देहरादून: उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर रजत जयंती उत्सव के तहत प्रवासी उत्तराखंडी प्रवासियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का संकल्प लिया। सम्मेलन में देश के 11 राज्यों से 199 प्रवासी उत्तराखंडियों ने शिरकत की, जहां राज्य की दिशा-दशा, सतत विकास और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए प्रवासियों को ‘देवभूमि के सच्चे ब्रांड एंबेसडर’ बताते हुए राज्य में ‘प्रवासी उत्तराखंड परिषद’ गठन का ऐलान किया, जो निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में योगदान सुनिश्चित करेगा।
सम्मेलन में हरियाणा, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से प्रवासियों ने भाग लिया। कुल 287 लोगों ने पंजीकरण कराया था, लेकिन विभिन्न कारणों से 199 ही उपस्थित हुए। यह दूसरा ऐसा सम्मेलन था, जिसका प्रथम संस्करण 2024 में आयोजित हुआ था। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न सत्रों में सस्टेनेबल डेवलपमेंट प्लानिंग, सर्कुलर इकोनॉमी, उत्तराखंड की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां, पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाओं का सशक्तिकरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियां जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
मुख्यमंत्री धामी ने संबोधन में कहा, “ये सभी प्रवासी भले ही राज्य से दूर रह रहे हों, लेकिन उन्होंने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संजोया है और नई पीढ़ी तक पहुंचाया है। वे उत्तराखंड की पहचान को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं।” उन्होंने अपने चार वर्षों के कार्यकाल में देश-विदेश के शहरों में प्रवासियों से मिलने के अनुभव साझा करते हुए जोर दिया कि प्रवासी आज भी पैतृक गांवों से जुड़े हैं। सीएम ने रजत जयंती वर्ष को विशेष बताते हुए प्रवासियों से पैतृक स्थानों के विकास में योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “सरकार आपके सुझावों को अमल में लाने के लिए प्रतिबद्ध है, और इसी उद्देश्य से यह सम्मेलन आयोजित किया गया।” धामी ने प्रवासियों को हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया, विशेषकर निवेश और विकास परियोजनाओं में।
सम्मेलन के एक अन्य वक्ता, राजस्थान के मुख्य सचिव सुधांशु पंत (जो स्वयं उत्तराखंडी हैं) ने कहा, “प्रवासी यदि प्रदेश के विकास में रुचि लेंगे, तो यह राज्यहित में होगा। यह सम्मेलन सराहनीय पहल है।” पंत ने बताया कि वे साल में कई बार पैतृक गांव लौटते हैं। वहीं, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट ने भावुक होकर कहा, “प्रवासी होने का मतलब जड़ों से कटना नहीं है। तीज-त्योहारों पर उत्तराखंड की याद आती है, और हमें स्वाभिमान के साथ जड़ों से जुड़कर सम्मान बढ़ाना चाहिए।”
25 वर्षों की यात्रा: उपलब्धियां और चुनौतियां
उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था, और आज राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। पिछले 25 वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था 26 गुना बढ़ी है, जबकि प्रति व्यक्ति आय 17 गुना वृद्धि दर्ज की गई। साक्षरता दर, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ है। वर्तमान में 2 लाख करोड़ रुपये की विकास परियोजनाएं चल रही हैं, जो राज्य को शीर्ष राज्यों की श्रेणी में लाएंगी। राष्ट्रीय स्तर पर पहली यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने वाला राज्य बन चुका है, और जैविक खेती में अग्रणी है।
हालांकि, प्रवासन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। अनुमानों के अनुसार, 2018 से 2022 तक 3.35 लाख लोग राज्य से पलायन कर चुके हैं, जबकि कुल मिलाकर 5 लाख से अधिक प्रवासी हैं, जो मुख्य रूप से पहाड़ी जिलों से हैं। ‘घोस्ट विलेज’ की समस्या से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। सम्मेलन में इसी पर फोकस रहा, जहां सर्कुलर इकोनॉमी और महिला सशक्तिकरण जैसे सुझावों से रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा देने की योजना बनी।

