देवभूमि उत्तराखंड में पर्यटन का स्वरूप अब बदल रहा है। यहां पर्यटन अब केवल तीर्थयात्रा और पर्वतीय सैर तक सीमित नहीं रहा। राज्य के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में होमस्टे पर्यटन एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहा है। यह न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पलायन रोकथाम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हालिया अध्ययन रिपोर्ट “होम स्टे मैनुअल फॉर रूरल उत्तराखंड” में इसकी क्षमता को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि यदि पर्यटन विकास को स्थानीय वास्तुकला, संस्कृति और पर्यावरण के अनुरूप दिशा दी जाए, तो यह पहाड़ी गांवों के लिए स्थायी आय का मजबूत स्रोत बन सकता है।
पिछले तीन वर्षों में उत्तराखंड में लगभग 23 करोड़ पर्यटक पहुंचे हैं। खास बात यह है कि सीमावर्ती और कम विकसित क्षेत्रों में पर्यटन में अभूतपूर्व उछाल देखा गया है। पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी इसका प्रमुख उदाहरण है। वर्ष 2015 में यहां मात्र 200 पर्यटक आते थे, लेकिन 2024 में यह संख्या बढ़कर 29,352 हो गई। 2025 में 30 हजार का आंकड़ा पार करने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि स्थानीय समुदायों के लिए बड़े अवसर लेकर आई है। सही योजना और नीतियों से पर्यटन पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता की नींव रख सकता है।
पारंपरिक वास्तुकला: पर्यटन की मजबूत आधारशिला
रिपोर्ट में पारंपरिक घरों की बनावट को पर्यटन के लिए अहम बताया गया है। पत्थर और चूने के मसाले से बने घर, प्राकृतिक मिट्टी की प्लास्टरिंग, लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे-खिड़कियां और ऊपरी मंजिलों पर लकड़ी का इस्तेमाल क्षेत्र की पहचान के मूल तत्व हैं। ये न केवल गांवों की सुंदरता बढ़ाते हैं, बल्कि पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। “काठ-कुणी” जैसी पारंपरिक शैली का जिक्र करते हुए सुझाव दिया गया है कि प्रोजेक्टेड बालकनी, सजावटी लकड़ी के बीम और एक समान रंग योजना से पूरे गांव का दृश्य चरित्र मजबूत किया जा सकता है। इससे स्थानीय कारीगरों की मांग बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ऐसे बदलाव पर्यटकों के लिए गांवों को अधिक आकर्षक बनाएंगे, साथ ही पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।
पर्यटन सचिव धीरज गर्ब्याल कहते हैं, “होमस्टे का आधार स्थानीय वास्तुकला होना चाहिए। पत्थर और चूने से बनी दीवारें, मिट्टी का प्लास्टर, लकड़ी की खिड़कियां और दरवाजे न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि कठोर ठंड में बेहतर तापीय सुरक्षा प्रदान करते हैं। गांवों में आरसीसी निर्माण का बढ़ता चलन पारंपरिक पहचान को नुकसान पहुंचा रहा है। बिना योजना के बने कंक्रीट मकान न तो पर्यावरण अनुकूल हैं और न ही पहाड़ी जलवायु के लिए उपयुक्त।”
पारंपरिक घरों की विशेषताएं पर्यावरण के अनुकूल हैं। मिट्टी की प्लास्टरिंग पानी सोखती है और घर को ठंडा रखती है। लकड़ी के दरवाजे-खिड़कियां हवा के आवागमन को सुनिश्चित करते हैं। पत्थर की दीवारें मजबूत होती हैं और भूकंप में सुरक्षित। “काठ-कुणी” शैली में लकड़ी को आपस में फंसाया जाता है, जो लचीली होती है और घरों को टूटने से बचाती है।
स्पीति वैली: कठोर जलवायु में सस्टेनेबल मॉडल
हिमाचल प्रदेश की स्पीति वैली इसका जीवंत उदाहरण है। यहां की जलवायु बेहद कठोर है – लंबी सर्दियां और तीखी ठंड। फिर भी, पारंपरिक मिट्टी-पत्थर के मकान, मोटी दीवारें, फ्लैट छतें और छोटे खुले हिस्से मिलकर एक मजबूत और ऊर्जा-कुशल वास्तुकला बनाते हैं। ये घर ठंड से रक्षा करते हैं और गर्मी बनाए रखते हैं। होमस्टे में इनका इस्तेमाल बिना किसी बदलाव के किया जाता है, जिससे पर्यटक स्थानीय जीवन का प्रामाणिक अनुभव लेते हैं। स्पीति में होमस्टे पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है, जो गांव वालों को स्थिर कमाई प्रदान कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी वास्तुकला को संरक्षित करना आवश्यक है, क्योंकि यह पर्यावरण अनुकूल है। बड़े कंक्रीट घर यहां असफल साबित होते हैं, क्योंकि वे ठंड में फट सकते हैं या अधिक ईंधन की मांग करते हैं।
