Wednesday, March 4, 2026
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उत्तराखंड में बढ़ता कर्ज का मर्ज: क्यों कर्ज ले रही है उत्तराखंड सरकार !

NTI, (Mohan Bhulani): उत्तराखंड में बढ़ते कर्ज को लेकर यह चर्चा जोरों पर है कि पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा लिए गए कर्ज ने राज्य की अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव डाला है। पिछले कुछ दशकों में सरकारी परियोजनाओं और योजनाओं के लिए अत्यधिक ऋण लिया गया, जिससे राज्य का कुल कर्ज लगातार बढ़ता गया। राज्य गठन के समय उत्तराखंड पर केवल 4,500 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो अब 2024-25 तक बढ़कर 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह वृद्धि मुख्यतः विकास कार्यों और गैर-योजनागत खर्चों (जैसे वेतन और पेंशन) के लिए लिए गए ऋण के कारण हुई है।

हालांकि, वर्तमान सरकार का कहना है कि विकास कार्यों को गति देने के लिए कर्ज लेना जरूरी है। उत्तराखंड सरकार ने ऊर्जा, सिंचाई, कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में निवेश के लिए कर्ज लिया है। ये परियोजनाएं राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और रोजगार सृजन में मदद करती हैं।

हालांकि कर्ज लेना अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब तक आय के स्रोत आनुपातिक रूप से नहीं बढ़ते, यह कर्ज का बोझ एक गंभीर समस्या बन सकता है। इस वित्तीय वर्ष में उत्तराखंड सरकार अब तक 3400 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। अब 1000 करोड़ के नए कर्ज के बाद यह आंकड़ा 4400 करोड़ तक पहुंच जाएगा। कर्ज लेना तब तक सही है जब तक इसे समय पर लौटाया जा सके, लेकिन राज्य के मौजूदा हालात इसे लेकर अलार्मिंग संकेत दे रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार यह कर्ज रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के माध्यम से खुले बाजार से उठा रही है। वित्त विभाग ने 2 जनवरी 2025 को जारी नोटिस में विभिन्न संस्थाओं से बिड के माध्यम से कर्ज देने के लिए आवेदन मांगे। 21 संस्थाओं ने इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया, जिनमें से 5 के आवेदन स्वीकृत किए गए हैं। राज्य सरकार यह कर्ज लगभग 7% ब्याज दर पर ले रही है।

कर्ज की स्थिति और चुनौतियां

  1. कुल देनदारी: मार्च 2021 तक उत्तराखंड पर 57,114 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो मार्च 2024 तक बढ़कर लगभग 77,000 करोड़ रुपये और 2024-25 में 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह स्थिति राज्य के कुल बजट के बराबर हो चुकी है।
  2. राजस्व और व्यय: वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) 3.94 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जिसमें 14% की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि, राज्य की प्राप्तियां (उधारियों को छोड़कर) केवल 60,677 करोड़ रुपये हैं, जबकि व्यय (ऋण चुकौती को छोड़कर) 70,094 करोड़ रुपये अनुमानित है। इस अंतर को पूरा करने के लिए उधारी का सहारा लिया जा रहा है।
  3. कर्ज चुकाने की धीमी गति: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 से 2021-22 के बीच केवल 119 करोड़ रुपये का पुनर्भुगतान किया गया है। इससे स्पष्ट है कि राज्य कर्ज चुकाने में धीमा रहा है।
  4. कर्ज चुकाने की चुनौती: राज्य को अपने कर्ज पर ब्याज भुगतान और मूलधन चुकाने के लिए हर साल भारी धनराशि जुटानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य को लगभग 19,137 करोड़ रुपये का ऋण चुकाना होगा।

    कर्ज लेने की वजहें

    1. विकास योजनाओं की पूर्ति: राज्य सरकार ऊर्जा, कृषि, सिंचाई और उद्योग जैसे क्षेत्रों में विभिन्न परियोजनाओं को पूरा करने के लिए कर्ज ले रही है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य राज्य में बुनियादी ढांचे का विकास और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है।
    2. राजस्व और व्यय का अंतर: वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य की अनुमानित प्राप्तियां (उधारियों को छोड़कर) 60,677 करोड़ रुपये हैं, जबकि व्यय 70,094 करोड़ रुपये है। इस अंतर को पाटने के लिए कर्ज लेना आवश्यक हो गया है।
    3. केंद्र पर निर्भरता: केंद्र से समय पर बजट न मिलने की स्थिति में राज्य सरकार को खुले बाजार से कर्ज उठाना पड़ता है ताकि आवश्यक खर्चों और योजनाओं को समय पर पूरा किया जा सके।
    4. अनिवार्य खर्च: कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और अन्य गैर-योजनागत खर्चों के लिए भी कर्ज लिया जाता है। यह खर्च राज्य के कुल बजट का बड़ा हिस्सा खा जाता है। राज्य की आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है। कर राजस्व और अन्य स्रोतों से प्राप्तियां सीमित हैं, जबकि खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। इससे कर्ज पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
  • सकारात्मक प्रभाव: कर्ज का उपयोग बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, सिंचाई, और औद्योगिक परियोजनाओं में निवेश के लिए किया जा रहा है। इससे राज्य में रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। उत्तराखंड सरकार ने “राजकोषीय दायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम” के तहत राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा कम करने का लक्ष्य रखा है। 2023-24 में राजस्व अधिशेष (4310 करोड़ रुपये) का अनुमान लगाया गया था, जो सकारात्मक संकेत देता है।
  • नकारात्मक प्रभाव: यदि कर्ज का उपयोग केवल गैर-उत्पादक खर्चों (जैसे वेतन और पेंशन) के लिए किया जाता है, तो यह दीर्घकालिक आर्थिक विकास में योगदान नहीं देगा।

