देहरादून: उत्तराखंड की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य मंत्रिमंडल ने पर्यटन क्षेत्र को लाल फीताशाही की जकड़न से आजाद करने वाला एक क्रांतिकारी फैसला लिया है। कल देर रात समाप्त हुई कैबिनेट बैठक में होटल, रिजॉर्ट और होमस्टे निर्माण के लिए कृषि भूमि को गैर-कृषि भूमि में परिवर्तित करने की जटिल प्रक्रिया को सरलीकृत कर दिया गया। यह कदम न केवल पर्यटन व्यवसाय को गति देगा, बल्कि स्थानीय लोगों को छोटे स्तर पर निवेश का अवसर प्रदान कर पलायन रोकने में भी मील का पत्थर साबित होगा। राज्य में पर्यटन, जो लाखों लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार देता है, अब और मजबूत होगा।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का इंजन पर्यटन ही है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 7 करोड़ से अधिक पर्यटकों ने उत्तराखंड की वादियों को निहारा, जो पिछले वर्ष से 20 प्रतिशत अधिक है। यह क्षेत्र न केवल राजस्व का प्रमुख स्रोत है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी पुनर्जीवित कर रहा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तराखंड पर्यटन के ब्रांड एंबेसडर के रूप में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व में सड़कों का विस्तार—जैसे चारधाम यात्रा मार्ग और रोपवे परियोजनाएं—हो रहा है। प्रचार-प्रसार के दम पर जो पर्यटन कभी गर्मियों तक सीमित था, वह अब विंटर तक फैल चुका है। सर्दियों में औली, चोपता और हर्षिल जैसे स्थल पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार हैं। बर्फीली चोटियों पर स्कीइंग, एडवेंचर स्पोर्ट्स और इको-टूरिज्म ने पर्यटन को वर्ष भर का स्वरूप दिया है।
हालांकि, पर्यटकों की बढ़ती संख्या के साथ ठहरने की सुविधाओं की कमी महसूस हो रही थी। नए होटल, रिजॉर्ट और होमस्टे के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया थी। उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम के नियम 143 के तहत कृषि भूमि को गैर-कृषि (होटल निर्माण हेतु) में बदलने के लिए लंबी कवायद गुजरनी पड़ती थी। आम बोलचाल में इसे ‘143 प्रक्रिया’ कहा जाता है। इसकी शुरुआत पटवारी से होती—जमीन की नाप-तौल, कानूनगो की जांच, तहसीलदार की रिपोर्ट, एसडीएम की मंजूरी और अंत में जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) के आदेश तक—यह चक्र महीनों लंबा और खर्चीला होता था। सैकड़ों दस्तावेज, बार-बार दौड़-भाग और रिश्वतखोरी की आशंकाएं आम थीं। कई छोटे निवेशक तो हार मान लेते थे।
पिछले वर्षों में भूमि कानूनों के सख्त सुधारों के बाद पहाड़ी जिलों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीद में 40 प्रतिशत की गिरावट आई है। इससे स्थानीय निवासियों को फायदा हुआ, लेकिन निर्माण की बाधा बनी रही। अब कैबिनेट के इस फैसले से नियम 143 की प्रक्रिया को पूरी तरह हटा दिया गया है। पर्यटन विभाग के अधीन आने वाली भूमि पर होटल-रिजॉर्ट निर्माण के लिए अब सीधा अनुमोदन मिलेगा, बशर्ते यह इको-फ्रेंडली हो और पर्यावरण मानकों का पालन करे। मुख्यमंत्री धामी ने बैठक के बाद कहा, “पर्यटन हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह फैसला स्थानीय युवाओं को उद्यमी बनाने का माध्यम बनेगा। पलायन रुकेगा, गांव मजबूत होंगे।”
यह निर्णय छोटा लग सकता है, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक होगा। राज्य में वर्तमान में 2,500 से अधिक रजिस्टर्ड होटल-रिजॉर्ट हैं, लेकिन क्षमता उपयोग 70 प्रतिशत से कम है। नए निर्माण से 50,000 अतिरिक्त रोजगार सृजन संभव है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे होमस्टे संस्कृति को बल मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और युवाओं को सिलाई, खान-पान और गाइड सेवाओं में अवसर बढ़ेंगे। पर्यटन मंत्री सत्येंद्र सिंह नेगी ने बताया, “हम इको-टूरिज्म को प्राथमिकता देंगे। सौर ऊर्जा, वेस्ट मैनेजमेंट और स्थानीय सामग्री अनिवार्य होंगी।”
पर्यटन राज्य की दशा-दिशा बदल सकता है। यह पलायन रोककर गांवों की आर्थिकी मजबूत करेगा, जनकल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च घटाएगा और जीवन गुणवत्ता सुधारेगा। सर्दियों में बढ़ते पर्यटकों के लिए यह फैसला सही समय पर आया है। चारधाम यात्रा और विंटर कार्निवल जैसे आयोजनों से पर्यटन चरम पर है। सरकार का लक्ष्य 2026 तक 10 करोड़ पर्यटक लाना है, और यह फैसला उसी दिशा में कदम है।
कुल मिलाकर, कैबिनेट का यह निर्णय पर्यटन व्यवसाय में नई जान फूंक रहा है। स्थानीय निवेशकों को मिली राहत से पहाड़ों की वादियां न केवल पर्यटकों, बल्कि उद्यमियों की भी चहल-पहल से गूंजेंगी। उत्तराखंड अब सतत विकास का मॉडल बनेगा, जहां प्रकृति और समृद्धि का संतुलन बरकरार रहेगा।

