Sunday, February 8, 2026
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केदारनाथ यात्रा मार्ग पर खच्चरों की लीद और पिरूल से पैदा होगी जैविक ऊर्जा

देहरादून: हिमालय की गोद में विराजमान भगवान शिव के पवित्र धाम केदारनाथ की यात्रा आस्था का प्रतीक तो है ही, साथ ही यह उत्तराखंड के नाजुक पर्यावरण के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हर साल 16 लाख से अधिक श्रद्धालु इस कठिन तीर्थयात्रा पर निकलते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है, लेकिन पर्यावरण पर भारी बोझ भी पड़ता है। अब इस समस्या से निपटने के लिए एक क्रांतिकारी और पर्यावरण-अनुकूल पहल शुरू होने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान और नमामि गंगे मिशन की भावना को आत्मसात करते हुए, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की दूरदर्शिता से उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड के प्रयास से केदारनाथ यात्रा मार्ग पर एक अनूठा पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है।

इस प्रोजेक्ट में खच्चरों की लीद (गोबर) और जंगलों में बिखरी चीड़ की सूखी पत्तियों (पिरूल) को वैज्ञानिक तरीके से एकत्र कर उच्च ऊर्जा वाली बायोमास पेलेट्स में बदला जाएगा। यह पहल न केवल मन्दाकिनी और गंगा नदियों को स्वच्छ रखेगी, बल्कि जंगल की आग के खतरे को भी कम करेगी और स्थानीय लोगों को रोजगार व आय का नया स्रोत भी बनेगी।

केदारनाथ यात्रा मार्ग का सबसे संवेदनशील हिस्सा गौरीकुंड से केदारनाथ तक का 19 किलोमीटर लंबा पैदल रास्ता है। यात्रा सीजन में प्रतिदिन लगभग 6,000 खच्चर इस मार्ग पर चलते हैं, जो कम से कम 25 टन (25,000 किलोग्राम) लीद उत्पन्न करते हैं। यह लीद ज्यादातर रास्ते में ही पडी रहती है। बारिश या बर्फ पिघलने पर यह बहकर सीधे मंदाकिनी नदी में मिल जाती है, जो गंगा की प्रमुख सहायक नदी है। इससे नमामी गंगे मिशन के लक्ष्य प्रभावित होते हैं। लीद के ढेर से दुर्गंध फैलती है, सूखी लीद के कण पैदल यात्रियों की सांसो में संक्रमण का खतरा बनते हैं , मच्छर-मक्खी जैसे रोग वाहक बढ़ते हैं और उच्च ऊंचाई वाले इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में यात्रियों का आध्यात्मिक अनुभव खराब होता है।

इसके साथ ही दूसरी बड़ी समस्या है आसपास के चीड़ के जंगलों में पिरूल का जमा होना। ये पिरूल अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं और उत्तराखंड में हर साल होने वाली जंगल की आग का प्रमुख कारण मानी जाती हैं। अनियंत्रित लीद और पिरूल मिलकर दोहरा खतरा पैदा करती हैं – एक तरफ नदियां प्रदूषित होती हैं, दूसरी तरफ आग का जोखिम बढ़ता है।

इन्हीं दो समस्याओं को अवसर में बदलने के लिए प्रस्तावित एक वर्षीय पायलट प्रोजेक्ट एक मिसाल बन सकता है। योजना के तहत मार्ग से खच्चर लीद और जंगलों से पिरूल इकट्ठा की जाएंगी। इन दोनों को 50:50 अनुपात में मिलाकर वैज्ञानिक प्रक्रिया से उच्च ऊर्जा वाली बायोमास पेलेट्स बनाई जाएंगी।

प्रोजेक्ट कैसे काम करेगा?