ब्याज भुगतान का दबाव

  • राज्य को अपने कर्ज पर हर साल भारी ब्याज चुकाना पड़ता है। 2024-25 में, उत्तराखंड को लगभग 19,137 करोड़ रुपये ब्याज और मूलधन चुकाने के लिए खर्च करने होंगे। यह धनराशि अन्य विकास योजनाओं से हटाकर ब्याज चुकाने में लगाई जाती है, जिससे विकास कार्य धीमे हो सकते हैं।
  • उत्तराखंड का कर्ज 2024-25 में 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, जो राज्य के कुल बजट के बराबर है । बढ़ता कर्ज राजकोषीय घाटे को बढ़ा सकता है, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • यदि कर्ज का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, तो भविष्य में राज्य की उधारी क्षमता प्रभावित होगी। इससे आपातकालीन स्थितियों या नई परियोजनाओं के लिए धन जुटाना मुश्किल हो सकता है। कर्ज चुकाने के लिए सरकार को कर दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करनी पड़ सकती है। इससे समाज के कमजोर वर्गों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यदि कर्ज का उपयोग उत्पादक क्षेत्रों में नहीं किया गया, तो यह अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक बोझ बन सकता है। इसके परिणामस्वरूप राज्य को अधिक उधार लेना पड़ेगा, जिससे “कर्ज का दुष्चक्र” बन सकता है।

आगे का रास्ता

  1. आय स्रोतों को मजबूत करना: पर्यटन, कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर राजस्व सृजन करना।
  2. गैर-योजनागत खर्चों पर नियंत्रण: वेतन और पेंशन जैसे खर्चों को नियंत्रित करना।
  3. कर्ज का उत्पादक उपयोग: केवल उन परियोजनाओं में निवेश करना जो दीर्घकालिक राजस्व उत्पन्न कर सकें।
  4. वित्तीय अनुशासन: बजट प्रबंधन और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम लागू करना।

वित्तीय अधिकारियों की राय

अपर मुख्य सचिव वित्त आनंद वर्धन का कहना है कि सरकार केवल जरूरत के हिसाब से कर्ज ले रही है। केंद्र सरकार से बजट मिलने में देरी होने पर विकास योजनाओं के लिए खुले बाजार से कर्ज लेना पड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कर्ज राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लिया गया है।

वित्त सचिव दिलीप जावलकर ने भी कहा कि अब तक जितना भी कर्ज लिया गया है, वह केंद्र द्वारा तय मानकों के भीतर है। राज्य को सालाना 7400 करोड़ तक का कर्ज लेने की अनुमति है, और यह कर्ज विभिन्न विकास योजनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

कैग की रिपोर्ट

कैग ने बताया कि उत्तराखंड अपने कुल कर्ज का 71% केवल ब्याज और देनदारियों को चुकाने में खर्च कर रहा है। यह स्थिति राज्य की वित्तीय स्थिरता के लिए खतरनाक हो सकती है। कैग ने सुझाव दिया कि राज्य को अपने ऋण प्रबंधन में सुधार करना चाहिए और गैर-उत्पादक खर्चों को कम करना चाहिए।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि राज्य अपनी आय स्रोतों को मजबूत नहीं करता और खर्चों को नियंत्रित नहीं करता, तो यह स्थिति गंभीर आर्थिक संकट का रूप ले सकती है। उत्तराखंड का प्रति व्यक्ति कर्ज अन्य राज्यों जैसे छत्तीसगढ़ और झारखंड से अधिक है, जो राज्य की कमजोर वित्तीय स्थिति को दर्शाता है।

उत्तराखंड में बढ़ते कर्ज से विकास कार्यों को गति मिल सकती है, लेकिन यह तभी फायदेमंद होगा जब इसका उपयोग योजनाबद्ध और उत्पादक तरीकों से किया जाए। अन्यथा, यह आर्थिक अस्थिरता और वित्तीय संकट का कारण बन सकता है। आय स्रोतों को मजबूत करना और खर्चों पर नियंत्रण रखना इस समस्या से निपटने के लिए आवश्यक कदम हैं।कर्ज लेने की प्रक्रिया सामान्य हो सकती है, लेकिन राज्य के आय स्रोतों में अपेक्षित वृद्धि न होना एक गंभीर मुद्दा है। यह कर्ज का बढ़ता बोझ भविष्य में राज्य की आर्थिक स्थिति के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को न केवल कर्ज लेने की प्रक्रिया में सतर्कता बरतनी चाहिए, बल्कि राज्य के राजस्व को बढ़ाने के लिए नए उपाय भी अपनाने चाहिए।

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