Sunday, February 8, 2026
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मुगलों को सबक सिखाने वाली गढ़वाल की वीरांगना “रानी कर्णावती”

NTI (मोहन भुलानी) : गढ़वाल क्षेत्र का इतिहास साहस, शौर्य और स्वाभिमान की गाथाओं से भरा हुआ है। इस इतिहास में एक नाम जो विशेष रूप से उजागर होता है, वह है रानी कर्णावती—राजा महिपत शाह की पत्नी और गढ़वाल की वीरांगना। रानी बुद्धिमती के साथ बहुत स्वाभिमानी भी थी, मुगल साम्राज्य के शक्तिशाली शासक शाहजहां के सामने गढ़वाल की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए उनके दृढ़ संकल्प को याद किया जाता है।

रानी कर्णावती का जीवन उस दौर में शुरू हुआ जब गढ़वाल एक स्वतंत्र और समृद्ध राज्य था। उनके पति, राजा महिपत शाह, गढ़वाल के शासक थे, जिनका शासन 17वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में स्थापित था। 14 फरवरी 1628 को शाहजहां का मुगल सिंहासन पर अभिषेक हुआ, और इस अवसर पर देश के तमाम राजा आगरा पहुंचे। हालांकि, महिपत शाह ने इस समारोह में भाग लेने से इनकार कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार, इसके दो मुख्य कारण थे: पहला, पहाड़ी इलाकों से आगरा तक की यात्रा उस समय बेहद कठिन थी, और दूसरा, महिपत शाह मुगल शासन की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। यह निर्णय शाहजहां को नागवार गुजरा, और कहा जाता है कि इस घटना ने उनके मन में गढ़वाल के प्रति शत्रुता पैदा कर दी।

और भी एक कहानी प्रचलित है कि किसी ने शाहजहां को यह भ्रमजाल रचा कि गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में सोने की खदानें हैं, जो मुगल शासक की लालच को और भड़का दिया। महिपत शाह की सेना में रिखोला लोधी और माधो सिंह भंडारी जैसे वीर सेनापति थे, जिनकी वीरता गढ़वाल की रक्षा की मजबूत दीवार थी। लेकिन इन दोनों सेनानायकों की मृत्यु के बाद महिपत शाह भी शीघ्र ही स्वर्ग सिधार गए। यह घटना लगभग 1635 के आसपास मानी जाती है। उस समय उनके पुत्र पृथ्वीपति शाह केवल 7 वर्ष के थे। राजगद्दी पर पृथ्वीपति शाह को बैठाया गया, लेकिन वास्तविक शासन की बागडोर उनकी माता रानी कर्णावती ने संभाली।

मुगल आक्रमण और रणनीति

सन 1622 में महाराजा श्याम शाह की मौत अलकनंदा में डूबने के कारण हुई । उसके बाद उनके पुत्र महाराजा महिपत शाह ने मुगलों की सत्ता को कई बार चुनौती दी। इतना ही नहीं, उन्होंने तिब्बत तीन बार आक्रमण किया, लेकिन 1631 में में वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए।

उस समय उनके बेटे पृथ्वी शाह की उम्र सिर्फ 7 साल थी। ऐसे राज्य की बागडोर महारानी कर्णावती के हाथों में आ गई। महारानी कर्णावती हिमाचल के राजपरिवार से थीं, इसलिए शासन कला में वह सिद्धहस्त थीं। लेकिन, एक महिला को शासन करते देख काँगड़ा का मुगल सूबेदार नजाबत खान (Nazabat Khan) ने मुगल बादशाह शाहजहाँ (Mughal Ruler Shahjahan) से आज्ञा लेकर 1635 में गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर पर आक्रमण करने के लिए बढ़ चला।

17वीं शताब्दी भारत आए इटली के यात्री निकोलाओ मानूची ने कर्णावती और मुगलों के संघर्ष के बारे में विस्तार लिखा है। उसने लिखा है कि मुगल सैनिक जब शिवालिक की तलहटी से ऊपर चढ़ना शुरू किया, तब गढ़वाली सैनिकों ने गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया।

हिमालयन गजेटियर में अंग्रेज़ विद्वान एडविन एटकिंसन ने लिखा है कि महारानी कर्णावती पर्वत की चोटी पर मौजूद बिनसर मंदिर से दुश्मनों के खिलाफ सेना का संचालनकर रही थीं। एक समय ऐसा भी आया, जब उनकी स्थिति कमजोर होने लगी तब अचानक ओलावृष्टि शुरू हो गई। इससे दुश्मन पीछे हटने पर मजबूर हो गया। महारानी ने इसे भगवान का आशीर्वाद समझा।

