Sunday, February 8, 2026
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जन सहभागिता के माध्यम से तैयार होंगे नए मिश्रित जंगल

रानीखेत (अल्मोड़ा): देवभूमि उत्तराखंड में हर साल आग और अन्य कारणों से जंगलों की हरियाली नष्ट होती है, लेकिन अब वन विभाग एक अभिनव प्रयोग के जरिए इसे स्थायी रूप से रोकने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। राज्य में ‘हरेला वन’ के नाम से नए मिश्रित जंगल विकसित किए जा रहे हैं, जो जन सहभागिता से तैयार होंगे और पांच साल तक विशेष देखभाल के साथ पनपेंगे। यह पहली बार है जब वन भूमि पर इस तरह का मॉडल तैयार किया जा रहा है, जिसके लिए पंचवर्षीय योजना बनाई गई है।

उत्तराखंड वन विभाग के अनुसार, राज्य में लगभग 900 अनुभागों (सेक्शन) में ‘हरेला वन’ विकसित किए जाएंगे। प्रत्येक हरेला वन ढाई से तीन हेक्टेयर या इससे अधिक क्षेत्रफल का होगा। कुमाऊं और गढ़वाल के आरक्षित वन प्रभागों के 27 डिवीजन और 162 रेंजों में यह योजना लागू की जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य है कि लगाए गए पौधे जिंदा रहें और वास्तविक जंगल अस्तित्व में आएं, क्योंकि पिछले वर्षों में हरेला पर्व पर लाखों-करोड़ों पौधे लगाने के बावजूद वनाच्छादित क्षेत्र में उतनी वृद्धि नहीं हुई जितनी अपेक्षित थी।

रानीखेत में इस योजना की शुरुआत हो चुकी है। यहां सौनी बिनसर क्षेत्र में करीब तीन हेक्टेयर में हरेला वन विकसित किया जा रहा है। वन क्षेत्राधिकारी तापस मिश्रा के अनुसार, रानीखेत के छह सेक्शन—सौनी बिनसर, बिल्लेख, कालिका, मजखाली, गनियाद्योली और चौबटिया—में यह कार्य चल रहा है। सौनी बिनसर के अलावा गनियाद्योली में भी तीन हेक्टेयर का दूसरा हरेला वन तैयार किया जा रहा है। जनसहभागिता से अब तक विभिन्न प्रजातियों के 500 से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं।

हरेला वन की खासियत यह है कि इसमें केवल पारंपरिक वृक्ष जैसे बाज, देवदार, काफल, उतीश ही नहीं, बल्कि फलदार और फूलदार पौधे भी लगाए जा रहे हैं। इससे जैव विविधता बढ़ेगी और स्थानीय समुदाय को फल-फूलों से आर्थिक लाभ भी मिलेगा। पांच साल तक इन वनों की देखभाल (पालना) की जिम्मेदारी वन विभाग की होगी, जिसमें तारबाड़ी और अन्य सुरक्षा उपाय शामिल हैं। इस दौरान छोटे बच्चे, अभिभावक, महिलाएं, शिक्षक, सेवानिवृत्त अधिकारी-कर्मचारी और आम नागरिक अपनी पसंद के पौधे लगा सकेंगे। इससे सामुदायिकता का संदेश मजबूत होगा और लोग जंगलों से भावनात्मक रूप से जुड़ेंगे।

वन विभाग हर साल विभिन्न प्रजातियों के करीब एक करोड़ से अधिक पौधे लगाता है। हरेला पर्व पर विशेष अभियान चलाए जाते हैं, जैसे 2025 में 1.5 करोड़ पौधों का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन सर्वाइवल रेट (जीवन दर) कम होने से वन क्षेत्र में वृद्धि सीमित रहती है। कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कुछ क्षेत्रों में सर्वाइवल रेट 35-80 प्रतिशत तक रहता है। ‘हरेला वन’ मॉडल इसी समस्या का समाधान है, जहां पौधारोपण के बाद लंबे समय तक देखभाल सुनिश्चित की जाती है।

यह योजना पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मददगार साबित होगी। उत्तराखंड में जंगल आग की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। हरेला वन मिश्रित प्रजातियों से बने होंगे, जो आग प्रतिरोधी होंगे और मिट्टी के कटाव को रोकेंगे। साथ ही, ये वन पर्यटन को बढ़ावा देंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे।

रानीखेत जैसे हरे-भरे पर्यटक स्थल में यह शुरुआत प्रेरणादायक है। यहां के हरेला वन न केवल हरियाली बढ़ाएंगे, बल्कि पर्यटकों को प्राकृतिक सुंदरता का नया अनुभव भी देंगे। वन विभाग का मानना है कि जन भागीदारी से ये वन स्थायी बनेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर साबित होंगे।

उत्तराखंड सरकार और वन विभाग की यह पहल ‘हरेला’ पर्व की भावना को साकार कर रही है, जो हर साल प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का प्रतीक है। यदि यह मॉडल सफल रहा, तो राज्य में वनाच्छादन बढ़ेगा, जैव विविधता संरक्षित होगी और पर्यावरणीय संतुलन मजबूत होगा। उम्मीद है कि अन्य राज्यों के लिए भी यह एक मिसाल बनेगा।

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