(देहरादून) : राजधानी की सड़कें, गलियाँ, छतें और यहाँ तक कि घरों के अंदर भी अब बंदरों का कब्जा है। सुबह स्कूल जाते बच्चे का बैग छीन लो, दोपहर में बालकनी में सुखाते कपड़े उड़ा लो या शाम को खिड़की से झपट्टा मारकर रसोई से रोटी-सब्जी गायब कर दो — बंदरों ने देहरादूनवासियों का जीना मुहाल कर रखा है। पिछले छह महीनों में अकेले दून अस्पताल और विभिन्न थानों में बंदरों के हमले की 200 से अधिक शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। कई बच्चे और बुजुर्ग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे आतंक के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं, हम खुद हैं।
हिंदू धर्म में बंदरों को हनुमान जी का स्वरूप मानकर दशकों से लोग उन्हें केला, सेब, चना, मूंगफली और बिस्किट खिलाते आए हैं। मसूरी रोड के तपकेश्वर मंदिर, सहस्त्रधारा के आसपास, प्रेमनगर, सहारनपुर चौक और राजपुर रोड के मंदिरों के बाहर बंदरों की स्थायी फौज तैनात रहती है। इंसान का हाथ से खाना, बिना मेहनत मिलने वाला भोजन — बंदरों को जल्दी समझ आ गया कि जंगल में पेड़ों पर चढ़कर फल ढूँढने से कहीं आसान है शहर में इंसानों के पीछे-पीछे घूमना। धीरे-धीरे ये जंगली प्राणी शहरी परजीवी बन गए। अब ये न सिर्फ भोजन छीनते हैं, बल्कि विरोध करने पर गुर्राते हैं, दाँत दिखाते हैं और झपट पड़ते हैं।
सालों पहले वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 की अनुसूची-2 में रेजस और लंगूर दोनों शामिल थे। उस समय बंदरों को खिलाना कानूनी अपराध था। मंदिरों-तीर्थों के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते थे — “बंदरों को भोजन देना वर्जित है, उल्लंघन पर जुर्माना।” उल्लंघन करने पर चालान भी कटता था। लेकिन बाद में केंद्र सरकार ने आम बंदरों को इस अनुसूची से बाहर कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अब कानूनी रूप से बंदरों को खिलाने पर कोई रोक-टोक नहीं। लोगों ने इसे खुली छूट समझा और खिलाने की आदत और बढ़ गई। बंदरों की आबादी बेकाबू हो गई और उनका हौसला भी सातवें आसमान पर।
बंध्याकरणः आधा-अधूरा और खतरनाक उपाय
समस्या को देखते हुए वन विभाग ने बंदरों का बंध्याकरण अभियान चलाया है। टीमें शहर में जाल बिछाती हैं, बंदर पकड़ती हैं और हरिद्वार के चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर भेजती हैं। वहाँ ऑपरेशन के बाद उन्हें वापस शहर में ही छोड़ दिया जाता है। लेकिन जानकार बताते हैं कि पकड़े जाने का सदमा, एनेस्थीसिया का दर्द और फिर अजनबी जगह पर छोड़े जाना — ये सारी प्रक्रिया बंदरों को पहले से कहीं अधिक आक्रामक बना देती है। कई बार तो बंध्याकरण के बाद छोड़े गए बंदर उसी कॉलोनी में लौटकर बदला लेने की तरह हमला करते हैं। शहरी क्षेत्रों में बंदर पकड़ने और प्रबंधन की जिम्मेदारी देहरादून नगर निगम की है, लेकिन निगम के पास न तो पर्याप्त स्टाफ है, न उपकरण और न ही कोई ठोस योजना। नतीजतन सारा बोझ वन विभाग पर ही पड़ रहा है।
पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक जयराज ने साफ शब्दों में कहा, “बंदर स्वभाव से जंगली और स्वतंत्र प्राणी हैं। हमारी गलत मेहरबानी ने उन्हें शहर का आदी बना दिया। धार्मिक आस्था का सम्मान हर किसी को करना चाहिए, लेकिन यह समझना होगा कि बंदरों को लगातार खिलाना उनके लिए भी नुकसानदेह है और हमारे लिए खतरा। जब तक आम जनता खुद नहीं सुधरेगी, कोई भी सरकारी अभियान आधा-अधूरा ही रहेगा। नगर निगम को सिर्फ बंध्याकरण पर नहीं, बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान, कूड़ा प्रबंधन और सख्ती पर ध्यान देना होगा।”
विशेषज्ञों की राय है कि समस्या का स्थायी हल तभी संभव है जब:
- बंदरों को खिलाना पूरी तरह बंद हो
- कूड़े के ढेर और खुले खाने पर सख्ती हो
- मंदिरों-तीर्थों के बाहर फिर से “खिलाने पर जुर्माना” के बोर्ड लगें
- नगर निगम और वन विभाग मिलकर लंबी रणनीति बनाएँ
- लोगों में जागरूकता आए कि दया का मतलब जान जोखिम में डालना नहीं
देहरादून को बंदरों के आतंक से मुक्ति तभी मिलेगी, जब हम अपनी सदियों पुरानी उस आदत को बदल देंगे जिसने जंगली बंदर को शहरी गुंडा बना दिया। वरना आने वाले दिन और भयावह हो सकते हैं।

