देहरादून ( मोहन भुलानी ) : भारत विविधता का देश है और यहां हर पर्व, हर त्यौहार अपने-अपने रंगों के साथ मनाया जाता है। इन्हीं में से एक है गणेश चतुर्थी, जिसे पूरे भारतवर्ष में बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तो इस पर्व की भव्यता अलग ही रूप ले लेती है। विशाल पंडालों में गणपति बप्पा की प्रतिमाओं की स्थापना होती है और अनंत चतुर्दशी पर पूरे धूमधाम के साथ उनका विसर्जन किया जाता है। लेकिन जब हम उत्तराखंड की ओर देखते हैं, तो यहां गणेश चतुर्थी का स्वरूप बिल्कुल अलग दिखाई देता है। देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध इस राज्य में पर्वतों की आस्था, लोकजीवन और परंपराएं बाकी भारत से थोड़ी भिन्न हैं। यहां गणेश जी को घर के रक्षक और स्थायी देवता के रूप में पूजा जाता है। वे केवल कुछ दिनों के लिए स्थापित किए जाने वाले देवता नहीं, बल्कि हर घर की चौखट पर स्थायी रूप से विराजमान रहते हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एक नया परिवर्तन दिखाई देने लगा है। शहरी इलाकों जैसे देहरादून, ऋषिकेश, हल्द्वानी, हरिद्वार और बागेश्वर में महाराष्ट्र शैली के पंडाल सजने लगे हैं, जहां गणेश जी की मूर्तियां स्थापित होती हैं और अनंत चतुर्दशी पर नदी में विसर्जन भी किया जाता है। यह बदलाव कई सवाल खड़े करता है—क्या यह उत्तराखंड की संस्कृति से मेल खाता है? क्या विसर्जन की परंपरा यहां पर्यावरण के लिए खतरा नहीं है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या आधुनिकता के दबाव में हम पर्वतीय पारंपरिक पहचान खो रहे हैं?
परंपरागत उत्तराखंडी संस्कृति
उत्तराखंड की संस्कृति अपनी सरलता और लोकपरंपराओं के लिए जानी जाती है। यहां गणेश जी का स्वरूप भी स्थानीय आस्था के अनुरूप है। उन्हें यहां “खोली का गणेश” कहा जाता है। “खोली का गणेश” – घर की चौखट के रक्षक- “खोली” का अर्थ है घर का प्रवेश द्वार। उत्तराखंड में माना जाता है कि गणेश जी हर घर की चौखट पर स्थायी रूप से विराजमान होते हैं और घर के रक्षक देवता के रूप में परिवार को समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करते हैं। पारंपरिक पहाड़ी घरों में दरवाजे के ऊपर या बगल में गणेश जी की छोटी-सी प्रतिमा या चित्र लगाना आम बात है। यह केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि आस्था और सुरक्षा का प्रतीक है। लोकसंगीत गणेश जी के महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। शादियों और शुभ अवसरों पर गाए जाने वाले मंगल गीतों में गणेश जी का विशेष उल्लेख होता है। सबसे प्रसिद्ध मंगल गीत है—
“दैणा होया खोली का गणेशा हे…”
यह गीत इस बात का प्रतीक है कि गणेश जी लोकजीवन में गहराई तक रचे-बसे हैं। इस गीत को महिलाएं सामूहिक रूप से गाती हैं, और इसके बोल बताते हैं कि गणेश जी घर की नींव और परिवार के स्थायी रक्षक हैं।
उत्तराखंड में गणेश पूजा मुख्यतः घरेलू स्तर पर की जाती है। यहां महाराष्ट्र की तरह बड़े-बड़े पंडाल और सार्वजनिक आयोजन परंपरा का हिस्सा नहीं रहे। खासतौर पर विवाह संस्कारों में गणेश जी का आशीर्वाद लेना अनिवार्य माना जाता है। गढ़वाल -कुमाऊं क्षेत्र में शादियों के दौरान “गणेश पूजा” सबसे पहले की जाती है। कुमायूं में सुवाल पथाई और कन्या दान जैसे संस्कारों से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है ताकि विवाह मंगलमय हो।
मुंडकटिया मंदिर (केदार घाटी) – यहां गणेश जी को बिना सिर के रूप में पूजा जाता है। यह परंपरा शिव पुराण की कथा से जुड़ी है, जिसमें बताया गया है कि भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया था और बाद में उन्हें हाथी का सिर दिया।
डोडीताल (उत्तरकाशी) – इस झील को गणेश जी का जन्मस्थान माना जाता है। यहां स्थित गणेश मंदिर तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है।
