देहरादून (विशेष संवाददाता): उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के ग्रामीण क्षेत्रों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की रफ्तार पर पूरी तरह ब्रेक लग गया है। निर्माण सामग्री की देनदारी 50 करोड़ रुपये से अधिक हो जाने से दुकानदार सामग्री देने से कतरा रहे हैं, जबकि जुलाई 2024 के बाद से केंद्र या राज्य सरकार की ओर से कोई नया बजट जारी नहीं हुआ है। वित्तीय वर्ष 2024-25 समाप्ति की दहलीज पर खड़ा है, लेकिन अनुमोदित 8985 योजनाओं में से मात्र 1833 योजनाएं ही पूरी हो पाई हैं। शेष 7152 योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं, जिससे ग्रामीणों को रोजगार के साथ-साथ स्थायी संपत्तियों का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। विभागीय अधिकारियों का दावा है कि जल्द भुगतान हो जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
मनरेगा योजना ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। वर्ष 2005 में शुरू हुई यह योजना ग्रामीण परिवारों को साल में कम से कम 100 दिन का गारंटीड रोजगार प्रदान करती है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण है, जहां प्रवास रोकने, सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने और ग्रामीण अवसंरचना मजबूत करने के लिए यह योजना जीवनरेखा साबित होती रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देशभर में मनरेगा के तहत अब तक लाखों स्थायी संपत्तियां निर्मित की जा चुकी हैं, जिनमें तालाब, सड़कें, चेकडैम और आंगनबाड़ी भवन शामिल हैं। लेकिन देहरादून जिले में वित्तीय संकट ने इस योजना की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में जिले में कुल 8985 योजनाएं अनुमोदित की गई थीं। दस माह बीतने के बाद भी केवल 22 प्रतिशत योजनाएं ही पूर्ण हो सकी हैं। पक्के निर्माण कार्यों में सीमेंट, बालू, बजरी, सरिया जैसी सामग्री की बड़ी मात्रा उपयोग होती है, जो निजी दुकानदारों से क्रय की जाती है। जुलाई 2024 में अंतिम बार 12.37 करोड़ रुपये का बजट जारी हुआ था, उसके बाद से कोई राशि नहीं आई। नतीजतन, सामग्री आपूर्तिकर्ताओं की देनदारी 50 करोड़ रुपये पार कर गई है। दुकानदार अब नई योजनाओं के लिए सामग्री देने से साफ इंकार कर रहे हैं, जिससे निर्माण कार्य पूरी तरह ठप हो गया है।
विकासखंडवार आंकड़े इस संकट की गहराई को और स्पष्ट करते हैं। सबसे अधिक अधूरी योजनाएं चकराता विकासखंड में हैं, जहां 1863 योजनाएं लंबित हैं। इसके बाद कालसी में 3114, विकासनगर में 682, सहसपुर में 477, रायपुर में 573 और डोईवाला में 443 योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। इनमें से अधिकांश पक्के निर्माण कार्य हैं, जिनमें तालाबों की चारदीवारी और सौंदर्यीकरण, सीसी रोड, खड़ंजा सड़कें, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, छोटी नहरें, गूल, सिंचाई चेकडैम और फार्म पॉन्ड जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। ये कार्य न केवल रोजगार प्रदान करते हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण, सिंचाई और कनेक्टिविटी को मजबूत करते हैं।
मनरेगा के तहत सामग्री और मजदूरी का अनुपात 40:60 निर्धारित है, लेकिन सामग्री भुगतान में देरी पूरे सिस्टम को प्रभावित कर रही है। दुकानदारों का कहना है कि महीनों से बकाया राशि न मिलने से उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है। कई दुकानदारों ने तो क्रेडिट पर सामग्री देना ही बंद कर दिया है। विभागीय अधिकारी दुकानदारों को बार-बार भरोसा दिला रहे हैं कि जल्द बजट आएगा, लेकिन ग्रामीणों और मजदूरों में निराशा बढ़ती जा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि मनरेगा योजना अब नए नाम से जानी जाने लगी है। इसे “वीबी जी राम जी” यानी विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन ग्रामीण (Viksit Bharat – Rozgar Aur Aajeevika Guarantee Mission Grameen) कहा जा रहा है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी विकसित भारत संकल्प यात्रा के तहत इस योजना को नया स्वरूप देने की कवायद चल रही है। हालांकि, नई एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) अभी पूरी तरह जारी नहीं हुई है। फिलहाल प्रचार-प्रसार का काम चल रहा है, जबकि सॉफ्टवेयर रिव्यू और टाइप ऑफ वर्क में बदलाव पर खामोशी है। नई योजनाओं के प्रस्ताव भी फिलहाल स्वीकृत नहीं हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरानी योजनाओं का बकाया क्लियर न होने से नई योजना के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ेगा।
जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के डीडीओ सुनील कुमार ने बताया कि निर्माण सामग्री की देनदारी बकाया जरूर है, लेकिन इसे जल्द क्लियर करने का भरोसा दिया गया है। उन्होंने कहा, “निर्माणाधीन योजनाओं का लगभग 60 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। वित्तीय वर्ष समाप्ति में अभी समय बाकी है। हम अधिक से अधिक योजनाओं को पूरा करने के प्रयास में जुटे हैं।” हालांकि, जमीनी स्तर पर अधिकारी और कर्मचारी दबाव में हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो मनरेगा में बकाया भुगतान की समस्या नई नहीं है। विभिन्न राज्यों से समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं। केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में योजना के लिए बड़े पैमाने पर फंड जारी किए हैं, लेकिन सामग्री और प्रशासनिक कंपोनेंट में अभी भी हजारों करोड़ की देनदारी लंबित है। उत्तराखंड में पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियों के कारण कार्यों की लागत अधिक आती है, जिससे बजट की कमी जल्दी महसूस होती है।
यह संकट न केवल ग्रामीण विकास को प्रभावित कर रहा है, बल्कि प्रवास को बढ़ावा देने का खतरा भी पैदा कर रहा है। ग्रामीण युवा रोजगार के अभाव में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यदि समय रहते बकाया क्लियर नहीं हुआ तो हजारों परिवारों का रोजगार और ग्रामीण अवसंरचना का विकास अधर में लटक जाएगा। सरकार को चाहिए कि न के तहत विशेष पैकेज जारी कर इस संकट से निजात दिलाए।

