NTI (मोहन भुलानी ): हिमालय की खूबसूरत घाटियों में बसी लोक संस्कृति और संगीत की मिठास को एक नया रंग देने का काम अगर किसी ने किया है, तो वो हैं गंभीर दार्मिज जी। उनकी रचनाएँ और उनका गायन आज भी उत्तराखंड के लोगों के दिलों में बसता है। आज हम बात करेंगे उनकी एक ऐसी रचना की जो न सिर्फ उनके संगीत के प्रति समर्पण को दर्शाती है, बल्कि हिमालय की सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवंत करती है। यह गीत है “हिमालै का घट्यूँ मां‘ (Himalaya Ka Ghatyun Maa) जिसे हाल ही में डॉ. अजय ढौंडियाल ने अपनी आवाज़ में पेश किया।
गंभीर दार्मिज का संगीत उत्तराखंड की आत्मा है। उनकी रचनाएँ न सिर्फ मनोरंजन करती हैं, बल्कि हिमालय के जीवन, उसकी चुनौतियों और खूबसूरती को भी बयाँ करती हैं। डॉ. अजय ढौंडियाल जैसे कलाकारों के प्रयासों से यह धरोहर आज भी जीवित है और नई पीढ़ी तक पहुँच रही है। “हिमालै का घट्यूँ मां‘ सुनते हुए आप भी उस बर्फीली हवा और पहाड़ी जीवन को महसूस कर सकते हैं।
गंभीर दार्मिज उत्तराखंड के बॉर्डर एरिया, खासकर पिथौरागढ़ के एक मशहूर गीतकार और गायक रहे हैं। उनका संगीत कुमाऊँनी और नेपाली संस्कृति का अनूठा संगम है। 80 के दशक में आकाशवाणी लखनऊ से उनके इस ने खूब लोकप्रियता हासिल की थी। इसके अलावा उनका एक और गीत “रानी रुमल मा” आज भी हर उम्र के लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। इस गीत की पंक्तियाँ – “काली ताला, गोरी छाला, ऊ माथि कनारा, रानी रुमल मा” – उनकी खास शैली को दर्शाती हैं।
लोक गायक डॉ. अजय ढौंडियाल बताते हैं, “गंभीर दार्मिज का योगदान उत्तराखंडी संगीत को सिर्फ गीत लिखने तक सीमित नहीं था। वो खुद गाते थे और उनकी आवाज़ में एक जादू था। बॉर्डर एरिया से आने वाले वो पहले ऐसे पुरुष गायक थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में लोक जीवन की सादगी और गहराई को पिरोया। उनकी समकालीन महिला गायिका कबूतरी देवी जी रही. जो पहाड़ की पहली लोकगायिका रही और बॉर्डर एरिया से ही थीं. गंभीर जी का अंदाज़ सबसे अलग था।” यह गीत डॉ. अजय ढौंडियाल के लिए बेहद खास है। वे कहते हैं, “बचपन से मैं इस गीत को सुनता आया हूँ। आकाशवाणी देहरादून को मैं मेल करता था कि गंभीर दार्मिज जी का यह गीत सुनाया जाए। गाड़ी में रेडियो पर इसे सुनते हुए बड़ा सुकून मिलता था। लेकिन यह गीत सोशल मीडिया या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं था। मेरा मन था कि इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाऊँ।”
इस सपने को साकार करने के लिए डॉ. अजय ने गंभीर दार्मिज जी से संपर्क किया। वे बताते हैं, “पहले मेरे पास उनका नंबर था जब वो पिथौरागढ़ में थे, लेकिन रिटायरमेंट के बाद काशीपुर बसने पर उनका नंबर खो गया। फिर दोस्तों की मदद से मैंने उनका नंबर लिया और बात की। उन्होंने न सिर्फ मुझे गाने की इजाज़त दी, बल्कि लिखित अनुमति भी दी।” इसके बाद संगीत निर्देशक रणजीत सिंह जी के साथ मिलकर इस गीत को नया रूप दिया गया।
गीत की खासियत
“हिमालै का घट्यूँ मां‘ की पंक्तियाँ हिमालय की सुंदरता और वहाँ के जीवन को बयाँ करती हैं। गीत की शुरुआत कुछ इस तरह होती है:
“सुर सुरु बयालो, हिमालै का घट्यूँ मां
लागनो निसासा, पहाडै का घाट्यूँ मा।”
इसमें एक खास पद नेपाल की भाषा से प्रेरित है:
“डाफ़या पंछी हिमालय मा भुर भुर उड़ान छ,
सुकीलो हिमालय देखी यो मन उड़ान छ,
बर्फीली हवै छ, हिमालय का घाट्यूँ मा।”
यहाँ “डाफ़या पंछी” यानी मोनाल पक्षी का जिक्र है, जो हिमालय का प्रतीक है और उत्तराखंड बनने के बाद राज्य पक्षी है. गीत में प्रकृति और मानव जीवन का सुंदर मेल है।
डॉ. अजय ढौंडियाल कहते हैं, “गंभीर दार्मिज जी की रचनाएँ हमारी धरोहर हैं। इन्हें सहेजना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना ज़रूरी है। गंभीर दार्मिज जी के अलावा डॉ. अजय ने शेर सिंह कुमाऊँनी और हीरा सिंह राणा जैसे गीतकारों का भी जिक्र किया। शेर सिंह केवल गीतकार थे, जबकि गंभीर जी गीतकार और गायक दोनों थे। वहीं, हीरा सिंह राणा को “मेले-ठेलों का गायक” कहा जाता था, जो जनता के बीच गाते थे। उनकी रचनाएँ जैसे “हे जन्मभूमि तेरी जय जयकारी” भी डॉ. अजय ने नई पीढ़ी तक पहुँचाई हैं।