(मोहन भुलानी ), देहरादून : उत्तराखंड के जंगलों में उगने वाले जंगली फल लंबे समय से स्थानीय समुदायों के लिए पोषण और स्वास्थ्य का प्रमुख स्रोत रहे हैं। पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद में उपयोग होने वाले ये फल एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और औषधीय गुणों से भरपूर माने जाते हैं। अब सरकार भी इन जंगली संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग और व्यावसायिक दोहन की दिशा में ठोस पहल कर रही है। उद्देश्य है—ग्रामीण आजीविका को मज़बूत करना, वन उत्पादों का मूल्य संवर्द्धन करना और इन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जोड़ना। इस पहल से वन-आधारित अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।
राज्य सरकार बड़े पैमाने पर सी-बकथॉर्न ((sea buckthorn) उत्पादन की योजना बना रही है। यह पौधा, जो हिप्पोफे सालिसिफोलिया के नाम से जाना जाता है, हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगता है और किसानों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम बन सकता है। विशेष रूप से पिथौरागढ़ जिले की दारमा और व्यास घाटियों में सी-बकथॉर्न को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि स्वास्थ्य और सौंदर्य उत्पादों में इसकी बढ़ती मांग के कारण आर्थिक लाभ भी प्रदान करता है।
सीबकथॉर्न क्या है और क्यों महत्वपूर्ण?
सी-बकथॉर्न (sea buckthorn) एक झाड़ीदार पौधा है जो ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में उगता है। यह 1500 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है और विटामिन सी से भरपूर होता है – एक फल में संतरे से 12 गुना अधिक विटामिन सी होता है। इसके अलावा, इसमें विटामिन ई, ओमेगा फैटी एसिड्स और एंटीऑक्सिडेंट्स प्रचुर मात्रा में हैं। पारंपरिक रूप से, हिमालयी समुदाय इसे दवा के रूप में उपयोग करते हैं, जैसे कि त्वचा रोगों, पाचन समस्याओं और थकान दूर करने के लिए। आधुनिक समय में, यह जूस, तेल, कॉस्मेटिक्स और सप्लीमेंट्स में इस्तेमाल होता है। वैश्विक बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है, खासकर यूरोप और अमेरिका में, जहां इसे ‘सुपरफूड’ कहा जाता है।
उत्तराखंड में, सी-बकथॉर्न (sea buckthorn) को ‘बद्री बेरी’ या ‘चुक’ के नाम से जाना जाता है। यह राज्य के पर्वतीय जिलों में जंगली रूप से उगता है और मिट्टी कटाव को रोकने में मदद करता है। हालांकि, बड़े पैमाने पर खेती के लिए चुनौतियां हैं, जैसे कि कठोर जलवायु और पहुंच की कमी। अनुसंधान बताते हैं कि यदि सही तरीके से प्रबंधित किया जाए, तो यह पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ पहुंचा सकता है, लेकिन अत्यधिक दोहन से जैव विविधता पर असर पड़ सकता है।
उत्तराखंड सरकार की योजनाएं और पहल
उत्तराखंड सरकार ने सी-बकथॉर्न को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। 2025 में लॉन्च की गई अरोमा रेवोल्यूशन पॉलिसी (2026-36) का उद्देश्य राज्य में सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती को बढ़ाना है, जिससे 10 वर्षों में 1200 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो सके। इस पॉलिसी के तहत सात अरोमा वैली और पांच सैटेलाइट सेंटर्स स्थापित किए जाएंगे। किसानों को 1 हेक्टेयर तक 80% सब्सिडी और उसके बाद 50% सब्सिडी दी जाएगी। सी-बकथॉर्न को सुपरफूड के रूप में मान्यता देते हुए, केंद्र सरकार ने भी उत्तराखंड की प्रस्तावों को मंजूरी दी है।
विशेष रूप से पिथौरागढ़ जिले की दारमा और व्यास घाटियां इस योजना का केंद्र हैं। ये घाटियां उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं, जहां सी-बकथॉर्न प्राकृतिक रूप से प्रचुर है। यहां के भोटिया समुदाय पारंपरिक रूप से इसके फलों का उपयोग करते हैं। सरकार ने यहां डेमो प्लॉट्स स्थापित किए हैं, जहां 1-2 हेक्टेयर पर खेती की जा रही है। किसानों को प्रशिक्षण, बीज और बाजार लिंकेज प्रदान किया जा रहा है। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि प्रवास को भी रोका जा सकेगा। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर खेती से स्थानीय पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है, इसलिए सतत विकास पर जोर दिया जाना चाहिए।
