Thursday, February 19, 2026
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भारत में AI क्रांति के अवसरों के साथ खतरों से सावधानी जरुरी

नई दिल्ली: जब भारत एआई इंपैक्ट समिट के जरिए वैश्विक मंच पर एआई क्रांति का केंद्र बन रहा है, तब एक घटना ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समिट के एक्सपो में एक निजी विश्वविद्यालय ने चीनी रोबोटिक्स डॉग को अपना बताकर प्रस्तुत किया, जिससे देश की छवि को ठेस पहुंची। गलगोटियास विश्वविद्यालय की प्रोफेसर ने इसे अपना विकास बताकर विवाद खड़ा किया, लेकिन सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं ने इसे यूनिट्री रोबोटिक्स का गो2 मॉडल पहचान लिया। विश्वविद्यालय को समिट से बाहर कर दिया गया और उन्होंने माफी मांगते हुए प्रोफेसर को दोषी ठहराया। इस घटना ने विदेशी मीडिया में सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत की एआई क्षमता पर सवाल उठाया जाए। बल्कि यह चेतावनी है कि एआई के नाम पर नकल और विदेशी निर्भरता से बचना होगा।

एआई में भारत की स्थिति मजबूत है। स्टैनफोर्ड एआई इंडेक्स 2025 के अनुसार, भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी एआई शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत एआई प्रतिस्पर्धा में तीसरे स्थान पर है, हालांकि निवेश में अमेरिका ($109 बिलियन) और चीन ($9.3 बिलियन) से पीछे है। लेकिन भारत में निजी एआई निवेश 2013 से 2024 तक $11.1 बिलियन पहुंच चुका है, और सरकारी योगदान से यह $12.3 बिलियन हो गया है। वैश्विक कंपनियां जैसे माइक्रोसॉफ्ट ($17.5 बिलियन), गूगल ($15 बिलियन) और अमेजन ($35 बिलियन) भारत में निवेश कर रही हैं। समिट में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि अगले दो वर्षों में $200 बिलियन निवेश की उम्मीद है। भारत की एआई स्किल पैठ वैश्विक स्तर पर सबसे ऊपर है, जहां एआई-कुशल कार्यबल 2016 से 2023 तक 14 गुना बढ़ा है।

लेकिन अवसरों के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पहली चुनौती है नकल और विदेशी निर्भरता। गलगोटियास घटना जैसे मामले दिखाते हैं कि एआई टूल्स विकसित करने के नाम पर विदेशी कंपनियों पर आश्रित न होना पड़े। भारतीय कंपनियों को स्वदेशी और मूल तकनीक पर जोर देना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को सेमीकंडक्टर चिप्स, डेटा सेंटर और स्थानीय भाषाओं के डेटासेट तक पहुंच की कमी का सामना करना पड़ रहा है।

दूसरी चुनौती भाषाई और सामाजिक विविधता है। भारत की बहुभाषी (22 आधिकारिक भाषाएं) और बहुसांस्कृतिक संरचना के कारण एआई टूल्स को अलग ढंग से विकसित करना होगा। एक ही मॉडल सभी भाषाओं और संदर्भों में काम नहीं कर सकता। डेटासेट में पूर्वाग्रह (बायस) के कारण अल्पसंख्यक, ग्रामीण या महिलाओं को नुकसान हो सकता है। आईसीएमआर की एआई गाइडलाइंस में पूर्वाग्रह जांच और मानव निरीक्षण पर जोर दिया गया है।

तीसरी चुनौती दुरुपयोग का खतरा है। एआई की असीम संभावनाओं के साथ गलत इस्तेमाल (डीपफेक, फेक न्यूज, गोपनीयता उल्लंघन) का खतरा भी बढ़ रहा है। डीपफेक महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों को निशाना बना सकते हैं। साइबरसुरक्षा में एआई-आधारित खतरे जैसे मॉडल पॉइजनिंग को शामिल करने की जरूरत है।

चौथी चुनौती नियमन और नीति की कमी है। एआई के उपयोग, लाभ और जोखिमों पर स्पष्ट रोडमैप और टेक्नोक्रेट्स की भागीदारी से नीति बनानी होगी। भारत की 2025 एआई गवर्नेंस गाइडलाइंस सात सूत्रों (ट्रस्ट इज फाउंडेशन, पीपल फर्स्ट, इनोवेशन ओवर रेस्ट्रेंट आदि) पर आधारित हैं। यह जोखिम मूल्यांकन पर जोर देती है, लेकिन यूरोपीय संघ की सख्त विनियमन या अमेरिका की बाजार-चालित नीति से अलग, भारत का दृष्टिकोण टेक्नो-लीगल है।

सरकार से अपेक्षाएं स्पष्ट हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और शासन में एआई के उपयोग के लिए स्पष्ट खाका तैयार हो। इंडिया एआई मिशन के तहत $1.24 बिलियन निवेश से जीपीयू क्षमता बढ़ाई जा रही है। कृषि में एआई से फसल बीमा, मौसम पूर्वानुमान और पैदावार अनुमान में सुधार हो रहा है। स्वास्थ्य में ग्रामीण डायग्नोस्टिक्स और शिक्षा में व्यक्तिगत सीखने के लिए एआई का उपयोग। 2026-27 से ग्रेड 3 से स्कूलों में एआई पाठ्यक्रम शुरू होगा। भारतीय कंपनियों को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाने पर फोकस। शिक्षा संस्थानों में एआई के पढ़ाई-पढ़ाने पर विशेष ध्यान। आम लोगों और विशेष क्षेत्रों को एआई की विशेषताओं और जटिलताओं से परिचित कराना।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने यूपीआई के क्षेत्र में जो सफलता हासिल की है, वही मॉडल एआई में भी अपनाया जा सकता है। यूपीआई ने भारत को डिजिटल भुगतान में वैश्विक नेता बनाया, जहां 49% वैश्विक रीयल-टाइम लेनदेन होते हैं। इसी तरह, “यूपीआई फॉर एआई” के रूप में साझा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर, भारत एआई मॉडल्स को साझा कर सकता है, जहां कोई रॉयल्टी न हो और सभी लाभान्वित हों। एनपीसीआई ने फाइनेंस मॉडल फॉर इंडिया (फिमी) लॉन्च किया, जो यूपीआई हेल्प असिस्टेंट को पावर देता है। एआई को न सिर्फ भारत का, बल्कि विश्व का हित साधने वाली तकनीक बनाना होगा। इसके लिए आत्मनिर्भरता, मूल अनुसंधान और मजबूत नियमन जरूरी है।

यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो एआई क्रांति भारत के लिए अवसर से ज्यादा चुनौती बन सकती है। लेकिन सही दिशा में कदम उठाए गए तो भारत एआई के क्षेत्र में नई परिभाषा लिख सकता है। सरकार, उद्योग और समाज को मिलकर एआई को समावेशी और सुरक्षित बनाना होगा, ताकि यह “एआई फॉर ऑल” का सच्चा प्रतीक बने। एआई इंडेक्स रिपोर्ट बताती है कि 78% संगठन एआई का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन भारत को उत्पादकता बढ़ाने के साथ कौशल अंतर को कम करना होगा। अंत में, गलगोटियास जैसी घटनाएं हमें सतर्क करती हैं कि एआई की दौड़ में मूल्यांकन और पारदर्शिता जरूरी है। भारत को अपनी विविधता को ताकत बनाकर आगे बढ़ना होगा।

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