Tuesday, January 13, 2026
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मुख्यमंत्री धामी का ‘एक जेल-एक प्रोडक्ट’ मॉडल देगा बंदियों को नई जिंदगी

 देहरादून: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को सचिवालय में जेल विकास बोर्ड की बैठक में एक प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य की सभी जेलों को आत्मनिर्भर और उत्पादक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। ‘एक जेल-एक प्रोडक्ट’ की अवधारणा को लागू करने के निर्देश देते हुए उन्होंने कारागारों को न केवल सुधारगृह, बल्कि कौशल विकास के केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया। यह पहल न केवल बंदियों के पुनर्वास को मजबूत करेगी, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगी। सीएम धामी ने स्पष्ट कहा, “जेलों का विकास राज्य का अपना अलग मॉडल होगा, जहां बंदी न केवल सजा भुगतें, बल्कि समाज के उपयोगी सदस्य बनकर लौटें।”

बैठक में सीएम ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि कारागारों में निरूद्ध बंदियों के कौशल विकास के लिए नियमित कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। आईटीआई (इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) के माध्यम से जेलों में विभिन्न ट्रेडों—जैसे इलेक्ट्रीशियन, फिटर, बेकरी और कृषि—के प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। यह कदम राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन (एनएसडीएम) के अनुरूप है, जहां 2025 तक 40 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है। उत्तराखंड में वर्तमान में 14 जिला कारागार, 3 उप कारागार और 1 केंद्रीय कारागार हैं, जहां लगभग 5,000 बंदी रहते हैं। कौशल प्रशिक्षण से इनमें से 70% से अधिक को मुख्यधारा में लौटाने की क्षमता है, जैसा कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 रिपोर्ट में उल्लेखित है।

सीएम ने जेलों में निर्मित उत्पादों के सरकारी कार्यालयों में उपयोग को अनिवार्य करने का आदेश दिया। इससे न केवल स्थानीय उत्पादों को बाजार मिलेगा, बल्कि बंदियों को आर्थिक स्वावलंबन का अवसर भी। उदाहरणस्वरूप, बैठक में जानकारी दी गई कि जिला कारागार हरिद्वार, अल्मोड़ा, केंद्रीय कारागार सितारगंज और उप कारागार हल्द्वानी में स्थापित बेकरी यूनिट्स से वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 12 लाख रुपये की आय अर्जित हुई। इसी तरह, सितारगंज खुली जेल में गौशाला की स्थापना से 10 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। ये आंकड़े साबित करते हैं कि जेल उत्पादन आर्थिक रूप से व्यवहार्य हैं—एक अध्ययन के अनुसार, ऐसे मॉडल से बंदियों की पुनरावृत्ति दर (रिलैप्स) 25% तक कम हो सकती है।

बैठक में कई ठोस निर्णय लिए गए। केंद्रीय कारागार सितारगंज, जिला कारागार अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, उप कारागार हल्द्वानी और रुड़की में लॉन्ड्री मशीनों की स्थापना को मंजूरी दी गई। जिला कारागार देहरादून और हरिद्वार में पहले से चालू इन मशीनों से उत्कृष्ट परिणाम मिले हैं—न केवल स्वच्छता स्तर बढ़ा, बल्कि बंदियों को नई स्किल भी मिली। इसके अलावा, प्रदेश की खुली जेल सितारगंज में कच्ची घानी सरसों तेल संयंत्र की स्थापना पर सहमति बनी। सितारगंज और हरिद्वार जेलों में मशरूम फार्मिंग को भी हरी झंडी मिली, जो जैविक कृषि को बढ़ावा देगी। उत्तराखंड की जैव विविधता को देखते हुए, मशरूम उत्पादन से सालाना 5-7 लाख रुपये की अतिरिक्त आय संभव है, जैसा कि कृषि विभाग के पायलट प्रोजेक्ट में देखा गया।

स्वास्थ्य और कल्याण पर विशेष जोर देते हुए सीएम ने कारागारों में चिकित्सकों की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। अधिकारियों को समय-समय पर जेलों में भोजन व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने को कहा गया। यह कदम मानवाधिकारों के अनुरूप है—एनसीआरबी डेटा के अनुसार, 2024 में जेल स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार से बीमारियों की दर 15% घटी। सीएम धामी ने कहा, “बंदी भी इंसान हैं। उनकी क्षमता को निखारना हमारा दायित्व है। यह मॉडल न केवल जेलों को बदलेगा, बल्कि समाज को मजबूत करेगा।”

यह पहल उत्तराखंड को जेल सुधार के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाने की दिशा में है। केंद्र सरकार की ‘एक जेल-एक उत्पाद’ योजना से प्रेरित, राज्य का यह मॉडल स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप है। इससे बंदियों के परिवारों को आर्थिक सहायता मिलेगी, पुनर्वास दर बढ़ेगी और राज्य की जीडीपी में योगदान होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयासों से अपराध दर में 10-15% की कमी आ सकती है। सीएम धामी की यह दृष्टि साबित करती है कि सुशासन केवल विकास नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना भी है। आने वाले दिनों में उत्तराखंड की जेलें उत्पादकता के प्रतीक बनेंगी, जहां सजा के साथ दूसरा मौका मिलेगा।

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