देहरादून उत्तराखंड की हिमालयी वादियों को एडवेंचर टूरिज्म का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल शुरू हो गई है। राज्य पर्यटन विकास परिषद (यूटीडीबी) ने राज्य के 50 प्रमुख ट्रेकिंग मार्गों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और डिजिटल मैपिंग करने की महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत की है। यह परियोजना फेज-1 के तहत 12 महीनों में पूरी होगी और ट्रेकर्स, पर्यटकों तथा स्थानीय समुदायों के लिए सुरक्षित एवं सतत पर्यटन का नया अध्याय खुलेगी।
इस पहल में यूटीडीबी का सहयोगी संगठन है ट्रेक द हिमालयाज (टीटीएच), जो प्रमाणित और अनुभवी एडवेंचर ऑपरेटर के रूप में जाना जाता है। परियोजना के अंतर्गत 5,000 मीटर से नीचे की ऊंचाई वाले ट्रेकिंग रूट्स को शामिल किया गया है, जो चमोली, टिहरी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों में फैले हुए हैं। इनमें देवभूमि उत्तराखंड के सबसे प्रसिद्ध और कम-ज्ञात मार्ग शामिल हैं, जैसे वैली ऑफ फ्लावर्स-हेमकुंड साहिब, केदारनाथ-वासुकीताल, कुरी पास, रूपकुंड, पिंडारी ग्लेशियर, पंचाचूली बेस कैंप और हर-की-दून। साथ ही कई सांस्कृतिक एवं धरोहर पथ भी सर्वे के दायरे में आएंगे।
पर्यटन सचिव एवं उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद् के मुख्य कार्यकारी अधिकारी धीराज गर्बियाल ने इस परियोजना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा,
“उत्तराखंड का ट्रेकिंग नेटवर्क विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन कई मार्गों का पूर्ण दस्तावेजीकरण न होने से सुरक्षा और पर्यटन विकास में बाधा आती रही है। यह परियोजना वैज्ञानिक ढांचा प्रदान करेगी, जिससे ट्रेकर्स की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा। इससे स्थानीय समुदायों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और हिमालय की प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रहेगी।”
सर्वे और मैपिंग की प्रक्रिया
प्रत्येक ट्रेकिंग रूट का सर्वे जीपीएस और जीआईएस आधारित तकनीक से किया जाएगा। इसमें शामिल होंगे:
- ऊंचाई प्रोफाइल और दूरी निर्धारण: मार्ग की लंबाई, ऊंचाई परिवर्तन और कठिनाई स्तर का विस्तृत विश्लेषण।
- कैंपसाइट्स और जल स्रोत: सुरक्षित कैंपिंग स्थलों और पीने के पानी के स्रोतों की पहचान।
- मोबाइल नेटवर्क कवरेज: आपातकालीन संपर्क के लिए नेटवर्क उपलब्धता का मूल्यांकन।
- जोखिम बिंदु और रेस्क्यू रूट: संभावित खतरे (जैसे भूस्खलन, नदी पार करना) और बचाव मार्गों की मैपिंग।
- पर्यावरणीय डेटा: फ्लोरा-फौना, मौसम पैटर्न और पारिस्थितिक प्रभाव का आकलन।
सर्वे के बाद डेटा को डिजिटल मैप्स, राज्य स्तरीय ट्रेकिंग रिपॉजिटरी और आधिकारिक ऐप में संग्रहित किया जाएगा। ट्रेकर्स मोबाइल ऐप के माध्यम से रीयल-टाइम मैप, मौसम अपडेट और इमरजेंसी अलर्ट प्राप्त कर सकेंगे।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रशिक्षण
परियोजना की एक अनूठी विशेषता है स्थानीय समुदायों का सक्रिय सहयोग। ट्रेक मार्गों से जुड़े गांवों के युवाओं और गाइड्स को जीपीएस उपयोग, इको-टूरिज्म व्यवहार और बेसिक ट्रेक लीडरशिप का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा, पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा और हिमालयी पारिस्थितिकी का संतुलन बरकरार रहेगा। गर्बियाल ने कहा, “यह न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि पर्वतीय जिलों से पलायन रोकने में भी सहायक होगा।”
परियोजना का समयबद्ध कार्यान्वयन
परियोजना को 12 महीनों में चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा:
- मार्ग नियोजन और अनुमति: जनवरी-फरवरी में रूट्स का चयन और वन/पर्यावरण मंजूरी।
- फील्ड सर्वे: मार्च-अगस्त में मौसमी सर्वेक्षण (मानसून से बचते हुए)।
- डेटा विश्लेषण और जीआईएस मैपिंग: सितंबर-अक्टूबर में डिजिटल मैप्स तैयार करना।
- कंटेंट विकास और प्रकाशन: नवंबर-दिसंबर में ऐप, गाइडबुक और वेब पोर्टल लॉन्च।
यह दस्तावेजीकरण यूटीडीबी के ‘ट्रेकिंग एंड हाइकिंग मास्टर प्लान’ का हिस्सा बनेगा, जिसमें रेस्क्यू ऑपरेशंस, पर्यटन योजना, डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रचार गतिविधियां शामिल होंगी। ट्रेक इटिनरेरी, भू-आकृतिक विवरण, सुरक्षा नोट्स, फ्लोरा-फौना संदर्भ, फोटो डॉक्यूमेंटेशन, परमिट गाइडलाइंस, स्थानीय गाइड-होमस्टे डेटाबेस और रेस्क्यू-इवैक्यूएशन फ्रेमवर्क भी तैयार किए जाएंगे।
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना उत्तराखंड को वैश्विक ट्रेकिंग मैप पर नई पहचान देगी। पर्यटन विशेषज्ञ उदित घिल्डियाल ने कहा, “डिजिटल मैपिंग से ट्रेकर्स की सुरक्षा बढ़ेगी और अनियोजित पर्यटन से होने वाले नुकसान को रोका जा सकेगा।”
फेज-2 की योजना
फेज-1 के सफल समापन के बाद फेज-2 में 50 और ट्रेकिंग मार्गों का सर्वे होगा, जिससे राज्य के कुल 100 ट्रेल्स का व्यापक डेटाबेस तैयार हो जाएगा। इससे उत्तराखंड को इको-एडवेंचर टूरिज्म का अंतरराष्ट्रीय मॉडल बनाने में मदद मिलेगी।
यह पहल उत्तराखंड सरकार की उस प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है कि एडवेंचर टूरिज्म का विकास सुरक्षित, संरचित और पर्यावरण-संवेदनशील तरीके से किया जाएगा। हिमालय की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखते हुए, यह परियोजना हजारों युवाओं को रोजगार और पर्यटकों को अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करेगी। — मनोज इष्टवाल, वरिष्ठ पत्रकार एवं एडवेंचर टूरिज्म विशेषज्ञ

