Sunday, February 8, 2026
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आख़िर सियासी संतुलन के माहिर खिलाडी बने पुष्कर धामी !

देहरादून : सियासी संतुलन के माहिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने नेतृत्व और राजनैतिक कुशलता से न केवल उत्तराखंड बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक अलग पहचान बनाई है। उनका राजनैतिक सफर और कार्यशैली इस बात का प्रमाण है कि वह सियासी संतुलन साधने में माहिर हैं। उनके नेतृत्व में अपनाया गया ‘नीतिशास्त्र’ उनकी सफलता का आधार रहा है, जिसमें सीधा संवाद, कूटनीति और समझौते का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है।  यह खासियत उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती है कि वह असहमति के स्वरों से कभी विचलित नहीं होते। इसके विपरीत, वह मतभेदों का स्वागत करते हैं और इसे एक रचनात्मक अवसर के रूप में देखते हैं। उनके अब तक के कार्यकाल में, जो लगभग चार वर्षों का रहा है, कई बार राजनैतिक उथल-पुथल की स्थिति बनी, लेकिन हर बार इन चुनौतियों से अप्रभावित और सुरक्षित रहे।  
सीधा संवाद और कूटनीति का समन्वय पुष्कर धामी की सबसे बड़ी ताकत है उनका सीधा और पारदर्शी संवाद। वह जनता, सहयोगियों और यहां तक कि विरोधियों के साथ भी खुलकर बात करते हैं। उनका यह संवाद न केवल उनकी नीतियों को स्पष्ट करता है, बल्कि लोगों के बीच विश्वास भी पैदा करता है।  कूटनीति उनकी दूसरी बड़ी विशेषता है। वह राजनैतिक परिस्थितियों को समझने और उनमें सही समय पर सही कदम उठाने में माहिर हैं। चाहे वह अपनी पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों को एकजुट करना हो या विपक्ष के साथ संतुलन बनाना, उन्होंने हर बार अपनी कूटनीतिक क्षमता का परिचय दिया है। उनके इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण उत्तराखंड में विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक समूहों के बीच संतुलन बनाए रखने की उनकी क्षमता है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां सामाजिक और भौगोलिक विविधता एक बड़ी चुनौती है, उन्होंने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया है। उनकी नीतियां और निर्णय इस बात को दर्शाते हैं कि वह न केवल विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं, बल्कि सामाजिक समरसता को भी प्राथमिकता देते हैं।असहमति का स्वागत, विवादों से दूरी उनकी एक और खासियत है कि वह असहमति को नकारात्मक रूप में नहीं लेते। वह इसे एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं। उनके कार्यकाल में कई बार उनकी नीतियों और निर्णयों पर सवाल उठे, लेकिन उन्होंने हमेशा इन सवालों का जवाब तर्क और संयम के साथ दिया। उनके मुंह से कभी भी ऐसा बयान नहीं निकला, जो विवाद का कारण बने। यह उनकी परिपक्वता और दूरदर्शिता को दर्शाता है। उनका यह दृष्टिकोण न केवल उनके सहयोगियों बल्कि विपक्ष के नेताओं के बीच भी सम्मान का कारण बना है। उन्होंने हमेशा विरोधियों को सहयोगी के रूप में देखा, न कि शत्रु के रूप में। इस सोच ने उन्हें राजनैतिक स्थिरता प्रदान की है।
पुष्कर सिंह धामी के अब तक के कार्यकाल में कई बार ऐसी परिस्थितियां आईं, जब राजनैतिक अस्थिरता की आशंका थी। चाहे वह उनकी पार्टी के भीतर की आंतरिक खींचतान हो या विपक्ष की ओर से उठाए गए मुद्दे, उन्होंने हर बार स्थिति को संभाला और अपनी सरकार को स्थिर रखा। उनकी यह क्षमता उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत है। उदाहरण के लिए, जब 2022 में उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के बाद धामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी दोबारा सौंपी गई, तब कई लोगों को आश्चर्य हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने अपनी विधानसभा सीट खो दी थी। लेकिन उनकी लोकप्रियता, कार्यकुशलता और पार्टी के भीतर उनके मजबूत आधार ने यह सुनिश्चित किया कि वह मुख्यमंत्री बने रहें। यह उनके राजनैतिक कौशल और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का प्रमाण है।
उनके नेतृत्व में उत्तराखंड ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। चाहे वह सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना हो या पर्यटन और तीर्थाटन को प्रोत्साहित करना, उन्होंने हर क्षेत्र में सक्रियता दिखाई है। उनकी सरकार ने चारधाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए कई कदम उठाए, जिससे न केवल तीर्थयात्रियों को सुविधा हुई, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिला। इसके अलावा, उन्होंने युवाओं और महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, जिनमें रोजगार सृजन और स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली योजनाएं शामिल हैं। उनकी सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई सुधार किए, जिससे उत्तराखंड के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकीं।
धामी का नेतृत्व केवल राजनैतिक स्थिरता तक सीमित नहीं है। उन्होंने सामाजिक समरसता और समावेशी विकास को भी प्राथमिकता दी है। उत्तराखंड में विभिन्न समुदायों और जातियों के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। उनकी सरकार ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जिससे सामाजिक समावेश को बढ़ावा मिला।
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