विशेषज्ञों की मदद से धामों की भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थितियों का अध्ययन किया जाएगा। खास बात यह है कि इस दौरान केवल स्थानीय वनस्पतियों और पौधों को ही ग्रीन बेल्ट में लगाया जाएगा। प्रमुख वन संरक्षक समीर सिन्हा ने अधिकारियों को 15 दिन के भीतर योजना का प्रारूप तैयार करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रीन बेल्ट विकास, मास्टर प्लान के अनुरूप और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाएगा।
चुनौतीपूर्ण होगा प्रोजेक्ट
धामों में हरियाली लाना आसान काम नहीं होगा। केदारनाथ धाम 11,755 फीट और बदरीनाथ धाम 10,279 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां छह महीने तक बर्फ जमी रहती है। ऐसे में केवल वही पौधे और झाड़ियां यहां जीवित रह पाएंगी जो इस ऊंचाई और ठंडे वातावरण के अनुरूप हों।बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने भी प्रोजेक्ट की सराहना की, लेकिन साथ ही चिंता जताई कि क्या यह वास्तव में सफल हो पाएगा। उन्होंने कहा –“इससे पहले भी यहां पौधे लगाने की कोशिश हुई थी, लेकिन सफल नहीं हो पाई। इसलिए विभाग को चाहिए कि पूरे अध्ययन के बाद ही ऐसी वनस्पतियां रोपे, जो इस वातावरण में टिक सकें।”
यदि यह प्रोजेक्ट सफल होता है, तो श्रद्धालु पहली बार ऊंचाई वाले इन धार्मिक स्थलों पर हरी-भरी ग्रीन बेल्ट देख पाएंगे। इससे न केवल धामों की सुंदरता बढ़ेगी बल्कि यहां की ऑक्सीजन की कमी को भी कुछ हद तक दूर किया जा सकेगा। साथ ही, स्थानीय लोगों का मानना है कि पेड़-पौधे मिट्टी को मजबूती देंगे और भूस्खलन की घटनाएं भी कम होंगी। वन विभाग का यह प्रयास आने वाले समय में अन्य धार्मिक और ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है। कंक्रीट संरचनाओं के बीच हरे-भरे पौधे श्रद्धालुओं को न सिर्फ शुद्ध हवा देंगे बल्कि प्राकृतिक शांति का अनुभव भी कराएंगे।
ग्रीन बेल्ट क्यों जरूरी?
बदरीनाथ और केदारनाथ की ऊंचाई और भौगोलिक स्थिति इन्हें खास बनाती है। लेकिन इन्हीं कारणों से यहां ऑक्सीजन की कमी रहती है। श्रद्धालुओं को कई बार सांस लेने में कठिनाई होती है। स्थानीय लोग भी इस समस्या से जूझते हैं। ऐसे में ग्रीन बेल्ट का निर्माण सिर्फ सुंदरता बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि जीवनदायिनी पहल साबित हो सकती है। ऊंचाई वाले इलाकों में पौधे वातावरण को संतुलित करते हैं और ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाते हैं। हरियाली मिट्टी को पकड़ती है, जिससे भूस्खलन की घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है। श्रद्धालु जब यहां आएंगे, तो कंक्रीट के बीच हरियाली देखकर उन्हें आध्यात्मिक शांति का अनुभव होगा। औषधीय पौधों और झाड़ियों के रोपण से स्थानीय लोगों को आय के नए साधन मिल सकते हैं। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है, तब हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ग्रीन बेल्ट की जरूरत और भी बढ़ जाती है।
वन विभाग का ब्लूप्रिंट
वन विभाग ने इस परियोजना को साइंटिफिक अप्रोच के साथ शुरू करने का फैसला किया है। यानी पहले पूरे इलाके का अध्ययन होगा और उसके बाद ही पौधों का चयन किया जाएगा। पर्यावरणविद, वैज्ञानिक और स्थानीय विशेषज्ञ मिलकर धामों की भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करेंगे। केवल वही पौधे लगाए जाएंगे जो पहले से इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं। ताकि ग्रीन बेल्ट, मास्टर प्लान और विकास कार्यों के साथ मेल खा सके। वन विभाग का मानना है कि यह ग्रीन बेल्ट केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इसे एक संगठित और टिकाऊ रूप दिया जाएगा।
चुनौतियां
ग्रीन बेल्ट प्रोजेक्ट सुनने में जितना आसान लगता है, उतना ही मुश्किल इसके क्रियान्वयन में है। बदरीनाथ और केदारनाथ धाम हिमालय की ऐसी ऊंचाई पर बसे हैं, जहां प्राकृतिक परिस्थितियां बेहद कठोर हैं। यहां साल में लगभग 6 महीने तक मोटी बर्फ जमी रहती है। ऐसे में पौधों का जीवित रहना चुनौतीपूर्ण होता है। केदारनाथ 11,755 फीट और बदरीनाथ 10,279 फीट की ऊंचाई पर बसे हैं। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी तो रहती ही है, साथ ही तापमान भी लगातार गिरा रहता है। ठंडे मौसम और लगातार बर्फबारी की वजह से सामान्य पेड़-पौधे यहां टिक ही नहीं पाते। केवल विशेष किस्म की झाड़ियां और औषधीय पौधे ही जीवित रह सकते हैं। यही वजह है कि वन विभाग को यहां ऐसी प्रजातियों का चयन करना होगा जो कठोर मौसम के बावजूद पनप सकें। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सही पौधों का चयन नहीं हुआ तो यह प्रोजेक्ट पहले की तरह विफल भी हो सकता है।

