देहरादून: पहाड़ों की रंग-बिरंगी फूलों की महक अब सिर्फ हवा में नहीं, बल्कि थाली में भी बिखर रही है। सरसों के पीले-पीले फूल, बुरांश की लालिमा, गुलाब की खुशबू, फ्यूली की नाजुक पंखुड़ियाँ, मोल, केदारपत्ती, मूली के फूल और यहां तक कि भांग व कंडाली घास तक – हर फूल अब मिठाई, हलवा और जेली का रूप ले चुका है। देहरादून के मशहूर शेफ देवेंद्र जोशी ने फूलों को मुख्य सामग्री बनाकर 35 से ज्यादा प्रकार की मिठाइयाँ तैयार की हैं, जिन्हें देखकर और चखकर लोग दीवाने हो रहे हैं। यह सिर्फ स्वाद की बात नहीं, बल्कि पहाड़ी परंपरा, स्वास्थ्य और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का अनोखा मिश्रण है।
देवेंद्र जोशी, जो उत्तराखंड की पारंपरिक रसोई को आधुनिक स्वाद के साथ जोड़ने के लिए जाने जाते हैं, पिछले कई वर्षों से प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने बताया, “फूल सिर्फ सजावट या पूजा के नहीं होते, इनमें छिपी औषधीय गुणवत्ता और प्राकृतिक मिठास को हम मिठाई में उतार सकते हैं। पहाड़ में जहां फूलों की भरमार है, वहां उनका यह रूप पूरी दुनिया को आकर्षित कर सकता है।” जोशी की यह मुहिम सिर्फ एक प्रयोग नहीं, बल्कि एक क्रांति है। उन्होंने सरसों के फूल से हलवा, बुरांश से कौंणी हलवा, गुलाब से ड्राई फ्रूट कतली, भांग से पेड़ा, चिंणा केशर हलवा, फ्यूली से मिठाई, माल्टा से जेली और कंडाली घास से जेली जैसी अनगिनत चीजें तैयार की हैं।
जूस से मिठाई तक
शेफ जोशी के अनुसार, फूलों से मिठाई बनाने की प्रक्रिया बेहद सावधानी भरी है। सबसे पहले फूलों को अच्छी तरह धोया जाता है। फिर हल्का पानी मिलाकर ब्लेंडर में पीसकर जूस तैयार किया जाता है। इस जूस को छानकर उसमें स्थानीय अनाज, गुड़ या चीनी, देसी घी और कुछ सूखे मेवे मिलाए जाते हैं। पूरा प्रोसेस बिना किसी केमिकल या प्रिजर्वेटिव के होता है। उन्होंने बताया, “हमने 30 से 40 प्रोडक्ट तैयार किए हैं। हर दिन प्रदर्शनी में अलग-अलग आइटम रखे जा रहे हैं ताकि लोग विविधता का आनंद ले सकें।”
सरसों के पीले फूलों से तैयार हलवा देखने में तो सुनहरा लगता है, स्वाद में हल्की तीखी महक के साथ मिठास का कमाल है। बुरांश के लाल फूलों से बनी कौंणी हलवा न सिर्फ आंखों को लुभाती है बल्कि ठंडक भी देती है। गुलाब की मिठाई में खुशबू इतनी तीव्र है कि एक कौर खाते ही पूरा बगीचा याद आ जाता है। फ्यूली के फूलों से बनी मिठाई बेहद नाजुक और हल्की है। माल्टा, जो पहाड़ों में बड़े पैमाने पर पैदा होता है लेकिन अक्सर बर्बाद हो जाता है, उससे तैयार जेली अब टूरिस्टों की पसंदीदा चीज बन गई है।
भांग और कंडाली
सबसे चर्चित प्रयोग भांग और कंडाली घास का है। पहाड़ों में भांग की पत्तियों से आमतौर पर चटनी या ठंडाई बनाई जाती है, लेकिन देवेंद्र जोशी ने भांग के पेड़े तैयार किए हैं। यह पेड़ा हल्का हरा, स्वाद में अनोखा और ऊर्जा से भरपूर है। जोशी ने स्पष्ट किया, “हमने मात्रा का पूरा ध्यान रखा है। यह पूरी तरह सुरक्षित और कानूनी है। पर्यटक इसे अपने साथ ले जा सकें, यही हमारा मकसद है।”
कंडाली घास तो और भी चुनौतीपूर्ण रही। इस घास को छूते ही जलन और खुजली हो जाती है। पहाड़ी महिलाएं इसे सब्जी बनाने से पहले विशेष तरीके से साफ करती हैं। लेकिन जोशी ने इसे जेली में तब्दील कर दिया। उन्होंने कहा, “कंडाली आयरन, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है। स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद। हमने इसे ऐसे प्रोसेस से गुजारा कि कोई जलन न हो। अब यह जेली न सिर्फ स्वादिष्ट है बल्कि पौष्टिक भी।” कंडाली से कपड़े भी बनाए जा रहे हैं, लेकिन मिठाई के रूप में यह पहला प्रयोग है।
पहाड़ी फूलों का खजाना
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में फूलों की विविधता अनगिनत है। बुरांश (रॉडोडेंड्रॉन) तो राज्य का राजकीय फूल है। इसे जूस के रूप में तो जाना जाता है, लेकिन हलवा और जेली के रूप में नया आयाम मिला है। केदारपत्ती के फूलों से बनी मिठाई में हल्की जड़ी-बूटी जैसी महक आती है। मूली के सफेद फूलों से तैयार जेली गर्मियों में ठंडक का अहसास कराती है। मोल और फ्यूली के फूल स्थानीय स्तर पर ही मिलते हैं, जिनका अब व्यावसायिक उपयोग शुरू हो गया है।
