नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में बंदियों की खराब स्थिति पर सख्त रुख अपनाया है। उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने जेलों में सुधार की मांग को लेकर एक जनहित याचिका दायर की है। इस याचिका में जेलों की भीड़भाड़ कम करने और सुविधाओं में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की गई है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 में उत्तराखंड को 18 बड़े राज्यों में 16वां स्थान प्राप्त हुआ है, जो राज्य की न्याय व्यवस्था की कमजोर स्थिति को दर्शाता है।
याचिका में छह महीने के भीतर जमानत, पैरोल, और छूट से संबंधित मामलों में तेजी लाने, त्रैमासिक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने, और जेलों में 29 प्रतिशत रिक्त पदों को भरने का आदेश देने की मांग की गई है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इस याचिका को एक अन्य लंबित जनहित याचिका के साथ जोड़ दिया है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025, जो टाटा ट्रस्ट्स द्वारा जारी की गई है, में पुलिस, न्यायपालिका, जेल, और कानूनी सहायता के चार प्रमुख स्तंभों के आधार पर राज्यों की रैंकिंग की गई है।
उत्तराखंड का 16वां स्थान इन क्षेत्रों में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव प्रदीप मणि त्रिपाठी ने बताया कि अपर्याप्त पुलिस-जनसंख्या अनुपात, जेलों में विचाराधीन कैदियों की अधिकता, और कानूनी सहायता पर कम खर्च जैसे मुद्दे चिंताजनक हैं।
रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया कि उत्तराखंड में न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम है, और वर्तमान में उच्च न्यायालय में कोई महिला न्यायाधीश नहीं है। यह स्थिति लैंगिक समानता की कमी को दर्शाती है। हाईकोर्ट ने जेल सुधार के लिए पहले भी कई कदम उठाए हैं, जिसमें समय से पहले रिहाई के योग्य कैदियों की रिहाई और जेलों में भीड़भाड़ कम करने के लिए निर्देश शामिल हैं। याचिका में मांग की गई है कि राज्य सरकार इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की कमियों को गंभीरता से ले और न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए त्वरित कदम उठाए।
यह मामला उत्तराखंड की जेलों और समग्र न्याय व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोर्ट का यह सख्त रवैया और याचिका के परिणामस्वरूप होने वाले सुधार कैदियों के अधिकारों और सम्मान को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।