टनकपुर (चंपावत): उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने टनकपुर के शारदा घाट पर आयोजित भव्य कार्यक्रम में ₹185.20 करोड़ की लागत से विकसित हो रही शारदा कॉरिडोर परियोजना के प्रथम चरण का शुभारंभ किया। इस अवसर पर सीएम ने परियोजना का स्थलीय निरीक्षण भी किया, जो राज्य के धार्मिक पर्यटन और सतत विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का वादा करता है।
मुख्यमंत्री धामी ने कहा, “शारदा कॉरिडोर हमारी आस्था, सांस्कृतिक धरोहर और सतत विकास का केंद्र बनेगा। यह परियोजना बनबसा से माता रंकोची तक की पवित्र घाटी को धर्म, प्रकृति और रोजगार के सुंदर संगम के रूप में विकसित करेगी।” उन्होंने जोर देकर कहा कि यह केवल आस्था का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन में आर्थिक समृद्धि की नई धारा भी बहाएगा।
पर्यावरण-संवेदनशील विकास का मॉडल
शारदा घाट के पुनर्विकास को प्रथम चरण का केंद्र बनाते हुए परियोजना में सुरक्षित स्नान घाट, अंतरराष्ट्रीय स्तर का आरती स्थल, स्वच्छता एवं विश्राम सुविधाएं, सुंदर घाट, सुगम पहुंच मार्ग, पैदल पथ, उन्नत प्रकाश व्यवस्था और सौंदर्यीकरण कार्य शामिल हैं। आरती स्थल में रेनवाटर हार्वेस्टिंग, फ्लोर कूलिंग सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकें होंगी, जबकि बाढ़ प्रतिरोधी संरचनाएं नदी प्रवाह को नियंत्रित कर आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।
इस चरण के प्रमुख उप-परियोजनाओं में शामिल हैं:
- किरोड़ा नाला पारिस्थितिक कॉरिडोर (₹109.57 करोड़): क्षेत्र की जैव विविधता संरक्षण और आपदा प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने के लिए।
- सिटी ड्रेनेज योजना – चरण 1 (₹62.11 करोड़): शहरी जल निकासी को मजबूत कर बाढ़ घटनाओं में कमी लाने हेतु।
- थाक गांव तक वैकल्पिक मार्ग (₹5.34 करोड़): कोर्बेट के अंतिम शिकार मार्ग के रूप में प्रसिद्ध इस रास्ते को तीर्थयात्रियों के लिए सुरक्षित बनाना।
परियोजना यूआईआईडीबी (उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) के माध्यम से संचालित हो रही है। कुछ क्षेत्र वन भूमि में होने से भूमि हस्तांतरण प्रक्रिया वन विभाग के साथ तेजी से चल रही है, जबकि डांडा और चूका जैसे राजस्व भूमि वाले हिस्सों का हस्तांतरण शीघ्र पूरा होगा।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
शारदा नदी, जो महाकाली नदी के नाम से भी जानी जाती है, उत्तराखंड-नेपाल सीमा पर बहने वाली पवित्र नदी है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से माता शारदा (सरस्वती) की उपासना स्थल रहा है। पूर्णागिरि और रंकोची मंदिर जैसे धार्मिक केंद्र यहां आस्था के प्रतीक हैं, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। ऐतिहासिक रूप से, यह घाटी रामायण काल से जुड़ी हुई है, जहां भगवान राम ने शारदा नदी के तट पर तपस्या की थी।
हाल के वर्षों में, राज्य सरकार ने गंगा कॉरिडोर के साथ-साथ शारदा कॉरिडोर को धार्मिक पर्यटन का नया केंद्र बनाने पर जोर दिया है। जनवरी 2024 में शुरू हुई इस पहल ने मई 2024 तक मास्टर प्लान तैयार कर लिया, जो धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास पर केंद्रित है। फरवरी 2025 में सीएम धामी ने इसकी समीक्षा बैठक की, जिसमें पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और अन्य अधिकारियों ने भाग लिया। यह परियोजना न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में भी क्रांति लाएगी।
जन-सहभागिता और पर्यावरण संरक्षण
मुख्यमंत्री ने बताया कि पूर्णागिरि और माता रंकोची क्षेत्र वन, जीव-जंतु और प्रकृति शिक्षा के अनुभव केंद्र बनेंगे। “यह पर्यावरण-संवेदनशील विकास का उदाहरण होगा, जहां नदी की पवित्रता, हरियाली और प्राकृतिक संतुलन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा,” उन्होंने कहा। सरकार का संकल्प है कि विकास जन-सहभागिता, पारदर्शिता और पर्यावरणीय संतुलन के साथ हो। हर निर्णय में स्थानीय नागरिकों की राय ली जाएगी।
मुख्यमंत्री ने चंपावत जिले में एक और कृषि विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा भी की, जो क्षेत्रीय विकास को और मजबूत करेगी। उन्होंने शारदा कॉरिडोर को “हमारी आस्था और आत्मा का पुनर्जागरण” बताते हुए कहा कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए परंपरा और प्रगति का संगम बनेगा।
यह परियोजना न केवल उत्तराखंड के तराई क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन का हब बनाएगी, बल्कि नेपाल से सटे बॉर्डर क्षेत्र में सीमा सुरक्षा और आर्थिक एकीकरण को भी बढ़ावा देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सालाना लाखों पर्यटकों का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे स्थानीय हस्तशिल्प, होमस्टे और इको-टूरिज्म को नया आयाम मिलेगा।

