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प्रशांत किशोर ने कांग्रेस की नाक क्यों कटाई ?

रणनीति और राजनीति पर्यायवाची शब्द नहीं हैं. इन दोनों में जमीन और आसमान का फर्क है. चाहे वो राजनीति का सबसे बड़ा धुरंधर ही क्यों न हो, जब भी किसी ने रणनीति को राजनीति समझने की गलती की, वो चौपट हो गया. अगर चुनाव सिर्फ रणनीति के सहारे जीते जा सकते, तो पूरी दुनिया में राजनीति शास्त्र के पंडितों व विश्लेषकों की सत्ता होती. फिर राजनीतिक नेता और जननायकों की जरूरत ही नहीं पड़ती, पार्टी की जरूरत नहीं होती, विचारधारा की जरूरत नहीं होती, संगठन व कार्यकर्ताओं की भी जरूरत नहीं पड़ती. फिर कोई भी धनाढ्य व्यक्ति महंगे से महंगे रणनीतिकार को भाड़े पर रख लेता और चुनाव जीत जाता. आज देश के कई राजनीतिक विश्लेषकों को शर्मसार होना पड़ रहा है, क्योंकि वे रणनीति और राजनीति का फर्क भूल गए. राजनीतिज्ञों से श्रेय छीनकर उन्होंने रणनीतिकार को सुपर-हीरो घोषित करने की भूल की. प्रशांत किशोर यानि ‘पीके’ नाम के प्रसिद्ध पेशेवर चुनावी-रणनीतिकार का महिमामंडन इसी भूल का नतीजा है.

लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन के बावजूद कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद से प्रशांत किशोर लापता हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को महज 7 सीटें मिली हैं. कांग्रेस के लिए ये अब तक की सबसे बड़ी व शर्मनाक हार है. यही वजह है कि लखनऊ में कांग्रेस कार्यालय के बाहर यूपी कांग्रेस कमेटी के सचिव राजेश सिंह ने एक पोस्टर लगाया, जिस पर लिखा था- ‘स्वयंभू चाणक्य प्रशांत किशोर को खोजकर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ता सम्मेलन में लाने वाले किसी भी नेता को पांच लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा.’

कांग्रेस से जुड़े लगभग हर कार्यकर्ता और नेता की यही राय है कि प्रशांत किशोर कांग्रेस की सेहत के लिए हानिकारक हैं. लेकिन राहुल व प्रियंका से प्रशांत किशोर की निकटता की वजह से कांग्रेस में उन्हें अभयदान प्राप्त है. अपने ड्रॉइंग रूम में कांग्रेसी नेता पीके को कोसते जरूर हैं, लेकिन खुल कर बोलने की हिम्मत किसी में नहीं है. फिर भी, चुनाव नतीजे के बाद से पीके लापता हैं.

 हैरानी तो इस बात की है कि जिन वरिष्ठ पत्रकारों ने बिहार चुनाव के बाद प्रशांत किशोर को इस युग का चाणक्य घोषित कर दिया था, वे भी लापता हैं. बिहार चुनाव के बाद देश के बड़े-बड़े विश्लेषकों ने पीके को देश का सबसे महान रणनीतिकार साबित करने की गलती की. कई अखबार और पत्रिकाओं ने तो लालू-नीतीश से जीत का श्रेय छीन कर पीके को दे दिया. यहां तक कह दिया कि नरेंद्र मोदी की हार की वजह सिर्फ पीके की रणनीति है.

पीके का जादू नहीं थी बिहार की जीत 

बिहार चुनाव की हकीकत यह है कि अगर प्रशांत किशोर नहीं भी होते, तो भी बिहार का नतीजा जरा सा भी अलग नहीं होता. बिहार में नीतीश-लालू-कांग्रेस गठबंधन की जीत के पीछे पीके की रणनीति नहीं, लालू यादव और नीतीश कुमार की राजनीति है. सोशल मीडिया और टीवी पर चलने वाले ‘बिहार में बहार हो.. नीतीशे कुमार हो.’ जैसे नारों की वजह से महागठबंधन नहीं जीता, बल्कि वोटों का अंकगणित महागठबंधन के पक्ष में था.

