देहरादून: सीएजी रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर चर्चा में रहने वाला कैंपा फंड इस बार सरकारी सिस्टम की सुस्ती का शिकार हो गया है। वन विभाग ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक केवल 36.79 प्रतिशत बजट ही खर्च किया है। अब इस बजट को उपयोग करने के लिए विभाग के पास मात्र 3 महीने का समय शेष है। यानी जिस बजट को 9 महीनों में 40 प्रतिशत भी खर्च नहीं किया जा सका, उसे अब 3 महीनों में 60 प्रतिशत से अधिक खर्च करना होगा। मौजूदा स्थिति में यह असंभव-सा लग रहा है।
उत्तराखंड का लगभग 70 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र से ढका हुआ है, इसलिए वन विभाग की भूमिका यहां बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। वृक्षारोपण, वन्यजीव संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना, जंगलों में आधारभूत ढांचे का विकास और ईको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों के लिए राज्य को केंद्र सरकार से हर साल मोटा बजट मिलता है। लेकिन इस बजट का कितना प्रभावी उपयोग हो रहा है, इसकी हकीकत अब कैंपा फंड (CAMPA) के ताजा आंकड़ों से उजागर हुई है। CAMPA यानी Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority, जिसके तहत वन भूमि के संरक्षण और विकास से जुड़े कार्यों के लिए राज्यों को विशेष फंड जारी किया जाता है। उद्देश्य स्पष्ट है कि जंगलों से जुड़े जरूरी कार्यों में धन की कमी न आए। लेकिन उत्तराखंड में इस महत्वपूर्ण फंड के उपयोग पर सरकारी सिस्टम की सुस्ती भारी पड़ रही है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 के 9 महीने गुजर जाने के बाद भी वन विभाग कैंपा फंड का 40 प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाया है। आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष उत्तराखंड को कैंपा के तहत कुल 25,336.69 लाख रुपये यानी करीब 253 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। इसके मुकाबले अब तक मात्र 9,321.43 लाख रुपये यानी करीब 93 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके हैं। इस प्रकार विभाग केवल 36.79 प्रतिशत बजट का उपयोग कर पाया है।
यह स्थिति तब है जब वित्तीय वर्ष के मात्र तीन महीने बाकी हैं और विभाग को शेष 60 प्रतिशत से अधिक बजट को इसी अवधि में खर्च करना है। जिस बजट को 9 महीनों में 40 प्रतिशत तक नहीं खर्च किया जा सका, उसे तीन महीनों में पूरा करना मौजूदा हालात में मुश्किल नजर आ रहा है।
कैंपा फंड के इस कमजोर प्रदर्शन का खुलासा तब हुआ जब विभागीय मंत्री सुबोध उनियाल ने बजट खर्च की समीक्षा की। समीक्षा के बाद अधिकारियों को बजट खर्च में तेजी लाने के निर्देश दिए गए, लेकिन मंत्री ने अपने विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली का बचाव भी किया। क्षेत्रवार आंकड़े विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं। गढ़वाल क्षेत्र में कैंपा के तहत कुल 135 करोड़ रुपये जारी किए गए, लेकिन इनमें से केवल 53 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके, यानी 39.13 प्रतिशत। वहीं कुमाऊं क्षेत्र में 74 करोड़ रुपये जारी हुए, जिनमें से सिर्फ 25 करोड़ रुपये खर्च किए गए, यहां प्रतिशत 34.24 रहा।
वन्यजीव क्षेत्रों के लिए 31 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन खर्च हुए केवल 12 करोड़ रुपये, यानी करीब 41 प्रतिशत। रिसर्च मद में स्थिति और खराब है, जहां 3 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 70 लाख रुपये खर्च हुए, जो मात्र 22 प्रतिशत है। अन्य प्रशासनिक इकाइयों को मिले करीब 9 करोड़ रुपये में से सिर्फ 1 करोड़ 24 लाख रुपये खर्च हुए, यानी 14 प्रतिशत। वन्यजीव जोन में सबसे खराब प्रदर्शन कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का रहा, जहां 7 करोड़ 13 लाख रुपये जारी किए गए थे, लेकिन खर्च हुए सिर्फ 1 करोड़ 30 लाख रुपये, यानी 18.32 प्रतिशत। इसके मुकाबले राजाजी टाइगर रिजर्व बेहतर रहा, जहां 58.29 प्रतिशत बजट खर्च किया गया।
सर्कल स्तर पर गढ़वाल में यमुना सर्कल सबसे फिसड्डी साबित हुआ, जहां बजट का केवल 29.77 प्रतिशत खर्च हुआ। कुमाऊं में नॉर्थ कुमाऊं सर्कल का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, जहां 33.8 प्रतिशत तक सीमित रहा।
इस पूरे मामले पर वन विभाग के प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) रंजन कुमार मिश्रा ने कहा, “विभाग बजट खर्च को लेकर गंभीर है। अभी तीन महीने का समय बाकी है। हम बजट को खर्च कर लेंगे।” हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि 9 महीनों में जो बजट खर्च नहीं हो सका, वह तीन महीनों में कैसे पूरा होगा, तो इसका कोई ठोस जवाब नहीं मिला।
असफलता मानने के बजाय विभाग सिस्टम की जटिलताओं का हवाला दे रहा है, जिससे भविष्य में समयबद्ध बजट उपयोग पर अधिकारियों पर दबाव बनने की संभावना कम लगती है। बड़ा सवाल यह है कि यदि केंद्र से मिला यह महत्वपूर्ण कैंपा फंड लैप्स हो जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? यह पहली बार नहीं है जब वन विभाग कैंपा फंड का बजट खर्च करने में नाकाम रहा हो। पिछली वित्तीय वर्ष 2024-25 में केंद्र से मिले करीब 400 करोड़ के बजट में से कम से कम 25 से 30 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो सके थे। इंटरेस्ट मिलाकर यह रकम और अधिक थी। मौजूदा वर्ष में स्थिति और खराब दिख रही है, और 100 प्रतिशत खर्च मुश्किल लग रहा है।
केंद्र से मिले इस बजट को यदि वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक खर्च नहीं किया जाता, तो यह लैप्स हो जाता है और राज्य को पूरा लाभ नहीं मिल पाता। सरकारी सिस्टम औपचारिकताओं में इतना समय व्यतीत कर देता है कि जरूरी कार्यों के लिए समय पर बजट खर्च नहीं हो पाता। इससे भी बड़ी बात यह है कि बजट खर्च न होने पर अगले वर्ष के लिए केंद्र को भेजे जाने वाले प्रस्ताव में कटौती की आशंका रहती है, क्योंकि केंद्र पिछले प्रदर्शन और बजट उपयोग को ध्यान में रखता है।

