Sunday, February 8, 2026
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देहरादून में नवनिर्मित कैंसर हॉस्पिटल की बिल्डिंग को संचालन का इंतज़ार

देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कैंसर मरीजों के लिए लंबे समय से इंतजार की एक बड़ी सौगात बनकर तैयार हर्रावाला सुपर स्पेशियलिटी कैंसर अस्पताल अभी तक संचालन में नहीं आ सका है। 2024 में निर्माण कार्य पूरा होने के बावजूद, अस्पताल की इमारत दो साल से अधिक समय से खाली पड़ी है। पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर संचालन के लिए कई बार टेंडर जारी किए गए, लेकिन कोई भी कंपनी या निवेशक आगे नहीं आया। इससे कैंसर पीड़ितों को इलाज के लिए दिल्ली, चंडीगढ़ या अन्य राज्यों के बड़े अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है, जहां महंगे इलाज और यात्रा की अतिरिक्त परेशानी झेलनी पड़ती है।

यह अस्पताल राज्य का पहला सरकारी सुपर स्पेशियलिटी कैंसर अस्पताल है, जिसकी योजना लगभग 6-7 वर्ष पूर्व तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में शुरू हुई थी। 2020 में इसकी औपचारिक शुरुआत हुई, जिसमें 300 बेड की क्षमता वाला यह अस्पताल केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त परियोजना के तहत बनाया गया। कुल लागत करीब 106 करोड़ रुपये बताई गई है। निर्माण के लिए 15 बीघा जमीन ओबरॉय परिवार ने दान में दी थी। अस्पताल की शुरुआत 100 बेड से करने की योजना थी, जो धीरे-धीरे 300 बेड तक बढ़ाई जानी थी। पहले चरण में 164 करोड़ रुपये की किश्त जारी की गई थी।

हालांकि निर्माण कार्य 2024 में पूरा हो गया, लेकिन संचालन का मुद्दा अब तक अनसुलझा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, विभाग के पास कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टरों और पर्याप्त स्टाफ की कमी है। ऐसे में पीपीपी मोड ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प बचा है, जिसमें निजी कंपनी अस्पताल को इक्विप, ऑपरेट, मेंटेन और ट्रांसफर (EOMT) मोड में चला सकती है। कई दौर में टेंडर आमंत्रित किए गए, लेकिन रुचि नहीं दिखी। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि 2025 की शुरुआत में नए साल की सौगात के रूप में अस्पताल खुलने की उम्मीद जताई गई थी, लेकिन वह पूरी नहीं हुई। जून 2025 तक की खबरों में अस्पताल बनकर तैयार होने के 12 महीने बीत चुके थे, फिर भी संचालक नहीं मिला। जुलाई 2025 में कैबिनेट स्तर पर फैसला होने की बात कही गई, लेकिन जनवरी 2026 तक कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है।

एक प्रमुख वजह पार्किंग की कमी बताई जा रही है। अस्पताल की पांच मंजिला इमारत में बेसमेंट पार्किंग का प्रावधान ही नहीं रखा गया था, जिससे प्लानिंग पर सवाल उठे। बाद में अस्पताल के बाहर अलग से जमीन खरीदकर 300 वाहनों की पार्किंग बनाई गई, जो अब तैयार है। इसके बावजूद कंपनियां संचालन से पीछे हट रही हैं। संभवतः कम रिटर्न, उच्च परिचालन लागत या अन्य व्यावसायिक कारणों से कोई निवेशक तैयार नहीं हो रहा। विभाग का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया फिर से शुरू की जा रही है।

महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ. सुनीता टम्टा ने विभिन्न अस्पतालों के निरीक्षण में सक्रियता दिखाई है, लेकिन हर्रावाला कैंसर अस्पताल के संचालन पर उनकी ओर से कोई स्पष्ट बयान या अपडेट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। स्वास्थ्य विभाग का प्रयास है कि जल्द से जल्द अस्पताल चालू हो, ताकि कैंसर मरीजों को राज्य में ही उन्नत इलाज मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पीपीपी मोड सफल रहा, तो आयुष्मान भारत योजना के तहत कई बेड मुफ्त या सब्सिडाइज्ड इलाज के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं।

वर्तमान में देहरादून के कैंसर मरीजों को AIIMS ऋषिकेश, दिल्ली के टाटा मेमोरियल या अन्य निजी अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। यात्रा, ठहरने और महंगे उपचार से परिवार आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। राज्य सरकार की स्वास्थ्य नीतियों में सुधार हो रहा है, लेकिन इस अस्पताल के संचालन में देरी से मरीजों की पीड़ा बढ़ रही है। विशेषज्ञों और स्थानीय निवासियों की मांग है कि सरकार तत्काल कोई वैकल्पिक व्यवस्था जैसे अस्थायी संचालन या विभागीय स्तर पर शुरूआत करे, ताकि इमारत खाली न रहे।

अगर टेंडर प्रक्रिया सफल रही, तो यह अस्पताल उत्तराखंड के कैंसर रोगियों के लिए वरदान साबित होगा। इसमें कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, सर्जरी और अन्य उन्नत सुविधाएं उपलब्ध होंगी। फिलहाल, मरीजों को इंतजार जारी है। उम्मीद है कि 2026 में यह सपना साकार होगा और देहरादूनवासियों को कैंसर के इलाज के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

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