Sunday, February 8, 2026
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उत्तराखंड के 100 उत्पादों को जल्द मिलेगा जीआई टैग

देहरादून। उत्तराखंड अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ विशिष्ट कृषि, औद्यानिकी और हस्तशिल्प उत्पादों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। इन उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत पहचान दिलाने के लिए राज्य सरकार जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) टैग प्राप्त करने की मुहिम को तेजी से आगे बढ़ा रही है। अभी तक राज्य के 20 से अधिक उत्पादों को यह प्रतिष्ठित टैग मिल चुका है, जबकि अब लक्ष्य इसे 100 तक ले जाने का है। राज्य स्थापना की रजत जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जीआई टैग की महत्ता को रेखांकित करते हुए राज्य सरकार की इस पहल की सराहना की थी।

जीआई टैग किसी उत्पाद को उसके मूल भौगोलिक क्षेत्र से जोड़कर उसकी विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और परंपरागत निर्माण प्रक्रिया की गारंटी देता है। इस टैग के मिलने के बाद कोई अन्य क्षेत्र या व्यक्ति उस उत्पाद के नाम का दुरुपयोग नहीं कर सकता। इससे न केवल नकली उत्पादों पर अंकुश लगता है, बल्कि असली उत्पाद की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है और किसानों-कारीगरों को बेहतर मूल्य मिलता है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत महानियंत्रक पेटेंट, डिजाइन एवं ट्रेडमार्क कार्यालय हर प्रस्ताव की गहन जांच-पड़ताल के बाद ही जीआई टैग प्रदान करता है।

अभी तक उत्तराखंड को मिले प्रमुख जीआई टैग में तेजपात, बासमती चावल (कुछ विशेष किस्में), एपण कला, रिंगाल क्राफ्ट, भोटिया दन, ताम्पा शिल्प, थुलमा, नैनीताल मोमबत्ती, कुमाऊंनी पिछौड़ा आदि शामिल हैं। हाल ही में बेडू (पहाड़ी अंजीर) और बदरी गाय का घी को भी जीआई टैग मिला है, जिससे इनकी वैश्विक पहचान और मजबूत हुई है। इसके अलावा 21 अन्य कृषि-औद्यानिकी उत्पादों के प्रस्ताव पहले ही केंद्र को भेजे जा चुके हैं, जिनमें मुनस्यारी सफेद राजमा, कुमाऊं च्यूरा आयल, बेरीनाग चाय, मंडुवा, झंगोरा, गहत, लाल चावल, काला भट्ट, माल्टा, चौलाई, बुरांस शर्बत, पहाड़ी तोर दाल, अल्मोड़ा लखौरी मिर्च, रामनगर-नैनीताल की लीची और रामगढ़-नैनीताल का आड़ू प्रमुख हैं। इनमें से शेष 19 उत्पादों को भी जल्द टैग मिलने की पूरी उम्मीद है।

राज्य सरकार अब और तेजी से नए उत्पादों की पहचान कर रही है। उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद के प्रबंध निदेशक विनय कुमार ने बताया कि राज्य के सभी जिलों के मुख्य कृषि अधिकारी और मुख्य उद्यान अधिकारियों से उनके क्षेत्र के विशिष्ट कृषि-औद्यानिकी उत्पादों का विस्तृत ब्योरा मांगा गया है। इसके लिए संबंधित विभागों को जीआई टैग के लिए प्रस्ताव तैयार करने हेतु विशेष प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है।

आने वाले समय में जिन उत्पादों को जीआई टैग दिलाने की प्राथमिकता है, उनमें कुट्टू, फाफर, हर्षिल राजमा, जख्या (स्थानीय मसाला), जम्बू, टिमरू, पहाड़ी मसूर, नवरंग दाल, रुद्राक्ष, पुलम (एक विशेष जड़ी-बूटी), नाशपाती, काफल, किल्मोड़ा (हिसालू), अल्मोड़ा की बाल मिठाई, सिंगोड़ी मिठाई, नैनीताल ज्योलीकोट शहद, कौसानी चाय, गंदरायणी (एक दुर्लभ जड़ी), पहाड़ी नींबू, पहाड़ी आलू और चमोली का रम्माण मुखौटा तथा उत्तराखंड की लिखाई लकड़ी की नक्काशी प्रमुख हैं। इनमें से कई उत्पाद तो पहले से ही पर्यटकों और बाहर के बाजारों में ऊंचे दाम पर बिकते हैं, लेकिन जीआई टैग मिलने से इनकी कीमत और विश्वसनीयता कई गुना बढ़ जाएगी।

विनय कुमार ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि उत्तराखंड के कम से कम 100 विशिष्ट उत्पादों को जीआई टैग प्राप्त हो। इससे न केवल राज्य की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि पलायन कर रहे हमारे किसान और कारीगरों को अपने गांव में ही सम्मानजनक आजीविका मिल सकेगी।” उन्होंने बताया कि जीआई टैग प्राप्त उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए अलग से रणनीति बनाई जा रही है, ताकि ये उत्पाद अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी मजबूती से पहुंच सकें।

उत्तराखंड की यह मुहिम देश के अन्य पहाड़ी राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग से जहां एक ओर जैविक और परंपरागत खेती को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर राज्य की सांस्कृतिक धरोहर भी सुरक्षित रहेगी। आने वाले कुछ वर्षों में उत्तराखंड “जीआई टैग का हब” बनकर उभरेगा, ऐसी उम्मीद जगी है।

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