ये उदाहरण बताते हैं कि उत्तराखंड में गणेश जी का स्थान केवल एक अस्थायी उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जीवन और आस्था का स्थायी हिस्सा हैं। भारत के अन्य हिस्सों में गणेश चतुर्थी के बाद मूर्तियों का विसर्जन अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। लेकिन उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से यह प्रथा नहीं रही। इसका मुख्य कारण यहां की धार्मिक मान्यताएं और भौगोलिक परिस्थिति है। माना जाता है कि गणेश जी कैलाश पर्वत के निवासी हैं। चूंकि हिमालय स्वयं कैलाश का ही हिस्सा है, इसलिए उत्तराखंड के लोग मानते हैं कि गणेश जी को विसर्जन के बहाने “वापस भेजने” की जरूरत नहीं है। वे यहीं सदा निवास करते हैं और हर घर की चौखट पर स्थायी रूप से विराजमान रहते हैं। उत्तराखंड की संस्कृति में पूजा-पाठ हमेशा से घर और परिवार केंद्रित रहा है। यहां बड़े सामूहिक आयोजनों की तुलना में घरेलू स्तर पर पूजा को ज्यादा महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि गणेश जी की प्रतिमाएं घर की चौखट पर स्थायी रूप से लगाई जाती हैं। विसर्जन का विचार इस परंपरा से मेल नहीं खाता।
स्थानीय लोगों का मानना है कि गणेश जी को विसर्जित करना उन्हें “घर से बाहर निकालना” जैसा है। चूंकि वे पहले से ही हिमालय में निवास करते हैं, इसलिए उन्हें गंगा या अन्य नदियों में विसर्जित करना तर्कसंगत नहीं माना जाता। यही कारण है कि परंपरागत रूप से यहां विसर्जन की कोई प्रथा विकसित नहीं हुई। गणेश चतुर्थी अब केवल एक क्षेत्रीय उत्सव न रहकर “पैन-इंडियन फेस्टिवल” बन चुका है। उत्तराखंड में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस प्रक्रिया में स्थानीय संस्कृति अपनी मौलिकता खो रही है?
स्थानीय लोगों का मानना है कि विसर्जन उत्तराखंडी परंपरा का हिस्सा नहीं है। यहां गणेश जी को घर का हिस्सा माना जाता है, इसलिए विसर्जन करना उनकी आस्था से मेल नहीं खाता। कई बुजुर्गों का कहना है कि यह बाहरी संस्कृति की नकल है, जो धीरे-धीरे स्थानीय परंपराओं को कमजोर कर रही है। दूसरी ओर, युवा पीढ़ी इसे आधुनिकता और सामाजिक मेलजोल का माध्यम मानती है। उनके अनुसार, गणेश विसर्जन सामूहिकता का प्रतीक है, जहां लोग एक साथ आते हैं, उत्सव मनाते हैं और भाईचारे का संदेश देते हैं। उनका मानना है कि परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाकर चलना ही सही रास्ता है।
पर्यावरणीय चिंताएँ
उत्तराखंड की नदियां न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र हैं, बल्कि जीवनरेखा भी हैं। यहां की नदियां संकरी और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। गणेश विसर्जन के दौरान इनमें डाली जाने वाली मूर्तियां गंभीर समस्या पैदा कर रही हैं। बाजार में बिकने वाली अधिकतर प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी होती हैं। ये मूर्तियां पानी में आसानी से नहीं घुलतीं। साथ ही, इनमें उपयोग होने वाले रासायनिक रंग पानी को प्रदूषित करते हैं। इससे न केवल नदियों का जल दूषित होता है, बल्कि जलीय जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। गंगा, यमुना, अलकनंदा और भागीरथी जैसी नदियां उत्तराखंड की धड़कन हैं। इन नदियों में मूर्तियों के विसर्जन से पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा आरती के पवित्र तट पर जब मूर्तियों के अवशेष बहते हुए दिखते हैं, तो यह दृश्य न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, बल्कि पर्यावरणीय संकट की ओर भी इशारा करता है। पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में उत्तराखंड की नदियों और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने सुझाव दिया है कि मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगाने या उन्हें केवल कृत्रिम जलाशयों में करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

