Sunday, February 8, 2026
HomeNewsसैनिक आश्रित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने जुटा गढ़वाल राइफल्स

सैनिक आश्रित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने जुटा गढ़वाल राइफल्स

लैंसडौन (मोहन भुलानी ): हिमालय की हरी-भरी वादियों में बसा लैंसडौन न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट का मुख्यालय एक ऐसी पहल चला रहा है जो सैनिकों की बहनों और पत्नियों को आत्मनिर्भर बनाने की मिसाल पेश कर रही है। पिछले 44 वर्षों से चल रहा ‘भुल्ली सशक्तीकरण केंद्र’ महिलाओं की जिंदगी में नई रोशनी बिखेर रहा है। यहां मुफ्त में 22 प्रकार के कोर्स कराए जाते हैं, जिनमें स्वादिष्ट व्यंजन बनाना, कंप्यूटर शिक्षा से लेकर हस्तशिल्प तक शामिल हैं। अब तक 3,163 महिलाओं ने यहां से प्रशिक्षण लिया है, और उनमें से 75 महिलाएं न केवल स्वरोजगार कर रही हैं, बल्कि अपने गांवों में अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। यह केंद्र न सिर्फ कौशल विकास का माध्यम है, बल्कि सैनिक परिवारों की मजबूती और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक भी बन गया है।

शुरुआत होती है 2 फरवरी 1981 से, जब राष्ट्र रक्षा में तैनात सैनिकों के परिवारों के कल्याण और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए लैंसडौन में महिला प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की गई। शुरुआत में यहां चुनिंदा कोर्स ही उपलब्ध थे, और महिलाओं ने इसमें ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। लेकिन सेना की जागरूकता अभियानों और निरंतर प्रयासों से धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी। आज यह केंद्र ‘भुल्ली सशक्तीकरण केंद्र’ के नाम से जाना जाता है, जिसका नाम 6 सितंबर 2024 को स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए बदला गया। ‘भुल्ली’ शब्द गढ़वाली में ‘बहन’ को कहते हैं, जो केंद्र की भावना को दर्शाता है – बहनों को मजबूत बनाना। गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट सेंटर के कमांडेंट ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी बताते हैं, “यह केंद्र सैनिक परिवारों की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम है। हमारी कोशिश है कि वे न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हों, बल्कि अपनी संस्कृति को भी जीवित रखें।”

केंद्र की सफलता की कहानी महिलाओं की मेहनत और सेना के समर्थन से बुनी गई है। यहां 17 सदस्यीय स्टाफ तैनात है, जिसमें सेवारत और पूर्व सैनिकों के स्वजन शामिल हैं। केंद्र का संचालन गढ़वाल रेजिमेंट केंद्र से मिलने वाले आर्थिक अनुदान से होता है। हाल ही में 4 मई 2025 को वीर नारियों और उनके आश्रितों के लिए कंप्यूटर शिक्षा प्रदान करने वाली एक आधुनिक लैब शुरू की गई। यह लैब महिलाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ रही है, जहां वे कंप्यूटर कोर्स (15 महिलाएं प्रशिक्षित) सीखकर ऑनलाइन कारोबार या नौकरी की तैयारी कर रही हैं। एक प्रशिक्षित महिला, राधा देवी कहती हैं, “मैंने यहां कंप्यूटर सीखा और अब घर से ही ऑनलाइन ऑर्डर लेकर हस्तशिल्प बेचती हूं। यह केंद्र मेरी जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ।”

केंद्र में महिलाओं की सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता है। प्रशिक्षण के दौरान तीन वर्ष तक के बच्चों की देखभाल के लिए ‘नन्हीं कली’ इकाई स्थापित की गई है। इससे महिलाएं बेफिक्र होकर कोर्स कर सकती हैं। यहां के कोर्स विविधतापूर्ण हैं – बुनाई (593 महिलाएं), सिलाई (1025), हिंदी टाइपिंग (269), अंग्रेजी टाइपिंग (170), कालीन बुनाई (52), मोजे बुनाई (38), शाल बुनाई (96), बाक्स निर्माण और वेल्डिंग (13), मोमबत्ती और साबुन निर्माण (52), बेकरी (36), प्रौढ़ शिक्षा (254), सिलाई (93), तकिया निर्माण (18), साड़ी डिजाइनिंग (19), खिलौने निर्माण (15), ब्लाक प्रिंटिंग (62), ड्राइविंग कक्षाएं (113), ब्यूटीशियन (122), कागज के थैले निर्माण (38), जूस और अचार बनाना (62), और गढ़वाली नमक बनाना (08)। ये कोर्स न केवल कौशल सिखाते हैं, बल्कि बाजार की मांग के अनुरूप तैयार किए गए हैं।

केंद्र की एक विशेष पहचान है – गढ़वाली नमक। यह नमक पर्यटकों को खूब पसंद आ रहा है। केंद्र में महिलाओं को नमक बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, और सर्वश्रेष्ठ नमक बनाने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इसका मकसद पहाड़ की संस्कृति को बढ़ावा देना और नमक के स्वाद को और रुचिकर बनाना है। बढ़ती मांग को देखते हुए नमक की पैकिंग को आकर्षक बनाया गया है, और इसे ‘हाउस ऑफ हिमालय’ आउटलेट की व्यावसायिक चेन से जोड़ा गया है। एक पर्यटक, दिल्ली से आए रवि शर्मा कहते हैं, “गढ़वाली नमक का स्वाद अनोखा है। मैं हर बार यहां से ले जाता हूं, और अब यह बाजार में उपलब्ध होने से खुशी हो रही है।” महिलाएं इस नमक को बनाकर न केवल कमाई कर रही हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रख रही हैं।

इस केंद्र की कहानी कई महिलाओं की सफलता से जुड़ी है। जैसे, पौड़ी की रहने वाली मीना ने यहां सिलाई और बुनाई का कोर्स किया। आज वह अपने गांव में एक छोटी दुकान चला रही है, जहां वह शाल और कालीन बेचती है। “पहले मैं घर पर ही रहती थी, लेकिन केंद्र ने मुझे आत्मविश्वास दिया। अब मैं 10 अन्य महिलाओं को रोजगार दे रही हूं,” मीना गर्व से कहती हैं। इसी तरह, ब्यूटीशियन कोर्स करने वाली सरिता अब एक सैलून चला रही हैं, जहां पर्यटक भी आते हैं। ड्राइविंग कोर्स (113 महिलाएं) ने कई महिलाओं को टैक्सी चलाने का हुनर सिखाया, जिससे वे पहाड़ी इलाकों में स्वतंत्र रूप से घूम सकती हैं और कमाई कर सकती हैं।

केंद्र न केवल आर्थिक सशक्तीकरण पर जोर देता है, बल्कि महिलाओं की मानसिक मजबूती भी बढ़ाता है। प्रौढ़ शिक्षा (254 महिलाएं) से कई महिलाएं पढ़-लिखकर आगे बढ़ी हैं। एक वीर नारी, जिनके पति शहीद हो गए, कहती हैं, “केंद्र ने मुझे नई जिंदगी दी। यहां से प्रशिक्षण लेकर मैं अब मोमबत्ती और साबुन बनाती हूं, और मेरे बच्चे गर्व महसूस करते हैं।” सेना की यह पहल सैनिकों को भी मानसिक शांति देती है, क्योंकि वे सीमा पर रहकर जानते हैं कि उनके परिवार सुरक्षित और आत्मनिर्भर हैं।

RELATED ARTICLES