Sunday, February 8, 2026
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लैंसडौन की चाकलेट मिठाई का 138 वर्षों से स्वाद बरकरार

लैंसडौन: छावनी शहर लैंसडौन की पर्यटन नगरी के रूप में तो खास पहचान है ही, लेकिन यहां की ऐतिहासिक चाकलेट मिठाई का स्वाद टिहरी की सिंगोरी और अल्मोड़ा की बाल मिठाई की तरह बेमिसाल है। ब्रिटिश काल से चली आ रही यह मिठाई आज भी 138 वर्षों से अधिक पुरानी अपनी लोकप्रियता बरकरार रखे हुए है। यहां आने वाला लगभग हर पर्यटक इस चाकलेट का स्वाद चखे बिना लौटना नहीं चाहता।

लैंसडौन, जो गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट का मुख्यालय है, अपनी शांत वादियों और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। लेकिन स्थानीय लोगों, पर्यटकों और यहां तैनात गढ़वाल राइफल्स के जवानों के बीच इस चाकलेट मिठाई का क्रेज अलग ही है। मिश्रा स्वीट्स के प्रबंधक पुरुषोत्तम मिश्रा बताते हैं कि पर्यटक यहां सैर-सपाटे के बाद चाकलेट का जायका लेने के दीवाने हो जाते हैं। गढ़वाल रेजिमेंट के जवानों में भी यह मिठाई विशेष पसंद है—कसम परेड जैसे समारोहों में लोग इसे खुशी बांटते हैं और छुट्टी पर घर जाते समय जरूर साथ ले जाते हैं।

चाकलेट मिठाई की कहानी ब्रिटिश काल से जुड़ी है। 1880 के दशक में लैंसडौन (जिसका नाम तब लॉर्ड लैंसडौन, भारत के वायसराय के नाम पर पड़ा) में सड़क मार्ग न होने से अंग्रेज और स्थानीय लोग पैदल यात्रा करते थे। उस समय दूध से बनी मिठाइयां केवल 2-3 दिन ही चल पाती थीं। ऐसी मिठाई की जरूरत महसूस हुई जो 10-15 दिन तक ताजा रहे और स्वादिष्ट भी हो।

हलवाइयों ने प्रयोग किया—मावा (खोया), चीनी और घी को कढ़ाई में हल्की आंच पर लंबे समय तक लगातार घोटा। इससे मिश्रण चाकलेटी भूरे रंग का हो गया। इसी रंग के कारण इसका नाम ‘चाकलेट’ पड़ा। यह असली चॉकलेट नहीं, बल्कि एक पारंपरिक भारतीय मिठाई है, जो खोया-आधारित फज जैसी बनती है। ब्रिटिश अफसर इसे इतना पसंद करते थे कि उच्चाधिकारियों को भेंट में देते थे। अंग्रेजों ने स्थानीय मिठाई विक्रेताओं को अधिक मात्रा में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

उस दौर में बाल मिठाई (अल्मोड़ा की प्रसिद्ध मिठाई) पर खसखस के बीज में चीनी के सफेद दाने लगाए जाते थे, जिससे मिठास बहुत अधिक हो जाती थी। लेकिन अंग्रेज चाकलेट को ज्यादा पसंद करते थे क्योंकि इसमें मिठास संतुलित होती थी। ब्रिटिश काल में यह मिठाई सीमित मात्रा में बनती थी, लेकिन मांग बढ़ने पर उत्पादन बढ़ाया गया।

लैंसडौन के आसपास के गांवों में बड़े पैमाने पर पशुपालन होता था, जिससे दूध और मावा की उपलब्धता अधिक थी। चाकलेट की बढ़ती मांग से मावा की बिक्री में उछाल आया, जिससे ग्रामीणों को आजीविका मिली और मिठाई विक्रेताओं को मजबूत रोजगार का साधन। आज भी यह मिठाई मुख्य रूप से मावा, चीनी और देसी घी से बनती है।

मावा, चीनी और घी को अलग-अलग अनुपात में लेकर कढ़ाई में 40-45 मिनट तक लगातार घोटा जाता है। तेज आंच से बचाते हुए पकाया जाता है ताकि जले नहीं। पकने पर मिश्रण चाकलेटी रंग का हो जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए कुछ लोग कोको पाउडर या कॉफी पाउडर मिलाते हैं। वर्तमान में इसे ड्राई फ्रूट चाकलेट के रूप में भी बनाया जा रहा है—ड्राई फ्रूट्स को रोस्ट कर मिश्रण में मिलाया जाता है।

पौड़ी जिले के कोटद्वार जैसे शहरों में भी अब स्थानीय ब्रांड के रूप में चाकलेट बिकती है, लेकिन असली स्वाद और लोकप्रियता लैंसडौन की ही है। कीमत लगभग 380 रुपये प्रति किलो (2023 के आंकड़ों के अनुसार) है। यह तीन ही सामग्रियों से बनती है—खोया, देसी घी और चीनी—फिर भी इसका स्वाद बेमिसाल है।

समय के साथ फ्लेवर में बदलाव आए हैं, लेकिन 138 वर्ष बाद भी ब्रिटिश काल की यह विरासत जीवित है। लैंसडौन आने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग इसे अपनी पहचान मानते हैं। यह मिठाई न केवल स्वाद की बात है, बल्कि इतिहास, संस्कृति और स्थानीय अर्थव्यवस्था का प्रतीक भी है। यदि आप लैंसडौन जाएं, तो चाकलेट का स्वाद जरूर चखें—यह अनुभव भूलने वाला नहीं होगा।

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