योजना की शुरुआत दैनिक संग्रहण से होगी। करीब 30 सफाई कर्मचारी पूरे यात्रा मार्ग पर नियमित रूप से लीद इकट्ठा करेंगे। पाइन सुइयां स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) द्वारा जुटाई जाएंगी, जिससे गांव की महिलाओं और युवाओं को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा। गौरीकुंड या सोनप्रयाग के निकट प्रस्तावित केंद्रीय प्रसंस्करण इकाई में लीद को सबसे पहले पानी से अलग किया जाएगा। तरल अपशिष्ट का 10,000 लीटर क्षमता वाले टैंकों में जैविक उपचार किया जाएगा ताकि प्रदूषण नियंत्रण मानकों का पालन हो। ठोस भाग को कटी-कुटी पिरूल के साथ मिलाकर दबाव से पेलेट्स का रूप दिया जाएगा। यात्रा सीजन में इस प्लांट से प्रतिदिन पेलेट्स का उत्पादन होगा।

पेलेट्स का उपयोग और सर्कुलर इकोनॉमी

ये पेलेट्स एक चक्रीय अर्थव्यवस्था का आधार बनेंगी। रामबाड़ा, लिंचोली और केदारनाथ जैसे प्रमुख पड़ावों पर 6 बड़े हॉट वॉटर बॉयलर लगाए जाएंगे, जो शून्य से नीचे तापमान में प्रतिदिन प्रतिघंटा 3,000 से 4,000 लीटर गर्म पानी उपलब्ध कराएंगे – यात्रियों के लिए यह बड़ी राहत होगी। इसके अलावा 20 कम धुआं वाली पेलेट स्टोव स्थानीय दुकानदारों और चाय-नाश्ते की दुकानों को दिए जाएंगे। इससे एलपीजी और लकड़ी का खर्च लगभग 30 प्रतिशत कम होगा, वनों की कटाई रुकेगी और धुआं प्रदूषण में भारी कमी आएगी।

पर्यावरणीय लाभ बेहद महत्वपूर्ण

प्रोजेक्ट के वार्षिक प्रभाव की बात करें तो करीब 5,460 टन अपशिष्ट मंदाकिनी और अंततः गंगा में जाने से रोका जाएगा। पाइन सुइयों को हटाने से प्रोजेक्ट क्षेत्र में जंगल की आग का खतरा 20 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। अनियंत्रित सड़ने वाली लीद से निकलने वाली मीथेन गैस – जो ग्रीनहाउस प्रभाव के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से कहीं अधिक खतरनाक है – में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। यह जलवायु परिवर्तन से जूझते हिमालयी क्षेत्र के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

आर्थिक-सामाजिक लाभ और आत्मनिर्भरता

प्रोजेक्ट सीजन में 30 से अधिक पूर्णकालिक नौकरियां सृजित करेगा और प्रोत्साहन राशि के रूप में 27 लाख रुपये से अधिक वितरित करेगा। यात्रियों को साफ-सुथरे रास्ते, कम स्वास्थ्य जोखिम और गर्म पानी की सुविधा मिलेगी। सबसे खास बात यह है कि पेलेट्स की बिक्री से सालाना करीब 50 लाख रुपये की आय होने का अनुमान है, जो परिचालन खर्च पूरा करने के बाद प्रोजेक्ट को पूरी तरह आत्मनिर्भर बना देगी।

पायलट प्रोजेक्ट को 12 महीने के बाद चरणबद्ध तरीके से केदारनाथ नगर पंचायत को सौंप दिया जायेगा। 40 स्थानीय लोगों को प्लांट संचालन और रखरखाव की पूरी ट्रेनिंग दी जाएगी, जिससे व्यवस्था लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर चलेगी।

पर्यटन सचिव, धीरज गर्ब्याल का कहना है कि यदि यह मॉडल सफल रहा तो इसे उत्तराखंड के अन्य प्रमुख तीर्थ मार्गों – जैसे यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब – तथा पूरे हिमालय क्षेत्र के संवेदनशील स्थलों पर दोहराया जा सकता है। यह पहल स्पष्ट संदेश देती है कि पर्यावरण संरक्षण, यात्री सुविधा और स्थानीय आजीविका एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वैज्ञानिक योजना और समुदाय की भागीदारी से कचरे को संसाधन में बदला जा सकता है। केदारनाथ इस तरह जिम्मेदार एवं सतत पर्यटन का नया मानक स्थापित कर सकता है – जहां आस्था और प्रकृति दोनों का सम्मान हो।

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