NTI (मोहन भुलानी ): “फोन फार्मिंग” नाम सुनते ही शायद आपके दिमाग में यह ख्याल आए कि कहीं खेतों में फोन उगाए जाते हैं और फिर उन्हें बेचा जाता है। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। फोन फार्मिंग का मतलब इसके ठीक उल्टा है। यहाँ फोन नहीं उगते, बल्कि खरीदे जाते हैं, लाए जाते हैं और फिर उनका इस्तेमाल कुछ ऐसा करने के लिए किया जाता है जो आज की डिजिटल दुनिया में बहुत से लोगों की जरूरत बन गया है—फर्जी व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स पैदा करना। यह एक ऐसा धंधा है जिसमें तकनीक का इस्तेमाल करके लोग ऑनलाइन लोकप्रियता बेचते हैं।
फोन फार्मिंग का मतलब फोन उगाना नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में फर्जी सफलता की फसल काटना है। फोन खरीदकर, उन्हें जोड़कर और फेक एंगेजमेंट बेचकर ये लोग एक अजीब लेकिन मुनाफे वाला धंधा चला रहे हैं। यह एक चतुराई भरा बिजनेस है या गलत रास्ता, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन एक बात साफ है—सोशल मीडिया के इस दौर में लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स की चाहत ने एक ऐसा बाज़ार बना दिया है, जहाँ फोन भी “खेती” का हिस्सा बन गए हैं।
फोन फार्मिंग कैसे काम करती है?
फोन फार्मिंग में सबसे पहले ढेर सारे सस्ते स्मार्टफोन खरीदे जाते हैं। ये फोन ज्यादातर पुराने या कम कीमत वाले मॉडल होते हैं। इनका इस्तेमाल कॉल करने या मैसेज भेजने के लिए नहीं होता। इन फोनों की बैटरी निकाल दी जाती है और फिर इन्हें यूएसबी हब या किसी खास सेटअप के जरिए एक ही कंप्यूटर से जोड़ दिया जाता है। इससे एक ऐसा नेटवर्क तैयार हो जाता है जिसमें कई फोन एक साथ काम कर सकते हैं।
इसके बाद इन फोनों में कई सोशल मीडिया अकाउंट्स बनाए जाते हैं, जो अक्सर नकली पहचान या ऑटोमेशन टूल्स की मदद से तैयार होते हैं। फिर ये फोन एक सिस्टम के तहत काम शुरू करते हैं—पोस्ट लाइक करना, वीडियो देखना, अकाउंट फॉलो करना या कमेंट्स डालना। आसान शब्दों में कहें तो फोन फार्मिंग एक तरह का “बॉट ” है, जो असली इंसानों की तरह ऑनलाइन गतिविधियाँ करता है।
कौन लेता है फोन फार्मिंग की सेवाएँ?
फोन फार्मिंग की सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोग अलग-अलग तरह के होते हैं। कुछ नए इन्फ्लुएंसर्स जो अपनी ऑनलाइन मौजूदगी बढ़ाना चाहते हैं, तो कुछ बिजनेस जो अपने सोशल मीडिया नंबरों को चमकाना चाहते हैं। यहाँ तक कि कई कंटेंट क्रिएटर्स और मार्केटर्स भी इसकी मदद लेते हैं ताकि उनकी लोकप्रियता का ढोंग बन सके, जिससे असली लोग भी उनकी ओर आकर्षित हों। इसके बदले में फोन फार्म चलाने वाले कुछ पैसे लेते हैं। अगर कोई नियमित ग्राहक है, जैसे कि “बचाब” जो इनका रोज़ का कस्टमर हो, तो उसे थोड़ा डिस्काउंट भी मिल जाता है।
फोन फार्मिंग का अर्थशास्त्र
फोन फार्मिंग सिर्फ तकनीकी खेल नहीं, बल्कि एक बिजनेस मॉडल है। इसमें शुरुआती खर्चा फोन खरीदने, हार्डवेयर सेट करने और इंटरनेट कनेक्शन जोड़ने में लगता है। इसके बाद यह लोग अपने ग्राहकों से फर्जी लाइक्स, व्यूज या फॉलोअर्स के लिए पैसे वसूलते हैं। कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि काम कितना बड़ा है—सिर्फ लाइक्स चाहिए या फिर फॉलोअर्स की लंबी लाइन।
जो लोग इसे चलाते हैं, उनके लिए यह कम खर्च वाला धंधा है। फोनों में सिम कार्ड की जरूरत नहीं पड़ती और एक कंप्यूटर से सैकड़ों डिवाइस को कंट्रोल किया जा सकता है। इसकी वजह से यह आसानी से बड़ा हो सकता है और मुनाफा कमा सकता है।
नैतिकता और कानून का सवाल
फोन फार्मिंग भले ही एक चालाक तरकीब लगे, लेकिन यह विवादों से खाली नहीं है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स नकली अकाउंट्स और बॉट्स को पकड़ने की कोशिश में रहते हैं। ऐसी सेवाओं का इस्तेमाल करना या बेचना इनके नियमों के खिलाफ है, जिससे अकाउंट ब्लॉक होने का खतरा रहता है।
इसके अलावा एक नैतिक सवाल भी है—क्या फर्जी लोकप्रियता दिखाकर लोगों को धोखा देना ठीक है? कुछ के लिए यह मार्केटिंग का शॉर्टकट है, तो कुछ के लिए यह ऑनलाइन दुनिया की सच्चाई को कमज़ोर करता है। जो भी हो, फोन फार्मिंग यह दिखाती है कि डिजिटल दुनिया में लोग लोकप्रियता के लिए कितना कुछ कर सकते हैं।

