Sunday, February 8, 2026
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गंगा को प्रदूषण से मुक्त करेगी अब जापानी Johkasou तकनीक

ऋषिकेश: गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए अब जापानी ‘जोहकासौ’ (Johkasou) तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह किफायती, टिकाऊ और विकेंद्रीकृत वेस्टवाटर ट्रीटमेंट सिस्टम है, जो जापान में 1970 के दशक से विकसित होकर दुनिया भर में अपनाई जा रही है। केंद्र सरकार ने इस तकनीक को नामामी गंगे परियोजना के तहत मंजूरी दे दी है। ऋषिकेश के ढालवाला क्षेत्र में इसका पहला मॉडल प्रोजेक्ट स्थापित किया जाएगा। फिलहाल वन विभाग से एनओसी की प्रक्रिया चल रही है।

ऋषिकेश में सीवरेज सिस्टम अभी भी पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है। अनियोजित कॉलोनियों और सहायक नदियों से अनट्रीटेड गंदा पानी गंगा में मिल रहा है। यह समस्या केवल ऋषिकेश तक सीमित नहीं—पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सीवरेज व्यवस्था पटरी से उतरी हुई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि घरेलू और व्यावसायिक अपशिष्ट बिना ट्रीटमेंट के बहता रहा, तो भूजल प्रदूषण चरम स्तर पर पहुंच जाएगा।

शहरी क्षेत्रों में अवैध निर्माण और मनमानी कॉलोनियां बढ़ रही हैं। नामामी गंगे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के बावजूद गंगा और उसकी सहायक नदियां पूरी तरह निर्मल नहीं हो पाई हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए जापानी जोहकासौ तकनीक को अपनाया जा रहा है।

जोहकासौ क्या है? यह जापान में विकसित एक कॉम्पैक्ट, डिसेंट्रलाइज्ड (विकेंद्रीकृत) वेस्टवाटर ट्रीटमेंट सिस्टम है, जो घरेलू सीवर (टॉयलेट, किचन, बाथरूम से निकलने वाला पानी) को साइट पर ही ट्रीट करता है। यह एनारोबिक फिल्टर, कॉन्टैक्ट एरेशन और डिसइंफेक्शन प्रोसेस से काम करता है। BOD, ऑर्गेनिक-इनऑर्गेनिक प्रदूषक और हानिकारक बैक्टीरिया को हटाता है। जापान में यह सिस्टम उन इलाकों में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है जहां सेंट्रलाइज्ड सीवर नेटवर्क नहीं है। यह पर्यावरण अनुकूल, कम बिजली खपत वाली और कम मेंटेनेंस वाली तकनीक है।

भारत में Daiki Axis India (जापानी Daiki Axis Co. Ltd. की सहायक कंपनी) इस तकनीक को ‘Make in India’ के तहत स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चर कर रही है। 2023 में जापान के पर्यावरण मंत्रालय और भारत की नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) के बीच MoC साइन हुआ था, जिसके तहत नामामी गंगे में जोहकासौ को शामिल किया गया। उत्तराखंड में यह पहला बड़ा डेमोंस्ट्रेशन प्रोजेक्ट होगा।

ढालवाला प्रोजेक्ट की डिटेल्स

  • क्षमता: 300 KLD (किलोलीटर प्रतिदिन)
  • लागत: सिविल और मैकेनिकल कार्य सहित कुल 4 करोड़ रुपये
  • भूमि: लगभग 1000 वर्ग गज
  • उद्देश्य: अनियोजित बस्तियों के सीवर को ट्रीटमेंट कर स्वच्छ पानी चंद्रभागा नदी में छोड़ना, जो आगे गंगा में मिलेगा।
  • संचालन: जापान से इंजीनियर आकर ट्रेनिंग और सेटअप में मदद करेंगे।
  • जिम्मेदारी: उत्तराखंड जल निगम (Uttarakhand Peyjal Nigam)

नमामी गंगे परियोजना के प्रोजेक्ट मैनेजर एसके वर्मा के अनुसार, यदि यह प्रोजेक्ट सफल रहा, तो पूरे प्रदेश में छोटे-छोटे पोर्टेबल एसटीपी लगाए जाएंगे। तीर्थनगरी के गंगा किनारे बने आश्रमों और होटलों को भी इस तकनीक से जोड़ा जा सकता है। यह तकनीक पहाड़ी इलाकों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, जहां बड़े सेंट्रलाइज्ड एसटीपी लगाना मुश्किल और महंगा होता है।

IIT रुड़की के शोधकर्ताओं ने भी 2022 में जोहकासौ तकनीक को भारतीय पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अनुकूल पाया था। यह प्रोजेक्ट गंगा की स्वच्छता के साथ भूजल संरक्षण, जल पुनर्चक्रण और पर्यावरण संतुलन में योगदान देगा।

नामामी गंगे मिशन फेज-II के तहत 2025-26 में कई सीवरेज प्रोजेक्ट्स चालू हो चुके हैं, और कुल STP क्षमता 3976 MLD तक पहुंच गई है। जोहकासौ जैसे इनोवेटिव समाधान से गंगा को स्थायी रूप से प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम उठ रहा है। उम्मीद है कि ढालवाला प्रोजेक्ट जल्द शुरू होकर उत्तराखंड के लिए मॉडल बनेगा।

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