NTI: क्या आपने कभी सोचा कि जब भारत का विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से भी पुराना और वैज्ञानिक है, तो हम इसे राष्ट्रीय पंचांग के रूप में क्यों नहीं अपनाते? विक्रम संवत, जो अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष पहले शुरू होता है, सनातन धर्म के सभी पर्व-त्योहारों का आधार है। उदाहरण के लिए, यदि अंग्रेजी कैलेंडर में वर्ष 2024 है, तो विक्रम संवत के अनुसार यह 2081 होगा। फिर भी, स्वतंत्रता के बाद भारत ने राष्ट्रीय पंचांग के रूप में शक संवत को चुना, न कि विक्रम संवत को। आखिर क्यों? आइए, इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हैं।
इतिहास और वैज्ञानिक आधार
विक्रम संवत की शुरुआत उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के राज्याभिषेक से मानी जाती है। इसकी रचना प्रसिद्ध खगोलशास्त्री वाराहमिहिर ने की थी, जो विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। यह कैलेंडर चंद्र और सौर गणना पर आधारित है। इसमें वर्ष सूर्य की गति पर और महीने चंद्रमा की गति पर निर्भर करते हैं। प्राचीन ग्रंथ सूर्य सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर 365 दिन, 15 घटी, 31 विपल और 24 प्रतिविपल में पूरा करती है—एक गणना जो आधुनिक विज्ञान ने हाल के वर्षों में ही सिद्ध की।
विक्रम संवत में महीने 28, 29 या 30 दिन के होते हैं, और हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त मास (अधिक मास या मलमास) जोड़ा जाता है ताकि यह सूर्य वर्ष के साथ तालमेल बनाए रखे। इसकी वजह से ऋतुओं और महीनों का संतुलन सबसे सटीक रहता है। यही कारण है कि भारत के सभी मत और संप्रदाय अपने त्योहार और शुभ मुहूर्त इसी संवत के आधार पर तय करते हैं। इसमें चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नए वर्ष की शुरुआत माना जाता है, हालांकि क्षेत्रीय विविधता भी देखने को मिलती है—जैसे गुजरात में यह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है।
शक संवत
दूसरी ओर, भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग शक संवत है, जो विक्रम संवत से 1 वर्ष और अंग्रेजी कैलेंडर से 78 वर्ष बाद शुरू होता है। इसके महीनों के नाम और क्रम विक्रम संवत जैसे ही हैं—चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि—लेकिन तिथियां अंग्रेजी कैलेंडर की तरह मध्यरात्रि से शुरू होकर अगली मध्यरात्रि तक चलती हैं। इसका नववर्ष 22 मार्च से शुरू होता है।
1955 में भारत सरकार ने कैलेंडर रिफॉर्म कमेटी की सिफारिश पर शक संवत को आधिकारिक कैलेंडर बनाया। लेकिन यह निर्णय पश्चिमी प्रभाव और सेकुलर दिखने के दबाव में लिया गया। शक संवत को अपनाने के पीछे तर्क था कि यह ईसवी कैलेंडर से मेल खाता है, पर यह भारतीय संस्कृति से उतना जुड़ा नहीं है जितना विक्रम संवत। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम था, क्योंकि शकों ने भी भारत पर आक्रमण किया था, लेकिन वे भारतीय संस्कृति में समाहित हो गए। फिर भी, एक प्राचीन और वैज्ञानिक हिंदू पंचांग को नजरअंदाज कर शक संवत को थोपना कई सवाल खड़े करता है।
विक्रम संवत की वैज्ञानिकता
विक्रम संवत न केवल समय की गणना करता है, बल्कि ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य-चंद्र ग्रहण और ऋतुओं का भी सटीक विवरण देता है। पश्चिमी कैलेंडर में ऐसी खगोलीय घटनाओं का कोई संकेत नहीं मिलता। संस्कृत विद्वान और भारत रत्न से सम्मानित प्रो. पांडुरंग वामन काणे ने अपनी पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास में लिखा है कि विक्रम संवत सबसे वैज्ञानिक पंचांग है। नेपाल में आज भी यह आधिकारिक कैलेंडर के रूप में प्रचलित है।
विक्रम संवत के 2000 साल पूरे होने पर 1944 में देशभर में उत्सव मनाए गए थे। ग्वालियर के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने विक्रम उत्सव की घोषणा की थी और उनकी पहल पर विक्रम स्मृति ग्रंथ प्रकाशित हुआ, जिसे पंडित सूर्यनारायण व्यास ने संपादित किया। यह ग्रंथ राजा विक्रमादित्य, कालिदास और उज्जैन पर सबसे प्रमाणिक माना जाता है।
आज की स्थिति और भविष्य
आज शक संवत केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। पहले सरकारी कार्यक्रमों और उद्घाटन पट्टिकाओं पर इसकी तिथियां लिखी जाती थीं, लेकिन अब केवल अंग्रेजी कैलेंडर ही दिखता है। दूसरी ओर, विक्रम संवत को जटिल और अव्यावहारिक बताकर दरकिनार कर दिया गया। लेकिन क्या यह सचमुच अव्यावहारिक है, या हम अपनी बौद्धिक विरासत को पहचानने से कतरा रहे हैं?
समय की मांग
विक्रम संवत को आधिकारिक कैलेंडर घोषित करने और सरकारी कार्यक्रमों में भारतीय पंचांग की तिथियां अंकित करने का समय आ गया है। नई पीढ़ी जागरूक हो रही है और लोग समझ रहे हैं कि अंग्रेजी कैलेंडर हमारी मजबूरी हो सकती है, लेकिन विक्रम संवत हमारी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत है। यह गर्व का विषय है कि विश्व में 12 महीने और सात दिन के सप्ताह की व्यवस्था भी इसी की देन है। अब जरूरत है इसे सम्मान देने और अपनाने की।