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में सी-बकथॉर्न की उपलब्धता
उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में सी-बकथॉर्न (sea buckthorn) मुख्य रूप से जंगली रूप में उपलब्ध है। हाल के सर्वेक्षणों और अनुसंधानों के अनुसार, राज्य में इसका कुल वितरण क्षेत्रफल लगभग 5200 हेक्टेयर है। यह आंकड़ा प्राकृतिक जनसांख्यिकीय सर्वेक्षणों पर आधारित है और इसमें उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली और पिथौरागढ़ जिले शामिल हैं। विस्तृत व्यौरा निम्नलिखित है:
| जिला | घाटी/क्षेत्र | अनुमानित क्षेत्रफल (हेक्टेयर) |
|---|---|---|
| उत्तरकाशी | हर-की-दून | 300 |
| उत्तरकाशी | गंगोत्री-हरसिल | 800 |
| उत्तरकाशी | यमुनोत्री | 1000 |
| रुद्रप्रयाग | केदार घाटी | 300 |
| चमोली | माणा -बद्री घाटी | 1200 |
| चमोली | नीति घाटी | 200 |
| पिथौरागढ़ | मुन्सियारी घाटी | 400 |
| पिथौरागढ़ | व्यास, दारमा और चौदास घाटियां | 1000 |
| कुल | 5200 |
यह डेटा फाइटोटॉक्स जर्नल और नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज से लिया गया है।
पिथौरागढ़ में दारमा और व्यास घाटियों में लगभग 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में सी-बकथॉर्न उपलब्ध है, जहां यह गांवों जैसे मिलम, रिलकोट, मार्तोली आदि में पाया जाता है। हालांकि, उत्पादन मात्रा पर सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि अधिकांश जंगली है। अनुमानित रूप से, प्रति हेक्टेयर 2-5 टन फल उत्पादन हो सकता है, लेकिन जंगली क्षेत्रों में यह कम होता है। लद्दाख में 11,000 हेक्टेयर से 500 टन वार्षिक कटाई होती है, जिससे उत्तराखंड में 100-200 टन का अनुमान लगाया जा सकता है। सरकारी रिपोर्ट्स में उल्लेख है कि चमोली में नीति और माना घाटियों में यह प्रचुर है, जबकि उत्तरकाशी में गंगोत्री क्षेत्र में।
धीराज गर्ब्याल, सचिव, ग्राम्य विकास विभाग, के अनुसार ..
पर्वतीय जिलों में सी-बकथॉर्न की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए ग्रामीण उद्यम वेग वृद्धि (रीप) योजना के तहत कार्ययोजना तैयार की जा रही है। पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और टिहरी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जहां-जहां वर्तमान में सी-बकथॉर्न का उत्पादन हो रहा है, उन स्थानों का चिन्हांकन किया जाएगा। इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से स्थानीय लोगों को इस फसल की खेती के लिए प्रेरित और सहयोगित किया जाएगा।
आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
सी-बकथॉर्न हिमालयी किसानों की अर्थव्यवस्था सुधार सकता है। एक हेक्टेयर से 10-15 टन फल प्राप्त हो सकते हैं, जिसकी बाजार कीमत 100-200 रुपये प्रति किलो है। इससे जूस, तेल और चाय बनाई जा सकती है। पिथौरागढ़ के भोटिया समुदाय पहले से ही मिलम में इसका व्यावसायिक उपयोग करते हैं। पर्यावरणीय रूप से, यह मिट्टी को बांधता है और जल संरक्षण में मदद करता है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन से इसकी उपलब्धता प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि खेती को जैविक तरीके से बढ़ावा दिया जाए।
बड़े पैमाने पर उत्पादन की योजना में चुनौतियां हैं, जैसे पहुंच की कमी और बाजार विकास। सरकार को प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करनी चाहिए। अनुसंधान से पता चलता है कि उत्तराखंड में सी-बकथॉर्न की जैव विविधता उच्च है, लेकिन संरक्षण आवश्यक है। भविष्य में, यह राज्य की जीडीपी में योगदान दे सकता है।

