नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी के प्रसिद्ध जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट से जुड़ी एक जनहित याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक सड़कों पर किसी भी प्रकार की टोल वसूली पूरी तरह अवैध है। कोर्ट ने अपने 7 मार्च 2025 के अंतरिम आदेश को अंतिम रूप देते हुए लोगों को ट्रैक रूट और कॉमन पाथवे पर बेरोकटोक आवागमन की अनुमति दी है। अब कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक सड़क का उपयोग करने के लिए शुल्क देने को बाध्य नहीं होगा, जिससे स्थानीय निवासियों और पर्यटकों को बड़ी राहत मिली है।
इस फैसले से पर्यटन विभाग को भी संबल मिला है, क्योंकि कोर्ट ने एस्टेट को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने से जुड़े अन्य विवादों को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने केवल टोल वसूली को अवैध ठहराया, जबकि प्रोजेक्ट के बाकी पहलुओं पर उठाए गए सवालों को अस्वीकार करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया। कोर्ट ने आगे इस मामले में किसी भी विवाद को न चलाए जाने के निर्देश भी जारी किए हैं।
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 6 जनवरी को यह आदेश पारित किया। याचिका स्थानीय निवासी विनिता नेगी ने दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पर्यटन विभाग ने जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की करोड़ों की संपत्ति को नियमों के विरुद्ध एक निजी कंपनी को कम दाम पर सौंप दिया। निजी ठेकेदार द्वारा कॉमन पार्क एस्टेट रोड पर टोल बैरियर लगाकर स्थानीय लोगों और पर्यटकों से अवैध रूप से शुल्क वसूला जा रहा था।
हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश को अंतिम रूप देते हुए कहा, “सार्वजनिक सड़क पर चलने के लिए कोई टोल नहीं वसूला जा सकता। जॉर्ज एवरेस्ट पार्क में प्रवेश शुल्क अलग विषय है, लेकिन सड़क पर बैरियर लगाकर पैसे लेना अनुचित है।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पार्क में एंट्री फीस के रूप में निर्धारित शुल्क वैध है और इसे नियमों के अनुरूप ही लिया जा सकता है। हालांकि, आठवें प्रतिवादी (निजी ऑपरेटर) को स्थानीय लोगों या आम जनता से टोल वसूलने से रोक दिया गया है। कोर्ट ने जोर दिया कि यह आदेश पार्क को पूरी तरह निःशुल्क नहीं बनाता, बल्कि केवल सड़क पर टोल वसूली पर प्रतिबंध लगाता है।
कोर्ट ने आगे कहा, “इस रिट याचिका पर आगे सुनवाई की जरूरत नहीं है। 17 मार्च 2025 के अंतरिम आदेश को कंफर्म करके इसका निपटारा किया जा सकता है, जिसके तहत रेस्पॉन्डेंट को पर्यटकों या स्थानीय लोगों पर कोई टोल फीस लगाने या वसूलने से रोका गया था, जो केवल उस सड़क का इस्तेमाल करना चाहते हैं।” कोर्ट ने नोट किया कि परियोजना का ठेका 2022 में दिया गया और 2023 में अनुबंध हुआ, लेकिन याचिका 2025 में दायर की गई। जनहित को ध्यान में रखते हुए सुनवाई की गई, लेकिन हेलिपैड, एयर सफारी, वन्यजीव अभयारण्य की निकटता, पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय भागीदारी जैसे मुद्दों पर आरोपों को न्यायिक जांच में प्रमाणित नहीं पाया गया। सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और पहले दिए आदेश को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले का अंतिम निस्तारण कर दिया।
सुनवाई के दौरान निजी प्रतिवादी के वकील ने दावा किया कि बैरियर केवल ट्रैफिक नियंत्रण के लिए लगाए गए थे, न कि टोल वसूली के लिए। कोर्ट ने कहा कि अंतिम आदेश के बाद इस दलील पर अलग से विचार की आवश्यकता नहीं है।
यह फैसला पर्यटन विकास और जन अधिकारों के बीच संतुलन का प्रतीक है। हाईकोर्ट का संदेश साफ है कि पर्यटन के नाम पर आम जनता के अधिकारों का हनन स्वीकार्य नहीं। मसूरी के जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट, जो ब्रिटिश सर्वेयर सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर है, अब पर्यटकों के लिए अधिक सुलभ हो जाएगा, जिससे क्षेत्रीय पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। स्थानीय निवासियों ने इस फैसले का स्वागत किया है, जबकि पर्यटन विभाग अब बिना विवाद के विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा।