शेफ जोशी ने बताया कि उन्होंने पहाड़ी अनाज जैसे जौ, कूटू, मंडुआ और रामदाना को भी इन मिठाइयों में शामिल किया है। इससे मिठाइयाँ ग्लूटेन-फ्री और फाइबर से भरपूर हो गई हैं। घी की जगह उन्होंने देशी घी का ही उपयोग किया है, जिससे स्वाद और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित रहते हैं। कुल मिलाकर 35 प्रकार की मिठाइयाँ तैयार हुई हैं – पेड़ा, बर्फी, कतली, हलवा, लड्डू, जेली, जामुन, रसगुल्ला स्टाइल की चीजें और कई फ्यूजन आइटम।
स्वास्थ्य और पर्यटन को नई उड़ान
ये मिठाइयाँ सिर्फ स्वाद नहीं, स्वास्थ्य का खजाना भी हैं। फूलों में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और मिनरल्स प्रचुर मात्रा में होते हैं। बुरांश ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है, गुलाब पाचन सुधारता है, सरसों के फूल विटामिन सी से भरपूर हैं। कंडाली तो आयरन की खान है। जोशी का कहना है, “आजकल लोग शुगर-फ्री या लो-कैलोरी मिठाई ढूंढते हैं। हमने कुछ प्रोडक्ट्स में गुड़ और स्टेविया का भी उपयोग किया है।”
पर्यटन की दृष्टि से यह प्रयोग गेम-चेंजर साबित हो सकता है। जोशी का सपना है कि जब भी कोई पर्यटक उत्तराखंड आए, तो यहां की फूलों वाली मिठाई अपने शहर ले जाए। उन्होंने कहा, “पहाड़ की मिट्टी, पानी और फूलों का स्वाद जब कोई दूसरे राज्य ले जाएगा, तो वह उत्तराखंड को बार-बार याद करेगा।” वर्तमान में देहरादून के विभिन्न होटलों, रिसॉर्ट्स और मेलों में इन मिठाइयों की प्रदर्शनी लगाई जा रही है। हर दिन नई-नई वैरायटी पेश की जा रही है।
चुनौतियां और समाधान
फूलों से मिठाई बनाने में चुनौतियां भी कम नहीं थीं। फूलों का मौसमी होना, ताजगी बनाए रखना, प्रोसेसिंग के दौरान रंग और खुशबू बचाना – ये सब काम मुश्किल थे। जोशी की टीम ने वैज्ञानिक तरीके अपनाए। उन्होंने फूलों को तुरंत प्रोसेस करने के लिए कोल्ड स्टोरेज और वैक्यूम पैकिंग का उपयोग किया। कंडाली जैसे खतरनाक पौधे को हैंडल करने के लिए विशेष ग्लव्स और प्रशिक्षित स्टाफ रखा गया।
आर्थिक रूप से भी यह मॉडल फायदेमंद है। पहाड़ों में फूल अक्सर बर्बाद हो जाते थे। अब स्थानीय महिलाएं फूल तोड़कर जोशी की टीम को सप्लाई कर रही हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। माल्टा, जो पहले सड़कों पर गिरकर खराब हो जाता था, अब जेली बनकर महंगे होटलों तक पहुंच रहा है।
भविष्य की योजनाएं
देवेंद्र जोशी अब और आगे बढ़ना चाहते हैं। वे फूलों से आइसक्रीम, चॉकलेट, केक और यहां तक कि बेवरेज भी बनाने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि उत्तराखंड ‘फ्लावर फूड हब’ के रूप में जाना जाए। हम ऑनलाइन डिलीवरी भी शुरू करने वाले हैं ताकि देश-विदेश के लोग इन मिठाइयों का स्वाद ले सकें।”
पहाड़ी संस्कृति में फूलों का विशेष स्थान है। हर त्योहार, हर पूजा में फूलों का उपयोग होता है। अब देवेंद्र जोशी ने इस परंपरा को रसोई तक पहुंचा दिया है। उनकी यह मुहिम न सिर्फ स्वाद की दुनिया को नया आयाम दे रही है बल्कि युवाओं को भी प्रेरित कर रही है कि वे अपनी जड़ों से जुड़कर कुछ नया करें।
आज जब लोग हेल्दी और ऑर्गेनिक फूड की तलाश में हैं, तब फूलों से बनी ये मिठाइयाँ सही मायने में ‘नेचर टू प्लेट’ का उदाहरण हैं। सरसों के पीले फूलों की सुनहरी मिठास, बुरांश की लाल जेली की ठंडक, गुलाब की महक वाली कतली और कंडाली की पौष्टिक जेली – हर कौर में पहाड़ बोलता है।
देवेंद्र जोशी का यह सफर सिर्फ शुरूआत है। अगर यह मुहिम सफल रही, तो आने वाले समय में उत्तराखंड की मिठाइयाँ सिर्फ बर्फी और रसगुल्ले तक सीमित नहीं रहेंगी। फूलों की थाली पूरी दुनिया की थाली बन जाएगी। जो लोग अभी तक पहाड़ आकर सिर्फ नजारे देखते थे, अब वे स्वाद भी ले जाएंगे। और हर कौर के साथ कहेंगे – “ये मिठाई नहीं, पहाड़ का जादू है।”



