Sunday, February 8, 2026
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भारत की शिक्षा व्यवस्था पर कोचिंग माफिया का कब्जा!

भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक गंभीर संकट से जूझ रही है। यह व्यवस्था अब शिक्षा मंत्रालय या शिक्षकों के हाथों में नहीं, बल्कि कोचिंग माफिया के चंगुल में है। स्कूलों में 10वीं और 12वीं कक्षा में जो पढ़ाया जा रहा है, वह JEE, NEET, NDA, CLAT जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले पाठ्यक्रम से मेल नहीं खाता। दूसरी ओर, इन परीक्षाओं में जो पूछा जाता है, वह स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता। नतीजतन, छात्रों को मजबूरी में कोचिंग का सहारा लेना पड़ता है। यही वह जाल है, जिसे कोचिंग माफिया ने सुनियोजित ढंग से बिछाया है।समान अवसर का संवैधानिक अधिकार और कोचिंग माफिया की साजिशभारत का संविधान, अनुच्छेद 16 के तहत, सभी को समान अवसर की गारंटी देता है। लेकिन कोचिंग माफिया ने इस अधिकार को छीन लिया है। उच्च फीस के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चे इन कोचिंग संस्थानों तक पहुंच ही नहीं पाते, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं में उनकी भागीदारी सीमित हो जाती है।

चाहे कोई CBSE, ICSE, IB या किसी राज्य बोर्ड का टॉपर हो, बिना कोचिंग के वह JEE, NEET, NDA या CLAT जैसी परीक्षाओं में सफलता हासिल नहीं कर पाता। यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि कोचिंग माफिया ने शिक्षा मंत्रालय और प्रशासन के साथ मिलकर एक ऐसा तंत्र रच दिया है, जिसमें स्कूलों का पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं का सिलेबस जानबूझकर अलग रखा जाता है।

कोचिंग उद्योग आज एक विशाल कारोबार बन चुका है। कुछ अनुमान इसे 2-5 लाख करोड़ रुपये का व्यवसाय बताते हैं। यह माफिया न केवल छात्रों की जेब काट रहा है, बल्कि माता-पिता को भी आर्थिक बोझ तले दबा रहा है। एक ओर स्कूल की फीस दी जा रही है, दूसरी ओर कोचिंग के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। सवाल यह है कि जब स्कूल में पढ़ाई हो रही है, तो कोचिंग की आवश्यकता क्यों? और यदि कोचिंग ही पढ़ाई का एकमात्र रास्ता है, तो फिर स्कूलों का क्या औचित्य? 1980 के दशक तक स्थिति ऐसी नहीं थी। उस समय 10वीं और 12वीं का पाठ्यक्रम ही इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए पर्याप्त था। छात्र बिना कोचिंग के स्वाध्याय से इन परीक्षाओं में सफल हो जाते थे।

लेकिन आज, कोचिंग माफिया ने शिक्षा व्यवस्था को इस कदर जकड़ लिया है कि बिना कोचिंग के सफलता असंभव-सी हो गई है। छात्रों पर मानसिक दबाव और सामाजिक असमानताइस व्यवस्था का सबसे दुखद परिणाम है बच्चों पर पड़ने वाला मानसिक दबाव। स्कूल की पढ़ाई के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की अलग से तैयारी, कई बार एक-दो साल तक ड्रॉप लेकर कोचिंग करना, बच्चों को डिप्रेशन और आत्महत्या की ओर धकेल रहा है। इसके अलावा, कोचिंग का यह कारोबार सामाजिक असमानता को और गहरा रहा है। कोटा, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई या बेंगलुरु जैसे शहरों की चुनिंदा कोचिंग संस्थाएं ही सफलता की गारंटी देती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए इन तक पहुंच पाना लगभग असंभव है। नतीजतन, माता-पिता मजबूरी में गांव छोड़कर शहरों में पलायन कर रहे हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक असंतुलन बढ़ रहा है।राजनीतिक साठगांठ और शिक्षा मंत्रालय की चुप्पीयह पूरा तंत्र कोचिंग माफिया, राजनेताओं, शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और पेपर सेट करने वालों की मिलीभगत से चल रहा है। कोचिंग संस्थान राजनीतिक दलों और अधिकारियों को फंडिंग करते हैं, जिसके बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट मिलती है। इस गंभीर मुद्दे पर न तो संसद में चर्चा हो रही है, न ही विधानसभाओं में। यह एक खुला लूटतंत्र है, जिसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही।

वन नेशन, वन सिलेबस

इस संकट का एकमात्र समाधान है वन नेशन, वन एजुकेशन बोर्ड, वन नेशन, वन सिलेबस, और वन नेशन, वन करिकुलम। जब JEE, NEET, NDA, CLAT, SSC, CUET जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं का पेपर पूरे देश के लिए एक समान है, तो 10वीं और 12वीं का सिलेबस अलग-अलग क्यों? केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय पूरे देश में एक समान सिलेबस के साथ चल रहे हैं, तो फिर अन्य स्कूलों के लिए ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

प्रस्तावित सुधार:
एकीकृत सिलेबस: पूरे देश में 10वीं और 12वीं का एक समान सिलेबस लागू किया जाए, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम के साथ संरेखित हो।

NCERT की किताबें: सभी स्कूलों में NCERT की किताबों को अनिवार्य किया जाए, ताकि निजी प्रकाशकों का कारोबार खत्म हो और हर साल नई किताबें खरीदने की जरूरत न पड़े।

एकल शिक्षा बोर्ड: पूरे देश के लिए एक शिक्षा बोर्ड बनाया जाए, जो कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक एक समान शिक्षा सुनिश्चित करे।

राइट टू इक्वल एजुकेशन: राइट टू एजुकेशन एक्ट में संशोधन कर इसे 6 से 16 वर्ष तक लागू किया जाए और समान शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

वैदिक गुरुकुल मॉडल: 5+5+5 (प्राइमरी, सेकेंडरी, ग्रेजुएशन) के पारंपरिक मॉडल को पुनर्जनन दिया जाए, जो संस्कार और शिक्षा का समन्वय करे।

समानता और सामाजिक एकता की ओर समान शिक्षा तब होगी, जब गरीब और अमीर, मजदूर और मालिक, मंत्री और संतरी, हिंदू और मुस्लिम, ब्राह्मण और दलित—सभी के बच्चों की किताब एक होगी। यह न केवल कोचिंग माफिया के शोषण को खत्म करेगा, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करेगा। आवाज उठाएं, बदलाव लाएं अब समय है कि हम इस कोचिंग माफिया और शिक्षा के कारोबारीकरण के खिलाफ आवाज उठाएं।

यदि आप अपने बच्चों को डिप्रेशन और आत्महत्या से बचाना चाहते हैं, यदि आप आर्थिक शोषण से मुक्ति चाहते हैं, तो वन नेशन, वन सिलेबस की मांग करें। यह मांग संसद तक पहुंचनी चाहिए, ताकि राइट टू इक्वल एजुकेशन एक्ट लागू हो और भारत की शिक्षा व्यवस्था सही मायनों में समान और समावेशी बन सके।

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