Thursday, February 19, 2026
HomeNewsवन विभाग की 95 बीघा से अधिक भूमि पर माफिया ने की...

वन विभाग की 95 बीघा से अधिक भूमि पर माफिया ने की प्लॉटिंग

फर्जीवाड़ा: बदकोट रेंज में 95 बीघा जंगल भूमि पर अतिक्रमण, ₹10 के स्टांप पेपर पर हो रही बिक्री

देहरादून: उत्तराखंड के दून डिवीजन के बदकोट रेंज (जिसे कभी-कभी बार्कोट रेंज के रूप में भी जाना जाता है) में वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण का मामला सामने आया है। करीब 95 बीघा से अधिक जंगल भूमि पर प्लॉटिंग कर दी गई है, पक्की सड़कें बना ली गई हैं और मकान तक खड़े हो चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि यह सब ₹10 के स्टांप पेपर पर बेचा जा रहा है, जबकि वन विभाग ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। रिटायर्ड सर्वेयर योगेश इस्टवाल ने वन मुख्यालय से लेकर केंद्रीय वन मंत्रालय तक शिकायत की है, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। यह मामला उत्तराखंड में बढ़ते वन अतिक्रमण की समस्या को उजागर करता है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में राज्य सरकार की लापरवाही पर सख्त टिप्पणी की है।

अतिक्रमण की पूरी तस्वीर

बदकोट रेंज, जो दून डिवीजन के अंतर्गत चक जोगीवाला और आसपास के क्षेत्रों में फैली हुई है, न्यू रिजर्व फॉरेस्ट के रूप में दर्ज है। यहां की भूमि लगातार अतिक्रमित हो रही है। कुछ भूमाफिया ने प्लॉटिंग की, पक्की सड़कें बनाईं और प्लॉट बेच दिए। गूगल अर्थ के पुराने और नए मैप में भी अतिक्रमण साफ दिख रहा है – प्लॉटिंग, सड़कें और मकान सब स्पष्ट। कुछ प्लॉटिंग तोड़ी गई, लेकिन अधिकांश पर सालों से पक्के मकान बने हुए हैं, जिन्हें आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता। सड़कों पर आवाजाही जारी है, फिर भी विभाग चुप।

उत्तराखंड में वन अतिक्रमण कोई नई समस्या नहीं है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पिछले 20 वर्षों में 50,000 हेक्टेयर जंगल भूमि विकास गतिविधियों के कारण खो चुकी है। देहरादून जिले में ही 21,303 हेक्टेयर जंगल गायब हो चुका है। हरिद्वार में 6,826 हेक्टेयर, जबकि अन्य जिलों में भी यही स्थिति है। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में रिशिकेश क्षेत्र में 2,866 एकड़ अधिसूचित जंगल भूमि के अतिक्रमण पर स्वत: संज्ञान लिया था, जहां 594 एकड़ 1984 में वन विभाग को सौंपा गया था, लेकिन 2001 में फिर से अवैध कब्जा हो गया। कोर्ट ने राज्य अधिकारियों की मिलीभगत और लापरवाही पर सवाल उठाया, और कोई नई निर्माण गतिविधि न करने का आदेश दिया।

मसूरी फॉरेस्ट डिवीजन में 7,375 जंगल सीमा पिलर गायब होने की रिपोर्ट आई है, जो अतिक्रमण को बढ़ावा दे रही है। उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), केंद्र सरकार और अन्य से जवाब मांगा है। पर्यावरण कार्यकर्ता नरेश चौधरी की याचिका में कहा गया है कि रियल एस्टेट गतिविधियों के कारण जंगल सीमाएं गायब हो रही हैं, और रिसॉर्ट्स तथा व्यावसायिक विकास के लिए अतिक्रमण हो रहा है।

रिटायर्ड सर्वेयर की शिकायत 

वन विभाग के रिटायर्ड सर्वेयर योगेश इस्टवाल ने इस मामले को उजागर किया। उन्होंने बताया कि यह भूमि आरक्षित वन क्षेत्र है, जिसकी खरीद-फरोख्त कानूनी रूप से संभव नहीं। फिर भी लोग ₹10 के स्टांप पेपर पर प्लॉट बेच रहे हैं। विभाग ने एक बोर्ड लगा रखा है जिसमें लिखा है कि यह संरक्षित वन भूमि है और खरीद-फरोख्त नहीं हो सकती, लेकिन प्लॉटिंग और बिक्री जारी है। शिकायत पर वन मुख्यालय से केंद्रीय स्तर तक पत्राचार हुआ, नोटिस जारी हुए, लेकिन जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं। विभाग का कहना है कि विधिवत प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाएगी, लेकिन अब तक एक भी अतिक्रमण हटाया नहीं गया।

