Sunday, February 8, 2026
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उत्तराखंड के पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण से जगी नई उम्मीद

उत्तराखंड की समृद्ध पुरातात्विक धरोहर भी विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान रखती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन उत्तराखंड में कुल 44 पुरातात्विक महत्व के स्थल संरक्षित हैं। ये स्थल प्राचीन मंदिरों, शिवालयों और ऐतिहासिक संरचनाओं का अद्भुत संगम हैं, जो कत्यूरी, चंद और पाल वंशों की कला और संस्कृति की गवाही देते हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने देश भर में 15 प्रमुख पुरातात्विक स्थलों को जीवंत, अनुभवजन्य और सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है। यद्यपि इन 15 स्थलों की अंतिम सूची में उत्तराखंड के स्थलों का स्पष्ट उल्लेख अभी नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों में उम्मीद जताई जा रही है कि जागेश्वर धाम, आदि बद्री, बैजनाथ, बालेश्वर मंदिर जैसे महत्वपूर्ण स्थल इसमें शामिल किए जा सकते हैं।

इसके अलावा, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और विरासतीय महत्व वाले स्थानों के डिजिटल दस्तावेजीकरण की योजना भी चल रही है, जिसमें उत्तराखंड के प्रसिद्ध चारधाम (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) सहित अन्य तीर्थ स्थल शामिल होंगे। साथ ही, प्रमुख पर्यटक स्थलों पर गाइडों के कौशल उन्नयन की योजना से राज्य के युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। यह लेख उत्तराखंड की पुरातात्विक धरोहर, इनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान चुनौतियों और सरकारी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा करता है। उत्तराखंड में ASI द्वारा संरक्षित 44 स्मारक मुख्य रूप से मंदिर समूह हैं, जो 7वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित हुए। ये उत्तर भारतीय नागर शैली की उत्कृष्ट मिसाल हैं। राज्य के गठन (2000) से पूर्व ये उत्तर प्रदेश के अंतर्गत थे, लेकिन अब देहरादून सर्किल के अधीन हैं। इनमें से कई स्थल कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में फैले हैं।

सबसे प्रमुख है जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा जिला)। यहाँ 124 से 224 तक प्राचीन मंदिरों का समूह है, जिनमें मुख्य जागेश्वर महादेव मंदिर, मृत्युंजय मंदिर, नंदा देवी मंदिर और सूर्य मंदिर शामिल हैं। पुरातात्विक प्रमाणों के अनुसार, यहाँ का सबसे प्राचीन मंदिर 8वीं शताब्दी का है, जबकि कुछ मंदिर 18वीं शताब्दी तक के हैं। शिव पुराण और स्कंद पुराण में जागेश्वर का उल्लेख हाटकेश्वर क्षेत्र के रूप में मिलता है। कत्यूरी राजवंश ने यहाँ कई मंदिर बनवाए। देवदार के घने जंगलों से घिरा यह स्थल न केवल धार्मिक बल्कि पुरातात्विक दृष्टि से भी अनमोल है। ASI ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है।

इसी तरह, बैजनाथ मंदिर समूह (बागेश्वर जिला) कत्यूरी काल की शानदार वास्तुकला का प्रतीक है। 12वीं शताब्दी में निर्मित मुख्य शिव मंदिर में मछली की आकृति वाली मूर्ति प्रसिद्ध है। मंदिर परिसर में पार्वती, गणेश, ब्रह्मा और विष्णु के मंदिर भी हैं। गोमती नदी के तट पर स्थित यह स्थल प्राचीन व्यापार मार्गों का केंद्र रहा।

बालेश्वर मंदिर (चम्पावत) चंद वंश की कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। 10वीं-12वीं शताब्दी के यह मंदिर शिव, बालेश्वर और रत्नेश्वर को समर्पित हैं। यहाँ की नक्काशी और पत्थर की जालीदार कारीगरी दक्षिण भारतीय प्रभाव दिखाती है।

आदि बद्री (चमोली जिला) सप्त बद्री का हिस्सा है। यहाँ 16 छोटे-छोटे मंदिर हैं, जिनमें विष्णु की काले पत्थर की मूर्ति प्रमुख है। 7वीं-9वीं शताब्दी के यह मंदिर गुप्त कालीन शैली दर्शाते हैं।

अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं: कटारमल सूर्य मंदिर (अल्मोड़ा, 9वीं शताब्दी, भारत के प्रमुख सूर्य मंदिरों में से एक), लाखामंडल शिव मंदिर (देहरादून, पांडवों से जुड़ी किंवदंतियाँ), गुजर देव मंदिर (द्वाराहाट) आदि। ये स्थल न केवल धार्मिक हैं, बल्कि पुरातत्वविदों के लिए प्राचीन हिमालयी सभ्यता की जानकारी का स्रोत हैं।

केंद्र सरकार की विकास योजनाएँ

केंद्र सरकार की हालिया घोषणा के अनुसार, देश में 15 प्रमुख पुरातात्विक स्थलों को अनुभवजन्य पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित किया जाएगा। इनमें लोथल (गुजरात), हस्तिनापुर (उत्तर प्रदेश), अग्रोहा (हरियाणा), उदयगिरि (ओडिशा) जैसे स्थल शामिल हैं। उत्तराखंड के लिए अभी तक कोई स्थल चयनित नहीं हुआ है, लेकिन जागेश्वर, बैजनाथ जैसे स्थलों की समृद्धि को देखते हुए उम्मीद है कि इन्हें प्राथमिकता मिलेगी। पहले से चल रही स्वदेश दर्शन योजना के तहत कुमाऊँ हेरिटेज सर्किट (जागेश्वर-कटारमल-बैजनाथ-देवीधुरा) के लिए 83 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए थे। हाल ही में जागेश्वर में 76 करोड़ की परियोजनाएँ शुरू हुई हैं, जिनमें पर्यटक सुविधाएँ, लाइट एंड साउंड शो आदि शामिल हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बैजनाथ में कत्यूरी हेरिटेज को बढ़ावा देने की घोषणा की है।

डिजिटल दस्तावेजीकरण

सरकार सांस्कृतिक धरोहर के डिजिटल संरक्षण पर जोर दे रही है। चारधाम जैसे आध्यात्मिक स्थलों को 3D स्कैनिंग, वर्चुअल टूर और डिजिटल आर्काइव के माध्यम से संरक्षित किया जाएगा। इससे विश्व भर के लोग इनकी झलक देख सकेंगे। चारधाम यात्रा पहले से डिजिटल रजिस्ट्रेशन पर चल रही है, अब दस्तावेजीकरण से संरक्षण मजबूत होगा।

युवाओं के लिए अवसर

प्रमुख पर्यटन स्थलों पर 10 हजार गाइडों को प्रशिक्षित करने की योजना से उत्तराखंड के युवाओं को लाभ मिलेगा। बेहतर गाइड पर्यटकों को इतिहास और संस्कृति की गहन जानकारी देंगे, जिससे पर्यटन बढ़ेगा और रोजगार सृजन होगा।

इन स्थलों को भूस्खलन, जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण की चुनौतियाँ हैं। विकास से संरक्षण मजबूत होगा, पर्यटन बढ़ेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह सतत विकास का माध्यम बनेगा।

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