स्पीति के गांवों जैसे कीब, कोमिक और लंग्जा में होमस्टे सफलतापूर्वक चल रहे हैं। यहां पर्यटक बौद्ध संस्कृति, ट्रेकिंग और स्थानीय व्यंजनों का आनंद लेते हैं। महिलाएं होमस्टे संचालित करती हैं और पर्यटकों को पारंपरिक थंगका पेंटिंग या याक ऊन के कपड़े बेचती हैं। इससे परिवारों की आय में वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष स्पीति में 50 हजार से अधिक पर्यटक आए, जिनमें से आधे होमस्टे में ठहरे। यह संख्या बढ़ रही है।
सर्मोली गांव: सामुदायिक पर्यटन का आदर्श
पिथौरागढ़ जिले में मुनस्यारी के निकट सर्मोली गांव को “कम्युनिटी ड्रिवन टूरिज्म” का उत्कृष्ट मॉडल माना जाता है। यहां स्थानीय निवासी खुद पर्यटन संचालित करते हैं। वे सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, छोटे ट्रेक आयोजित करते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाते हैं और प्रकृति-आधारित गतिविधियां संचालित करते हैं। गांव वाले मिलकर निर्णय लेते हैं कि पर्यटन कैसे विकसित किया जाए। इससे आय सीधे समुदाय को मिलती है, बाहरी कंपनियां बीच में नहीं आतीं।
सर्मोली में महिलाओं की भूमिका विशेष है। वे पारंपरिक वस्त्र बुनाई करती हैं, जैसे ऊनी शॉल, टोपियां और कपड़े। रिपोर्ट में सुझाव है कि इन उत्पादों को होमस्टे के इंटीरियर और सजावट में शामिल करें तथा पर्यटकों को सीधे बेचें। इससे घरेलू स्तर पर अतिरिक्त कमाई होगी। महिलाएं अब होमस्टे चलाती हैं और पर्यटकों को लोक नृत्य, गीत तथा कहानियां सुनाती हैं। इससे संस्कृति संरक्षित होती है और युवा गांव नहीं छोड़ते।
सर्मोली में यह मॉडल 2018 से चल रहा है। पहले यहां पलायन की समस्या गंभीर थी। अब 20 से अधिक होमस्टे साल भर सक्रिय हैं। पर्यटक यहां पक्षी अवलोकन, हाइकिंग और गांव भ्रमण करते हैं। गांव वाले स्थानीय सब्जियां, जड़ी-बूटियां और शहद बेचते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। रिपोर्ट सुझाव देती है कि ऐसे मॉडल को अन्य गांवों में अपनाया जाए।
सफल उदाहरण: सौर और गोअट विलेज
रिपोर्ट में कई गांवों का उल्लेख है, जहां सामुदायिक प्रयासों से पर्यटन को नई दिशा मिली है। टिहरी गढ़वाल का सौर गांव कभी वीरान हो चुका था। यहां छोड़े गए घरों को तोड़ने के बजाय संजोया गया और दीवारों पर लोककथाएं तथा जीवन दर्शन उकेरे गए। अब यह ‘ओपन एयर आर्ट गैलरी’ के रूप में प्रसिद्ध है, जो प्रकृति भ्रमण, गांव सैर और सांस्कृतिक अनुभव के लिए पर्यटकों को लुभाता है।
गोअट विलेज का मॉडल भी चर्चित है। 2016 में शुरू हुई इस पहल का लक्ष्य पलायन रोकना था। यहां नाग टिब्बा ट्रेक, प्रकृति पथ, चूल्हा डिनर, पक्षी अवलोकन और तारों के नीचे बोनफायर जैसी गतिविधियां पर्यटकों को स्थानीय जीवन से जोड़ती हैं। इससे युवाओं को रोजगार मिला और कई शहर छोड़कर गांव लौटे।
चुनौतियां
राज्य सरकार की होमस्टे योजना ग्रामीण पर्यटन की रीढ़ बन रही है। होटल-आधारित पर्यटन से अलग, होमस्टे पर्यटकों को स्थानीय परिवारों के साथ रहने, पारंपरिक भोजन चखने और गांव की दिनचर्या देखने का अवसर देता है। यह प्रामाणिक अनुभव प्रदान करता है और ग्रामीण परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाता है। होमस्टे सस्टेनेबल टूरिज्म के अनुरूप है, क्योंकि इसमें बड़े निर्माण, संसाधन दोहन और पर्यावरण क्षति न्यूनतम है।
हालांकि, होमस्टे की संख्या बढ़ रही है, लेकिन गुणवत्ता चुनौतीपूर्ण है। कई जगहों पर अस्थायी कमरे, पुरानी टेपेस्ट्री, कृत्रिम लकड़ी फिनिश और खराब प्रकाश व्यवस्था देखी गई है। इससे पर्यटकों को असुविधा होती है और गांव की छवि प्रभावित होती है। रिपोर्ट में भागीदारी-आधारित विकास मॉडल की सिफारिश की गई है, जहां मकान मालिक डिजाइन और निर्माण में सक्रिय रहें। इससे लागत कम होगी और स्वामित्व की भावना बढ़ेगी।
भविष्य की योजना
यदि होमस्टे को व्यवस्थित रूप से विकसित किया जाए, तो यह ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य आय स्रोत बनेगा। बेहतर डिजाइन से मालिक अधिक शुल्क ले सकेंगे, आय बढ़ेगी, युवाओं को गांव में रोजगार मिलेगा और पलायन रुकेगा। आने वाले वर्षों के लिए चरणबद्ध योजना प्रस्तावित है। कुछ गांवों में आंशिक, कुछ में पूर्ण डिजाइन मैनुअल अपनाया जाएगा। प्रत्येक गांव की अलग पहचान बनाए रखने के लिए रंग, वास्तु तत्व और स्थानीय कला को प्राथमिकता दी जाएगी।
उत्तराखंड में होमस्टे पर्यटन मात्र व्यवसाय नहीं, बल्कि ग्रामीण पुनर्जागरण का माध्यम है। यदि विकास स्थानीय संस्कृति, वास्तुकला और पर्यावरण के अनुरूप रहा, तो यह मॉडल दूरस्थ गांवों को आत्मनिर्भर बनाएगा। देवभूमि का ग्रामीण पर्यटन आर्थिक समृद्धि लाएगा और हिमालयी जीवनशैली को वैश्विक पटल पर मजबूती से स्थापित करेगा।

