NTI, रुद्रप्रयाग (मोहन भुलानी) । ऋषिकेश-बदरीनाथ हाईवे पर सुमेरपुर के पास एक दस मंजिला भवन का निर्माण कार्य चर्चा का विषय बना हुआ है। इस भवन के निर्माण को लेकर स्वीकृति से लेकर निर्माण प्रक्रिया तक कई सवाल उठ रहे हैं। खासकर, अलकनंदा नदी से कुछ ही दूरी पर हो रहे इस निर्माण को लेकर भू-विज्ञानी और पर्यावरणविद गंभीर चिंता जता रहे हैं।
रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर सुमेरपुर में यह दस मंजिला भवन बनाया जा रहा है। शासन की ओर से रेलवे निर्माण परिसर की सीमा के बाद चार सौ मीटर तक के क्षेत्र को फ्रीज जोन घोषित किया गया है, जहां किसी भी तरह का निर्माण कार्य या विकास गतिविधियां प्रतिबंधित हैं। इसकी निगरानी की जिम्मेदारी जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण को दी गई है। हालांकि, इसके बावजूद यहां बहुमंजिला भवन का निर्माण किया जा रहा है, जिसे लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नियमों का उल्लंघन?
सुमेरपुर क्षेत्र ग्रामीण इलाके में आता है और बदरीनाथ हाईवे से सटा हुआ है। ऐसे में यहां निर्माण कार्य के लिए खंड विकास अधिकारी, जिला पंचायत और एनएच (नेशनल हाईवे) से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है। इसके अलावा, अलकनंदा नदी से दूरी को लेकर सिंचाई विभाग की अनुमति भी जरूरी है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि निर्माणकर्ता के पास ये सभी प्रमाण पत्र मौजूद हैं या नहीं।
भूगर्भवेत्ता प्रवीन रावत ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में 30 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले भवनों के निर्माण के लिए आईआईटी के स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग विभाग, भूकंप इंजीनियरिंग विभाग और राष्ट्रीय भूगर्भीय संस्थान से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि रुद्रप्रयाग जिला भूकंप जोन-5 में आता है, जहां इतने बड़े निर्माण कार्य को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।
प्राधिकरण का रुख
रुद्रप्रयाग जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण के सहायक अभियंता शैलेंद्र तोमर ने बताया कि दस मंजिला भवन के निर्माण को लेकर संचालक से स्वीकृति पत्र मांगे गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्राधिकरण की ओर से अभी तक इस निर्माण को कोई अनुमति नहीं दी गई है। तोमर ने कहा कि निर्माणकर्ता ने अभी तक केवल जमीन के कागजात ही प्रस्तुत किए हैं, जबकि अन्य जरूरी दस्तावेज अधूरे हैं। पिछले दो महीनों से प्राधिकरण की ओर से इन दस्तावेजों को पूरा करने के लिए कहा जा रहा है।
पर्यावरणविदों की चिंता
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह के बड़े निर्माण कार्य भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यह निर्माण आने वाली किसी बड़ी आपदा को जन्म दे सकता है। उन्होंने कहा, “शासन-प्रशासन और एनजीटी को इस मामले में तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। यह जांचना जरूरी है कि जिस भूमि पर यह निर्माण हो रहा है, वह इतने बड़े भवन का भार सहन कर पाएगी या नहीं। साथ ही, निर्माण से उत्पन्न होने वाली गंदगी को लेकर भी कोई ठोस योजना होनी चाहिए।”
पर्यावरण विशेषज्ञ देव राघवेंद्र बद्री ने भी इस मामले में गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि रुद्रप्रयाग जिला भूकंप जोन-5 में आता है और पहले भी कई आपदाओं का सामना कर चुका है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस निर्माण से पहले भूमि की सहने की क्षमता और पर्यावरणीय प्रभाव का कोई अध्ययन किया गया है। उन्होंने एनजीटी, नमामि गंगे और सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।
निर्माणकर्ता की चुप्पी
इस मामले में निर्माणकर्ता की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। जब निर्माण स्थल पर मौजूद व्यक्ति से इस बारे में सवाल किया गया, तो वह कोई जानकारी देने में असमर्थ रहा।
इस पूरे मामले में शासन-प्रशासन और पर्यावरण संबंधी एजेंसियों की ओर से त्वरित कार्रवाई की मांग की जा रही है, ताकि पर्यावरण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।


