ऋषिकेश। गंगा के पवित्र तट पर बसे मुनिकीरेती का प्रसिद्ध ओशो गंगा धाम (जानकी कुटिया) अब गंभीर कानूनी संकट में फंस गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में पेश सरकारी विभागों की संयुक्त जांच रिपोर्ट ने आश्रम पर अवैध वन भूमि कब्जे और पर्यावरण-अग्नि-खाद्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी का खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के बाद प्रशासनिक कार्रवाई की तैयारी तेज हो गई है।
नरेंद्र नगर के संभागीय वन अधिकारी दिगंत नायक ने ट्रिब्यूनल में हलफनामा दाखिल कर आश्रम की सच्चाई उजागर की। रिपोर्ट के मुताबिक, आश्रम को पहले केवल 0.289 हेक्टेयर भूमि का पट्टा मिला था। लेकिन मौके पर हुई संयुक्त पैमाइश में कुल घेराव 0.4146 हेक्टेयर निकला। इसमें से 0.257 हेक्टेयर यानी करीब 2570 वर्ग मीटर वन भूमि पर अवैध कब्जा पाया गया। वन विभाग ने तुरंत भारतीय वन अधिनियम की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया।
यह खुलासा तब हुआ जब एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विभिन्न विभागों को संयुक्त निरीक्षण का आदेश दिया। राजस्व, वन और अन्य एजेंसियों की टीम ने साइट पर पहुंचकर माप-जोख लिया। परिणाम चौंकाने वाले थे। आश्रम की सीमाएं तय लीज क्षेत्र से काफी आगे निकल चुकी थीं। वन भूमि पर बने निर्माण अब कानूनी दायरे से बाहर माने जा रहे हैं।
मामले में एक और बड़ा पेच सामने आया। पट्टा मूल रूप से स्वामी विवेकानंद दास के नाम पर जारी किया गया था। उनकी 2011 में मृत्यु हो चुकी है। वन विभाग ने ट्रिब्यूनल को बताया कि सरकारी लीज नीति के तहत यह पट्टा अहस्तांतरणीय था। इसका मतलब है कि मूल धारक की मौत के बाद इसे किसी ट्रस्ट या अन्य व्यक्ति को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। विभाग अब पूरी लीज को ही अवैध मान रहा है। इस वजह से आश्रम प्रबंधन बैकफुट पर आ गया है।
पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, खाद्य सुरक्षा विभाग और दमकल विभाग की टीम ने बीते साल 4 अक्टूबर को आश्रम का सघन निरीक्षण किया। स्वामी प्रेम चैतन्य जैसे अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद थे। जांच में पाया गया कि आश्रम व्यावसायिक गतिविधियों को आश्रम सीमा से बाहर ले जा रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहा। फायर फाइटिंग सिस्टम अपर्याप्त है। किचन हाइजीन और खाद्य सुरक्षा मानक भी पूरी तरह धरे नहीं जा रहे।
एनजीटी ने इस रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर ले लिया है। ट्रिब्यूनल ने मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में तय की है। सूत्रों का कहना है कि अवैध निर्माण पर हटाने का आदेश जल्द आ सकता है। उत्तराखंड में वन भूमि संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी दोनों ही सख्त रुख अपनाए हुए हैं। ऐसे में ओशो गंगा धाम जैसे लोकप्रिय आश्रम पर भी कार्रवाई टालना मुश्किल दिख रहा है।
स्थानीय प्रशासन अब इस मामले पर नजर रखे हुए है। वन विभाग ने स्पष्ट किया कि वन भूमि पर कोई भी निर्माण या कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि रिपोर्ट में बताए गए उल्लंघन साबित होते हैं तो न सिर्फ अवैध संरचनाएं हटाई जाएंगी बल्कि पर्यावरण क्षति की भरपाई भी आश्रम प्रबंधन से वसूली जा सकती है।
ओशो गंगा धाम सदियों से ध्यान, योग और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। गंगा किनारे बसा यह स्थान देश-विदेश के साधकों को आकर्षित करता है। लेकिन अब कानूनी उलझनों ने इसकी छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आश्रम प्रबंधन अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।
ट्रिब्यूनल के कड़े रुख ने पूरे क्षेत्र में चर्चा छेड़ दी है। पर्यावरण कार्यकर्ता इसे सकारात्मक कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में वन भूमि की सुरक्षा जरूरी है। एक तरफ जहां आध्यात्मिक केंद्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं नियमों की अनदेखी पर सख्ती भी जरूरी है।
मामले की जांच अभी जारी है। अप्रैल में होने वाली सुनवाई में ट्रिब्यूनल अंतिम फैसला सुना सकता है। यदि अवैध कब्जा साबित हुआ तो प्रशासनिक हथौड़ा चलना तय माना जा रहा है। ओशो गंगा धाम की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं और अब कानूनी प्रक्रिया अपना रास्ता तय करेगी।

