारी प्रोत्साहन राशि का फायदा उठाते हुए कई निजी विश्वविद्यालय हर साल हजारों पेटेंट फाइल कर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में ये पेटेंट आगे की प्रक्रिया (प्रॉसीक्यूशन) से गुजरते ही नहीं हैं और अंततः ग्रांट नहीं होते। इससे सवाल उठता है कि क्या यह असली रिसर्च और इनोवेशन है या सिर्फ संख्या बढ़ाने का तरीका?
भारत सरकार पेटेंट फाइलिंग को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों को 2.5 लाख से लेकर 5 लाख रुपये तक की प्रोत्साहन राशि प्रदान करती है। विभिन्न योजनाओं जैसे SIPP (स्टार्टअप इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी प्रोटेक्शन) और अन्य राज्य-स्तरीय स्कीम्स के तहत यह राशि रीइंबर्समेंट के रूप में दी जाती है। उदाहरण के लिए, घरेलू पेटेंट के लिए 1-2 लाख और विदेशी पेटेंट के लिए 5-10 लाख तक की सहायता उपलब्ध है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कई संस्थान इस प्रोत्साहन का दुरुपयोग कर रहे हैं।
2024-25 के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी इंडिया एनुअल रिपोर्ट के अनुसार, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) ने सबसे अधिक पेटेंट फाइल किए हैं, जो आईटी क्षेत्र में सैमसंग और गूगल जैसी कंपनियों से भी आगे है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने 5519 पेटेंट और 20,000 से अधिक रिसर्च पब्लिकेशंस के साथ टॉप रिसर्च-इंटेंसिव यूनिवर्सिटी का दर्जा हासिल किया है। 2025 में ही इसके छात्रों ने 1247 पेटेंट फाइल किए, जिनमें से 943 पब्लिश हुए और 25 ग्रांट हुए। इसी रिपोर्ट में जैन डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी, गलगोटियास यूनिवर्सिटी और तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी जैसी निजी संस्थाओं ने 1000 से अधिक पेटेंट फाइल किए हैं।

दूसरी ओर, सभी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IITs) मिलकर केवल 557-803 पेटेंट फाइल कर पाते हैं। NIRF 2025 रैंकिंग्स में IIT मद्रास, IISc बेंगलुरु और IIT बॉम्बे जैसे संस्थान रिसर्च में टॉप पर हैं, लेकिन पेटेंट फाइलिंग की संख्या में निजी यूनिवर्सिटीज उनसे आगे निकल गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय पेटेंट फाइलिंग (PCT) की बेसिक फीस $285-400 (करीब 24,000-33,000 रुपये) होती है। सरकारी प्रोत्साहन से ये संस्थान हर साल पेटेंट फाइलिंग से 50 करोड़ रुपये से अधिक कमा लेते हैं। लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश पेटेंट प्रॉसीक्यूशन स्टेज तक नहीं पहुंचते। NIRF डेटा से पता चलता है कि टॉप रैंक संस्थानों में पेटेंट ग्रांट रेट ऊंचा है, जबकि अन्य में पब्लिश तो होते हैं लेकिन ग्रांट कम। कई निजी यूनिवर्सिटीज पेटेंट फाइल करती हैं, लेकिन आगे की जांच, संशोधन या डिफेंस नहीं करतीं, जिससे वास्तविक इनोवेशन की कमी उजागर होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रेंड भारत की ग्लोबल पेटेंट रैंकिंग को तो बढ़ा रहा है, लेकिन गुणवत्ता पर सवाल उठा रहा है। सरकारी योजनाएं जैसे 80% फीस रिबेट और फास्ट-ट्रैक एग्जामिनेशन निजी संस्थानों को फायदा पहुंचा रही हैं, लेकिन क्या इससे असली रिसर्च बढ़ेगी? सरकार को इन पेटेंट्स की गुणवत्ता पर नजर रखने की जरूरत है, ताकि रिसर्च के नाम पर सिर्फ ‘संख्या का खेल’ न चले।