इतिहासकारों के अनुसार, नजाबत खान 30,000 घुड़सवारों और पैदल सैनिकों के साथ गढ़वाल की ओर कूच कर गया। इटली के लेखक निकालाओ मानोची ने अपनी पुस्तक Historia Domogor में इस अभियान का उल्लेख किया है, हालांकि उन्होंने रानी कर्णावती या नजाबत खान का नाम विशेष रूप से नहीं लिया। मानोची के अनुसार, मुगल सेना ने गढ़वाल की सीमा में प्रवेश किया, लेकिन रानी कर्णावती ने एक चतुर रणनीति अपनाई। उन्होंने मुगल सेना को अपनी सीमा में आने दिया, लेकिन जैसे ही वे वर्तमान लक्ष्मण झूला क्षेत्र से आगे बढ़े, उनके आगे और पीछे के रास्ते बंद कर दिए गए। पहाड़ी इलाकों और गंगा के किनारे की जटिल भौगोलिक स्थिति से अनजान मुगल सैनिकों के सामने खाद्य सामग्री की कमी होने लगी। रसद पहुंचाने के सभी मार्ग भी अवरुद्ध कर दिए गए।

नाक कटवाने की सजा

मुगल सेना कमजोर पड़ने लगी, और नजाबत खान ने संधि का प्रस्ताव भेजा, लेकिन रानी ने इसे ठुकरा दिया। इस स्थिति में रानी के पास मुगल सैनिकों को पूरी तरह खत्म करने का अवसर था, लेकिन उन्होंने एक अनूठा और कठोर दंड चुना। उन्होंने संदेश भिजवाया कि मुगल सैनिकों को जीवनदान दिया जा सकता है, लेकिन इसके बदले उन्हें अपनी नाक कटवानी होगी। हार मान चुके सैनिकों ने यह सजा स्वीकार कर ली, सोचते हुए कि नाक कट भी जाए तो जिंदगी बची रहेगी। नतीजतन, मुगल सैनिकों के हथियार छीन लिए गए, और उनकी नाकें काट दी गईं। इसमें नजाबत खान भी शामिल था। कथाओं के अनुसार, रानी ने इतना ही नहीं किया, बल्कि कटी नाकों को शाहजहां के दरबार तक भिजवाने की व्यवस्था भी की, जो गढ़वाल की शक्ति और स्वाभिमान का प्रतीक बन गया। इस कदम से रानी ने स्पष्ट संकेत दिया कि गढ़वाल पर फिर कभी आंख उठाकर न देखा जाए। शर्मिंदगी से आक्रांत नजाबत खान ने मैदानों की ओर लौटते समय आत्महत्या कर ली। यह घटना लगभग 1640 के आसपास हुई।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि रानी कर्णावती अपने विरोधियों को कड़ा दंड देने के लिए नाक कटवाने की सजा का सहारा लेती थीं। एक अन्य कथा के अनुसार, जब नजाबत खान ने दून घाटी और चंडी घाटी (वर्तमान लक्ष्मण झूला क्षेत्र) पर कब्जा कर लिया, तो रानी ने उसे प्रलोभन दिया कि वह शाहजहां के लिए ₹1 लाख का उपहार जल्द भेज देगी। नजाबत खान ने लगभग एक महीने तक इस पैसे का इंतजार किया, जिस दौरान गढ़वाल की सेना ने उसके सभी रास्ते बंद कर दिए। खाद्य सामग्री की कमी और अज्ञात बुखार से पीड़ित सैनिकों पर गढ़वाली सेना ने आक्रमण किया, और रानी के आदेश पर नाकें काटी गईं। नजाबत खान जंगलों के रास्ते मुरादाबाद तक पहुंचा, लेकिन इस हार से शाहजहां बेहद शर्मिंदा हुआ।

गढ़वाल का सम्मान

शाहजहां ने बाद में अरीज खान को गढ़वाल पर हमले के लिए भेजा, लेकिन वह भी दून घाटी से आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद शाहजहां के पुत्र औरंगजेब ने भी गढ़वाल पर विजय की नाकाम कोशिश की। ये घटनाएं गढ़वाल की भौगोलिक स्थिति और रानी कर्णावती की कूटनीति का प्रमाण हैं, जिन्होंने मुगल साम्राज्य की शक्ति के बावजूद अपनी स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा की।

रानी कर्णावती की कहानी गढ़वाल के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। उनकी बुद्धिमत्ता, साहस और रणनीतिक कौशल ने न केवल मुगल आक्रमण को विफल किया, बल्कि गढ़वाल को एक स्वाभिमानी राज्य के रूप में स्थापित किया। नाक कटवाने की सजा, जो एक क्रूर लेकिन प्रभावी दंड थी, शत्रुओं के लिए एक चेतावनी बन गई। उनकी विरासत आज भी उत्तराखंड की पहाड़ियों में गूंजती है, जहां स्वतंत्रता और शौर्य की भावना जीवित है। रानी कर्णावती न केवल एक शासिका थीं, बल्कि एक ऐसी योद्धा थीं, जिन्होंने अपने राज्य और लोगों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया।

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