Tuesday, January 13, 2026
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गैर-अनुसूचित जातियों के मामले में हाईकोर्ट सख्त, केंद्र-राज्य तलब

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 2013 और 2014 में 48 गैर-अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जाति (एससी) की सूची में शामिल करने के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 5 दिसंबर को हुई सुनवाई में भारत सरकार के गृह, कानून एवं समाज कल्याण मंत्रालय के सचिवों तथा उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (समाज कल्याण) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के अंदर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है। याचिकाकर्ता हरिद्वार निवासी मीनू ने दायर जनहित याचिका में तर्क दिया है कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 341 का स्पष्ट उल्लंघन है, क्योंकि जातियों को एससी सूची में शामिल करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति और संसद को प्राप्त है। याचिका में उच्च न्यायालय से राज्य में संवैधानिक व्यवस्था बहाल करने की गुहार लगाई गई है।

यह मामला उत्तराखंड के आरक्षण और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में एक नया विवाद खड़ा कर रहा है। राज्य सरकार ने 2013-14 में तत्कालीन प्रमुख सचिव (समाज कल्याण) द्वारा जारी शासनादेशों के माध्यम से 48 जातियों—जिनमें कोली, गुज्जर, बाखेरवाल, जाटव, पासी, धोबी, लोहार, नाई, कुम्हार, तेली, बढ़ई, लोनिया, धनगर, जोगी, सैनी, कश्यप, मल्लाह, केवट, कुमावत, रैकवार, बरेली, गढ़वाल, कुमाऊंनी ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर, जैन, सिख, बौद्ध, ईसाई आदि शामिल हैं—को एससी सूची में जोड़ दिया था। इन जातियों को सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और अन्य लाभ प्रदान करने का प्रावधान किया गया। लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि ये जातियां परंपरागत रूप से अनुसूचित नहीं थीं और इन्हें सूची में शामिल करना राज्य सरकार की मनमानी है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि 26 जनवरी 2016 को जारी राजपत्र अधिसूचना के अनुपालन में एससी/एसटी विशेष न्यायालयों की स्थापना भी नहीं की गई, जिससे इन समुदायों के हितों की रक्षा प्रभावित हो रही है।

संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद 341 स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति को एससी सूची तैयार करने और संसद को उसके संशोधन का अधिकार देता है। राज्य सरकारें केवल सिफारिश कर सकती हैं, लेकिन स्वतंत्र रूप से बदलाव नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस.पी. शर्मा ने बताया, “यह पहला मामला नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी इसी तरह के शासनादेशों को हाईकोर्ट ने रद्द किया है। उत्तराखंड में 2000 के राज्य गठन के बाद एससी सूची में बदलाव की मांग लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन केंद्र की मंजूरी के बिना यह अवैध है। यदि कोर्ट ने फैसला राज्य के पक्ष में दिया, तो हजारों लाभार्थियों का भविष्य अधर में लटक सकता है।” शर्मा के अनुसार, 2013-14 के शासनादेशों से लगभग 2 लाख लोगों को आरक्षण लाभ मिला, लेकिन अब इसकी वैधता पर सवाल उठने से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।

उत्तराखंड, जो 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आया, में एससी आबादी लगभग 18 प्रतिशत है। राज्य की एससी सूची में मूल रूप से 66 जातियां शामिल हैं, लेकिन 2013-14 के फैसले से यह संख्या 114 हो गई। सरकार का तर्क था कि स्थानीय सर्वे के आधार पर ये जातियां सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी हैं, इसलिए इन्हें लाभ मिलना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर आपत्ति जताई थी, और 2016 की अधिसूचना में स्पष्ट किया गया कि राज्य स्तर पर बदलाव मान्य नहीं। याचिका में मीनू ने कहा कि इससे ‘ओबीसी’ और ‘जनरल’ श्रेणी के उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ सकता है, क्योंकि कई राज्य—जैसे महाराष्ट्र और तेलंगाना—में भी एससी सूची विस्तार की मांग चल रही है।

इस मुद्दे का असर राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। भाजपा सरकार ने 2014 में सत्ता संभालते ही इन शासनादेशों को लागू किया था, जो सामाजिक न्याय के नाम पर वोट बैंक मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है। विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे ‘असंवैधानिक’ बताते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है। कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कहा, “सरकार आरक्षण के नाम पर संविधान का मजाक उड़ा रही है। कोर्ट का हस्तक्षेप स्वागतयोग्य है, लेकिन इससे प्रभावित परिवारों को न्याय मिलना चाहिए।” दूसरी ओर, राज्य सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि वे कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे और केंद्र से आवश्यक मंजूरी की प्रक्रिया तेज करेंगे।

याचिका में एक महत्वपूर्ण बिंदु एससी/एसटी विशेष न्यायालयों की स्थापना का है। संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत इन अदालतों का गठन अत्याचार के मामलों की तेज सुनवाई के लिए अनिवार्य है। लेकिन उत्तराखंड में अभी तक ऐसा कोई विशेष ढांचा स्थापित नहीं हुआ, जिससे पीड़ितों को सामान्य अदालतों में लंबी प्रक्रिया झेलनी पड़ रही है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी 2024 में उत्तराखंड को चेतावनी जारी की थी। यदि कोर्ट ने इस पर सख्ती की, तो राज्य को तत्काल कदम उठाने पड़ सकते हैं।

यह मामला न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक न्याय की व्यापक बहस को जन्म दे रहा है। आरक्षण व्यवस्था, जो डॉ. बी.आर. अंबेडकर के संवैधानिक दृष्टिकोण पर आधारित है, समय-समय पर विवादों में घिरती रही है। 1992 के इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा दी, लेकिन एससी सूची के विस्तार पर सख्ती बरती। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां जातिगत समीकरण जटिल हैं, यह फैसला सामुदायिक सद्भाव को प्रभावित कर सकता है। सामाजिक कार्यकर्ता मीरा बेदी ने कहा, “आरक्षण लाभार्थियों की पहचान वैज्ञानिक सर्वे पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव पर। कोर्ट का फैसला एक मिसाल कायम करेगा।”

अगली सुनवाई 6 जनवरी को होने से पहले केंद्र और राज्य सरकारें अपने जवाब तैयार करेंगी। यदि कोर्ट ने शासनादेश रद्द किए, तो प्रभावित जातियों को पुनर्वास पैकेज की आवश्यकता हो सकती है। कुल मिलाकर, यह याचिका उत्तराखंड में संवैधानिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रयास है, जो आरक्षण नीति की समीक्षा को मजबूर करेगी। उम्मीद है कि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष रहेगी और सभी पक्षों के हित सुरक्षित होंगे।

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