उत्तराखंड वन विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 10,649 हेक्टेयर जंगल भूमि अतिक्रमित है, जो हिमालयी राज्यों में तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। अप्रैल 2023 तक, 11,900 हेक्टेयर जंगल अवैध कब्जे में था, जिसमें कोरबेट और राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में राज्य सरकार से पूछा कि 2000 से 2023 तक जंगल भूमि की सुरक्षा के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार थे। कोर्ट ने कहा कि 23 वर्षों में राज्य जागा ही नहीं, और अतिक्रमण अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ।

हैरानी भरी स्थिति और कानूनी पहलू

वन विभाग के अधिकारी मानते हैं कि अतिक्रमण साफ दिख रहा है, लेकिन कार्रवाई में देरी हो रही है। कुछ मामलों में राजनीतिक दबाव या स्थानीय प्रभाव का आरोप भी लग रहा है। विभाग ने कहा कि अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस सहयोग और कानूनी प्रक्रिया जरूरी है, जिससे समय लगता है। उत्तराखंड में इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 और राज्य वन कानूनों के तहत जंगल भूमि की सुरक्षा की जाती है, लेकिन एफएसआई की रिपोर्ट बताती है कि 25 राज्यों में जंगल अतिक्रमण हो रहा है, और उत्तराखंड में 538 अवैध कब्जे पहचाने गए हैं।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 2025 में देहरादून में 104 वर्ग किलोमीटर जंगल पर कब्जे और हजारों पेड़ कटने पर संज्ञान लिया। रिपोर्ट में कहा गया कि 3.4870 हेक्टेयर जंगल अतिक्रमित है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो हजारों बीघा जंगल भूमि निजी प्लॉट में बदल सकती है, जिससे पर्यावरण और जैव विविधता को गहरा नुकसान होगा।

जंगल अतिक्रमण का खतरा

उत्तराखंड के जंगलों पर अतिक्रमण का पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर है। राज्य में 71.05% क्षेत्र जंगल है, लेकिन अतिक्रमण से जैव विविधता घट रही है। वन आग, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। 2024 में 11,256 वन आग की घटनाएं हुईं, जिसमें 3,238 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ। अतिक्रमण से जंगल खंडित हो रहे हैं, जो बाढ़ क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाता है, भूजल रिचार्ज कम करता है और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ाता है।

लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया के अनुसार, राज्य के 8 जिले भूस्खलन के लिए अत्यधिक संवेदनशील हैं। अतिक्रमण से जंगल कटाव बढ़ता है, जो भूस्खलन को आमंत्रित करता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जंगल अतिक्रमण से जलवायु परिवर्तन तेज होता है, और ग्लेशियर पिघलने का खतरा बढ़ता है। पिछले 20 वर्षों में 23 लाख हेक्टेयर जंगल गायब हुए, जो बैंगलोर के 10 गुना आकार के बराबर है।

अतिक्रमण से वन्यजीवों का निवास प्रभावित होता है। टाइगर रिजर्व में अवैध कब्जे से जानवरों की प्रजनन क्षमता घट रही है। गैर-देशी पौधे जैसे लैंटाना कैमारा और यूकेलिप्टस से जंगल संरचना बदल रही है, जो आग को बढ़ावा देती है। अवैध खनन और रेत खनन से नदियों के फ्लड प्लेन प्रभावित हो रहे हैं, जो देहरादून जैसे शहरों को खतरे में डालता है।

समाधान और आगे की राह

उत्तराखंड सरकार ने 2021 से 6,500 एकड़ अतिक्रमित भूमि वापस ली है, जिसमें 455 हेक्टेयर जंगल शामिल है। फरवरी 2024 में भूमि खरीद पर सख्त नियम लागू किए गए। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि डिजिटल इनोवेशन जैसे जीपीएस मैपिंग और ड्रोन सर्वे से अतिक्रमण रोका जा सकता है। वन पंचायतों को मजबूत करने की जरूरत है, जो जंगलों की सुरक्षा के लिए बनाई गई थीं, लेकिन अब कमजोर हो रही हैं।

RELATED ARTICLES