देहरादून : उत्तराखंड में आधिकारिक रूप से फायर सीजन शुरू हो गया है। वन विभाग को पहले दो दिनों में ही पूरे उत्तराखंड में 80 से अधिक जगहों पर आग लगने के अलर्ट मिल चुके हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस साल फायर सीजन शुरू होने से पहले ही 42 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल जल चुके हैं। कम वर्षा और बर्फबारी के कारण जंगलों में नमी की भारी कमी है, जिससे मानसून तक जंगलों को बचाना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
प्रदेश में हर साल 15 फरवरी से 15 जून तक को फायर सीजन माना जाता है। गर्मी बढ़ने के साथ जंगलों में आग की घटनाएं भी बढ़ती हैं। साल 2024 उत्तराखंड के लिए वनाग्नि के लिहाज से सबसे खराब रहा था। उस साल राज्य देश में सबसे ज्यादा वनाग्नि की घटनाओं वाला राज्य बन गया। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2023 से जून 2024 तक उत्तराखंड में 21,000 से ज्यादा फायर अलर्ट आए और हजारों हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए। इस साल की स्थिति इससे भी ज्यादा चिंताजनक नजर आ रही है।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 से अब तक प्रदेश में 54 जगहों पर आग लगी, जिसमें 42 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल जल चुके हैं। नवंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच विभाग को 1,957 फायर अलर्ट मिले। लेकिन इनमें से महज 132 (करीब 6.75 प्रतिशत) ही सही पाए गए। बाकी अलर्ट या तो गलत थे, या फिर खेतों में पराली जलाने, नियंत्रित जलाने या जंगल के बाहर की आग से संबंधित थे। विभाग ने सभी 1,957 स्थानों की फील्ड वेरिफिकेशन की और पाया कि केवल 132 जगहों पर असली वनाग्नि हुई, जिसमें करीब 18.84 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ (कुल आंकड़ों में यह संख्या 41.41 हेक्टेयर तक पहुंच चुकी है)।
पहले दिन ही अल्मोड़ा के लमगड़ा क्षेत्र के सिलखौड़ और हवालबाग में बज्यूड़ा के जंगलों में आग लग गई। पूरे प्रदेश में 80 से ज्यादा अलर्ट आए, लेकिन वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर पहले दिन किसी भी डिवीजन में वनाग्नि दर्ज नहीं हुई। विभाग का कहना है कि कई अलर्ट फॉल्स थे, इसलिए उन्हें आग नहीं माना गया।
इस साल सर्दियों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई। हिमालयी क्षेत्र में 100 प्रतिशत तक वर्षा की कमी दर्ज की गई। इससे जंगलों में नमी का स्तर बहुत नीचे आ गया है। पाइन के सूखे पत्ते और घास आसानी से आग पकड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ रहे हैं, जिससे सूखा बढ़ रहा है।
वन विभाग ने फायर सीजन से पहले काफी तैयारी की है। फायर वाचरों की भर्ती हो चुकी है। नियंत्रित जलाने (कंट्रोल्ड बर्निंग) और जंगल साफ-सफाई का काम चल रहा है। गांव स्तर पर फॉरेस्ट फायर सेफ्टी कमेटियां मजबूत की जा रही हैं। स्टाफ को ट्रेनिंग, एक्सपोजर विजिट और क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। मनुष्यबल, आग नियंत्रण उपकरण, पीपीई किट और अन्य सामग्री जुटाई जा रही है।
मुख्य वन संरक्षक (आपदा एवं वनाग्नि प्रबंधन) सुशांत पटनायक ने कहा, “हम फायर सीजन से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हम गांव स्तर की कमेटियों को मजबूत कर रहे हैं, कंट्रोल्ड बर्निंग कर रहे हैं और स्टाफ को प्रशिक्षित कर रहे हैं। लंबे सूखे की आशंका है, लेकिन हम proactive तरीके से काम कर रहे हैं।”
पर्यावरणविद् प्रो. अजय रावत ने कई बार वनाग्नि पर अहम सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा था कि होटलों और रिसॉर्ट्स में बोन फायर और कैंप फायर पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। वनाग्नि को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति में शामिल किया जाए। रेंजर और उससे ऊपर के अधिकारी लगातार वनों की निगरानी करें। फायर वाचरों को समय पर सम्मानजनक मानदेय मिले। डीएफओ हर कंपार्टमेंट की डायरी रखें और ग्रामीणों से नियमित संपर्क बनाए रखें। जनचेतना अभियान चलाएं।
हाल ही में उच्च न्यायालय में अमicus curiae के रूप में रावत ने वन पंचायत नियमों में बिना परामर्श के संशोधन पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समुदायों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर करने से जंगल संरक्षण प्रभावित हो रहा है। रावत ने युवाओं को जोड़ने के लिए नवाचारी तरीके सुझाए हैं। लेकिन इन सुझावों पर अमल कब होता है, यह बड़ा सवाल है।
2024 में उत्तराखंड देश में वनाग्नि के मामले में पहले स्थान पर रहा। नवंबर 2023 से जून 2024 तक 11,256 से ज्यादा घटनाएं दर्ज हुईं, जिसमें 12 लोगों की मौत हुई (6 वन कर्मी)। 2023-24 में 21,000 से ज्यादा अलर्ट आए। इस साल की शुरुआत पहले से ही चिंताजनक है। जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में ही 148 अलर्ट आए, जबकि पिछले साल इस दौरान शून्य थे। दिसंबर 2025 में 1,153 अलर्ट आए, जो पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा थे।
अधिकांश आग मानवीय हैं – पराली जलाना, चराई के लिए घास जलाना, सिगरेट के टोटे, पर्यटकों द्वारा फायर आदि। पाइन वनों में सूखे पत्ते आसानी से आग पकड़ते हैं। आग से जैव विविधता नष्ट होती है, मिट्टी की उर्वरता घटती है, जल स्रोत सूखते हैं और हवा में धुआं फैलता है, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं। पर्यटन पर भी असर पड़ता है।
वन विभाग अकेला नहीं लड़ सकता। गांवों में महिला मंगल दलों, वन पंचायतों और युवाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी। कई गांवों में स्थानीय लोग खुद आग बुझाने में आगे आ रहे हैं। लेकिन फायर वाचरों के मानदेय में देरी और संसाधनों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
इस बार सूखा ज्यादा है, इसलिए आग का खतरा मानसून तक रहेगा। विभाग को सैटेलाइट अलर्ट सिस्टम को और सटीक बनाने के लिए FSI से बातचीत करनी होगी। साथ ही, लंबे समय के लिए वन संरक्षण की नीति बनानी होगी – जल संग्रहण, वन पंचायतों को मजबूत करना, पर्यावरण शिक्षा और वैकल्पिक आजीविका।
वनाग्नि अब सिर्फ मौसमी समस्या नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का संकेत है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखंड के हरे-भरे जंगल धीरे-धीरे राख में बदल सकते हैं। विभाग, सरकार और जनता को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा।