नरेंद्र मोदी का विजय रथ बिहार में इसलिए रुका, क्योंकि लालू यादव, नीतीश कुमार और कांग्रेस पार्टी ने एक साथ मिल कर चुनाव लड़ने का राजनैतिक फैसला लिया. लालू यादव और नीतीश कुमार ने जिस तरह से मोहन भागवत के आरक्षण विरोधी बयान को मुद्दा बनाया और जिस तरह से उसे आखिरी दौर तक जीवित रखा, उसी वजह से नतीजा महागठबंधन के पक्ष में आया.

बिहार में पीके की रणनीति नहीं, बल्कि लालू-नीतीश की राजनीति जीती. अगर बिहार में महागठबंधन की जीत के लिए कोई जिम्मेदार है, तो वे लोग हैं जिन्होंने मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए लालू और नीतीश को एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए मनाया. जीत का श्रेय उन्हें जाना चाहिए था, लेकिन मीडिया ने प्रशांत किशोर को हीरो बना दिया. लेकिन अब, जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी नेस्तनाबूद हो गई है, कशीदे पढ़ने वाले विश्लेषक चुप हैं. हालांकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं को अब तक समझ में नहीं आ रहा है कि ये सब कैसे हो गया?

बिहार चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के लिए काम करते थे. महागठबंधन बनने से पहले से वे नीतीश कुमार की ब्रांडिंग कर रहे थे. नीतीश कुमार ने दिल खोल कर काफी पैसा खर्च किया था, लेकिन ये बात और है कि नीतीश कुमार की होर्डिंग व पोस्टर पटना और उसके 40 किलोमीटर की परिधि में ही लगे. पैसे कहां खर्च हुए, इसका कोई हिसाब नहीं है. कांग्रेस पार्टी भी इस महागठबंधन का हिस्सा थी, लेकिन राहुल गांधी को प्रशांत किशोर पर भरोसा नहीं था. चुनाव जीतने के बाद जब नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में राहुल पटना आए थे, तब नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को राहुल गांधी से मिलवाया था.

नीतीश कुमार ने न सिर्फ राहुल से उन्हें मिलवाया, बल्कि पीके की प्रशंसा में कशीदे भी पढ़े. इसके बाद पीके राहुल गांधी से दिल्ली में भी मिले, लेकिन पूरी तरह से राहुल गांधी का भरोसा नहीं जीत पाए. इसकी वजह ये रही कि राहुल गांधी के पास पहले से ही सलाहकारों और रणनीतिकारों की पूरी टीम मौजूद थी. अलग-अलग जगहों से फीडबैक लेने के लिए राहुल गांधी के पास 40 लोगों की एक टीम है. ये कांग्रेसी कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि देश भर से चुने गए प्रोफेशनल्स हैं.

इन्हें कई बार इंटरव्यू लेकर चुना गया है. यही वो टीम है, जिससे राहुल गांधी फीडबैक लेते हैं. राहुल गांधी को शायद प्रशांत किशोर से ज्यादा अपनी इस टीम पर भरोसा रहा हो, इसलिए शुरुआत में राहुल ने उन पर भरोसा नहीं किया. तब तक मीडिया में लगातार प्रशांत किशोर के बारे में लिखा जाने लगा था. कई लोगों ने उन्हें देश का सबसे बड़ा चुनावी-रणनीतिकार घोषित कर दिया था. लेकिन इसके बावजूद पीके राहुल गांधी का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हुए. इसके बाद, प्रशांत किशोर ने प्रियंका गांधी को पकड़ा.

प्रियंका गांधी को प्रशांत किशोर भरोसे के आदमी लगे. प्रशांत किशोर द्वारा किए गए चुनाव पूर्व सर्वे ने पीके को प्रियंका का और भरोसेमंद बना दिया. उस सर्वे में प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा 72 सीटें जीतने का दावा किया था और उसके तर्क भी दिए थे. यहीं से प्रशांत किशोर की कांग्रेस में एंट्री हो गई. प्रियंका गांधी ने विधानसभा चुनाव के फीडबैक के लिए अपनी अलग टीम बनाई. प्रियंका गांधी ही यूपी चुनाव के लिए कांग्रेस का बैक-ऑफिस चला रही थीं. वे हर दो-तीन दिन में प्रशांत किशोर से प्रेजेंटेशन लेती थीं. इसमें प्रियंका की पूरी टीम शामिल होती थी. कभी-कभी तो इस प्रेजेंटेशन के दौरान 100 से ज्यादा लोग मौजूद होते थे.

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